Mahatma Gandhi: जानें अब कहां और किसके पास है बापू का चश्मा…? पढ़ें महात्मा गांधी से जुड़ा ये दिलचस्प किस्सा

August 14, 2024 by No Comments

Share News

Mahatma Gandhi: 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ था और भारतवासियों ने आजादी की हवा में सांस ली थी. तब लगा था मानों लाखों युवाओं, क्रांतिकारियों का बलिदान सार्थक हो गया. पूरे देश में उत्साह का माहौल था. तो वहीं वैसा ही उत्साह हर साल 15 अगस्त के दिन देखने को मिलता है और आजादी के दिनो से जुड़े तमाम किस्से भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं. इसी बीच सवाल उठा है कि आखिर बापू का चश्मा कहां है?

बता दें कि बापू का चश्मा बहुत ही सुरक्षित हाथों में है और आज भी ये लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. देश की आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. बता दें कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मध्य प्रदेश के कन्हैयालाल खादीवाला के पोते आलोक खादीवाला (53) के पास बापू का चश्मा सुरक्षित रखा है. इसी के साथ ही अंग्रेजों के शासनकाल का अंत करने वाले अन्य राष्ट्रीय नायकों पर आधारित 1,000 से अधिक डाक टिकट भी उनके पास हैं.

मंगलवार को आलोक खादीवाला न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा को बताया, “मुझे डाक टिकट जमा करने का शौक बचपन से है. मेरी खास दिलचस्पी देश के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन और इसके नायकों पर आधारित डाक टिकट जुटाने में है.” उन्होंने बताया कि उनके पास वर्ष 1947 में देश के आजाद होने से लेकर अब तक जारी 1,000 से ज्यादा डाक टिकट हैं जो स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन, इसके नायकों और राष्ट्रीय प्रतीकों पर आधारित है.

दादा को बापू ने भेंट किया था चश्मा
आलोक खादीवाला ने बताया कि महात्मा गांधी का चश्मा बड़े ही जतन के साथ उन्होंने संजो कर रखा है. वह कहते हैं कि बापू ने उनके दादा कन्हैयालाल खादीवाला को ये चश्मा उपहार में दिया था. वह एक किस्सा सुनाते हुए कहते हैं कि वर्ष 1947 में भारत की आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू की अगुवाई में बनी सरकार ने मेरे दादा को राजस्थान के अजमेर का प्रभारी बनाकर वहां भड़के सांप्रदायिक दंगे को शांत करने भेजा था. अमन कायम होने के बाद वह महात्मा गांधी को अजमेर के हालात से अवगत कराने दिल्ली गए थे. इसी दौरान बापू ने मेरे दादा को अपना चश्मा भेंट किया था.

कोविड के बाद बदल गए हैं हालात
आलोक खादीवाला बताते हैं कि कोविड-19 महामारी से पहले डाक टिकट संग्राहक डाक टिकटों का नि:शुल्क आदान-प्रदान करते थे, लेकिन इस महामारी के कारण डिजिटलीकरण को काफी बढ़ावा मिलने से अब हालात काफी बदल गए हैं. वह कहते हैं कि कोविड-19 के प्रकोप के बाद कागज का इस्तेमाल कम होता जा रहा है और डाक टिकट जुटाना खासा महंगा शगल बन गया है क्योंकि दुर्लभ डाक टिकटों के बदले ऊंची कीमत मांगी जाने लगी है.

दूसरे देशों के भी डाक टिकट हैं उनके पास
आलोक ने कहा कि ये डाक टिकट हमेशा आजादी के दीवानो के बारे में याद दिलाते रहते हैं. वह कहते हैं कि जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद और लक्ष्मीबाई जैसी हस्तियों के मातृभूमि के प्रति योगदान को नमन करने के लिए गुजरे बरसों में ये टिकट जारी किए गए हैं. वह कहते हैं कि उनके संग्रह में भारतीय डाक टिकटों के अलावा वे डाक टिकट और सिक्के भी हैं जो महात्मा गांधी और अन्य राष्ट्रीय नायकों पर संयुक्त राष्ट्र, ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी, इंडोनेशिया और दूसरे देशों ने जारी किए हैं. (फोटो-सोशल मीडिया)