Corruption Case:”सत्येंद्र जैन पर भाजपा का प्रहार, प्रो. विनय पाठक पर क्यों है लाचार?” देखें किस तरह दोनों मामले अपने आप में हैं भारत के इतिहास में “पहले”
दिल्ली आम आदमी पार्टी के मंत्री सत्येंद्र जैन के वायरल हो रहे वीडियो पर जहां एक ओर भाजपा जमकर प्रहार कर रही है और केजरीवाल सरकार पर तमाम सवाल उठाते हुए मांग कर रही है कि सत्येंद्र जैन को मंत्री पद से हटा देना चाहिए। तो वहीं भ्रष्टाचार का एक आरोप छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय पाठक पर भी लगा है, लेकिन इस मामले पर भाजपा तो चुप ही है, साथ ही राज्यपाल आनन्दीबेन पटेल भी कुछ नहीं बोल रही हैं।
भविष्य में जब कभी भी शिक्षा जगत के काले कारनामों का पन्ना खोला जाएगा तो उसमें विनय पाठक का मामला जरूर लोगों को चौंकाएगा। क्योंकि अपने आप में भारत में ये पहला मामला है कि जब कोई प्रोफेसर कुलपति के पद पर उस वक्त भी बना है, जब उसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज है और एसटीएफ उसे ढूंढ रही है, क्योंकि कुलपति फरार हैं। तो दूसरी ओर भारत के इतिहास में पहली बार सत्येंद्र जैन ऐसे मंत्री बने हैं जो लगातार 6 महीने जेल में रहने के बाद भी अपने पद पर बने हैं। बीजेपी नेता इस मामले पर रोज-रोज बवाल मचाए हैं।

वैसे यह सच भी है कि संविधान बनाने वालों ने संविधान में यह क्लाज नहीं डाला कि किसी राज्य के मंत्री को या किसी केंद्र के मंत्री को बर्खास्त किया जा सके। केंद्र सरकार का मंत्री बगैर प्रधानमंत्री की सिफारिश के पद से बर्खास्त नहीं हो सकता और राज्य के मंत्री को बगैर मुख्यमंत्री के सिफारिश के राज्यपाल या राष्ट्रपति पद से नहीं हटा सकते। जब संविधान का निर्माण हुआ तो उस वक्त संविधान निर्माताओं ने यह नहीं सोचा होगा कि भारत में कोई ऐसा नेता भी पैदा होगा जो पद पर बने रहते अपने कारनामों से जेल जाएगा। अब तक की परंपरा पर अगर चलते तो जेल मंत्री जेल जाने से पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे देते।
फिलहाल तो ये शुरुआत केजरीवाल ने की है। जिन-जिन पार्टियों को केजरीवाल भ्रष्ट बताते थे उन सभी पार्टियों के भी कई मंत्री जेल गए, लेकिन जेल जाने के पहले इस्तीफा दे दिया। यहां तक की लालकृष्ण आडवाणी ने सांसद पद से इस्तीफा दे दिया था। जब उनके ऊपर हवाला के झूठे आरोप लगे थे। दूसरी तरह शुचिता का हवाला देते रहने वाले बीजेपी राज्य उत्तर प्रदेश में इससे भी बड़ा कारनामा सामने है।
कुलपति प्रो. विनय पाठक पर FIR दर्ज है। कोर्ट ने भी प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध डिक्लेयर कर दिया है, जिसके अपराध के टनो कागजात सामने आ चुके हों, वह अभी तक पद पर विराजमान है। उसके खिलाफ यह सरकार कोई कार्यवाही नहीं कर रही है। एसटीएफ ने दो नोटिस देने के अलावा कुछ नहीं किया। यानी उत्तर प्रदेश की सरकार भी उसके साथ है। शिक्षा जगत में भ्रष्टाचार का यह अद्भुत नमूना उत्तर प्रदेश में पहली बार दिखा है। बताया जा रहा है कि शायद तकनीकी शिक्षा पर कांग्रेसी गिरोह का कब्जा ही संघ-बीजेपी को रास आ गया है।
बता दें कि आज 28 दिन हो गए। पाठक के बारे में लगातार मीडिया में खबरे प्रकाशित हो रही हैं। यहां तक की कुलपति के न हटाए जाने के कारण राज्यपाल आनन्दीबेन पटेल भी लोगों के निशाने पर हैं, लेकिन उन्होंने भ्रष्टाचार का आरोप झेल रहे प्रो. पाठक पर अभी कर कोई एक्शन नहीं लिया है। वह बाहर भले हैं, लेकिन विश्वविद्यालय में नहीं है। अर्थात फरार हैं और कहां है, ये भी किसी को नहीं मालूम। विश्वविद्यालय में अव्यवस्था व्याप्त है। भ्रष्टाचार के तमाम आरोप झेल रहे प्रो. पाठक खुलेआम पद पर बैठे हैं और प्रदेश की भाजपा सरकार की इमेज खराब हो रही है। लोगों में कानून व्यवस्था के बारे में यह मैसेज जा रहा है कि बड़े लोग भ्रष्टाचार करके बच सकते हैं। प्रो. पाठक के गिरफ्तार ना होने से ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा में ऊपरी स्तर तक भ्रष्टाचार हावी है, जो कि प्रधानमंत्री मोदी की भी छवि को खराब कर रहा है। इस सम्बंध में लोगों में ये मैसेज जा रहा है कि मोदी और उनकी टीम को भी मैनेज किया जा सकता है। फिलहाल देखना ये है कि इन सबका असर 2024 के चुनावों पर पड़ता है या नहीं, लेकिन अभी तो भाजपा की शिक्षा जगत में थू-थू हो रही है।