Kanpur: डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय राजकीय सम्मान प्राप्त छात्रा ने चित्रों के जरिए दिया प्रकृति को सहेजने का संदेश, देखें वीडियो

October 10, 2022 by No Comments

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कानपुर। गुरुकुल दृश्य कला एवं नाट्य विद्यालय आजाद नगर ,कानपुर में नवोदित चित्रकार दिव्यांशी मिश्रा की प्रथम चित्रकला प्रदर्शनी का उद्घाटन पंडित केए दुबे पद्मेश ने रविवार को किया।

प्रोफेसर अभय द्विवेदी संचालक गुरुकुल संस्था ने अवगत कराया कि दिव्यांशी मिश्रा ,कानपुर केवीआईआईटी से इंटर करके वर्तमान में डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय लखनऊ की एमविए द्वितीय वर्ष की छात्रा है। दिव्यांशी को विद्या अध्ययन के दौरान अनेक राष्ट्रीय राजकीय पुरस्कार प्राप्त हो चुके है। दिव्यांशी के अनुसार इस प्रदर्शनी को आयोजित करने की प्रेरणा उनको अपने माता- पिता से मिली। वह अपनी चित्रकला द्वारा अपने पिता स्व. आलोक मिश्रा को अपना प्यार तथा सम्मान देना चाहती हैं।

इस कला प्रदर्शनी में दिव्यांशी की 46 रचनाएं प्रदर्शित हुईं। अधिकतर में प्रकृति व मनुष्य के बीच का सामंजस्य दिखाने का प्रयास किया हैं। जिसको दर्शाने के लिए दिव्यांशी ने भिन्न-भिन्न कला माध्यमों का प्रयोग किया हैं। मुख्यता रचनाएं ऐक्रेलिक माध्यम में बनी हैं, जिनमें से 11 पेंटिंग कैनवस पर एक्रेलिक में हैं, 24 पेंटिंग मिक्स मीडिया में पेपर पर ,7 म्यूरल अलग-अलग वस्तुओं के माध्यम से 3 पोट्रेट (जल रंग व ड्राई पेस्टल) में और 1 इचिंग माध्यम ( प्रिंट ) में हैं। दिव्यांशी की चित्रकला को देखकर सहज ही पता चलता है कि आप कला जगत में काफी कार्य करने की संभावनाएं रखती हैं।

दिव्यांशी के अनुसार वह कहती है कि मैं रंग को अपने ढंग से देखती हूं तथा मां डॉ.रूपम मिश्रा ( रूपम आलोक ) की तरह कुछ नये तरीके से विचारों को प्रस्तुत करना पसंद करती हूं। मैंने अपनी कृतियों में एक्रेलिक कलर के साथ स्टेडलर कलर, स्प्रे कलर तथा कोलाज विधा आदि का उपयोग किया है।

मैंने रंगो में पारदर्शिता लाने के लिए स्प्रे कलर का प्रयोग किया है। यूं तो मैंने अनेक प्रकार की कृतियां म्यूरल, पोट्रेट ,दृश्य चित्र आदि बनाए हैं, मेरी प्रमुख कृतियां प्रकृति की संवेदनाओं से जुड़ी हैं, इन कृतियों में मछली तथा मानवीय कृतियां हैं। मछली अत्यधिक प्रेम का प्रतीक है जो जल से विलग (अलग)नहीं रह सकती, साथ ही चिड़िया को संयोजित किया है। मछली और चिड़िया शुभत्व तथा जीवन का प्रतीक है। स्त्री तथा पुरुष आकृतियां सामाजिक परिवेश,स्नेह, सृष्टि को सुचारु रुप से अग्रसारित रखते है ।

मैं अपनी कृतियों के माध्यम से संदेश देना चाहती हूं कि कोई भी व्यक्ति प्रकृति के बिना, उसके सानिध्य के बगैर नहीं रह सकता, इसलिए हम सबको प्रकृति की महत्ता को जानना चाहिए तथा उसे सुरक्षित रखना चाहिए। हमें समझना होगा कि प्रकृति में सभी जीव महत्वपूर्ण है। मेरी कृतियां मानवीय संवेदनाओं से प्रभावित है तथा मेरी कुछ कृतियां जीवन की विषम परिस्थितियों से निकलने का प्रयास करती प्रदर्शित होती है। इस मौके पर दिव्यांशी ने अपने गुरुजन प्रो. राजीव नयन, प्रो. राजेंद्र प्रसाद, प्रो. अवधेश मिश्र, प्रो.सुनीता शर्मा ,प्रो. संतोष कुमार वर्मा तथा प्रो. अभय द्विवेदी को धन्यवाद दिया।