Ratan Tata: जानें कैसे होगा रतन टाटा का अंतिम संस्कार, पारसी समुदाय में क्या है इसके नियम?-Video

October 10, 2024 by No Comments

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Ratan Tata Death: भारत के प्रसिद्ध उद्योगपति रतन टाटा के निधन के बाद पूरा देश शोक में डुबा हुआ है. मुम्बई के NCPA लॉन में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर रखा हुआ है और यहां पर सर्व धर्म प्रार्थना हो रही है. सिख समुदाय की तरफ से प्रार्थना हो रही है. सिख धर्मगुरु अरदास प्रार्थना कर रहे हैं. हिंदू धर्म गुरु, मुस्लिम धर्म गुरु भी उपस्थित हैं. सभी धर्म के गुरु बारी-बारी से शांति प्रार्थना पाठ कर रहे हैं. आम जनता उनके अंतिम दर्शन कर रही है और जाने-माने दिग्गज लगातार उनके साथ जुड़ी अपनी यादों को मीडिया के साथ शेयर कर रहे हैं.

तो दूसरी ओर वर्ली श्मशान घाट पर उनके अंतिम संस्कार को लेकर तैयारी की जा रही है. चूंकि रतन टाटा पारसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. हालांकि उनका अंतिम संस्कार हिंदू परंपराओं के अनुसार शमशान घाट पर किए जाने की खबर सामने आ रही है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने घोषणा की है कि भारत के ‘रत्न’ को पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाएगी.

आज शाम चार बजे वर्ली श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार होगा. प्रेयर हॉल में करीब 200 लोग मौजूद रहने की उम्मीद है. करीब 45 मिनट तक प्रेयर होगी. प्रार्थना हॉल में पारसी रीति से ‘गेह-सारनू’ पढ़ा जाएगा. रतन टाटा के पार्थिव शरीर मुंह पर एक कपड़े का टुकड़ा रख कर ‘अहनावेति’ का पहला पूरा अध्याय पढ़ा जाएगा. इसके बाद पार्थिव शरीर को इलेक्ट्रिक अग्निदाह में रखा जाएगा और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जाएगी. यहां आपको बता दें कि पारसी समुदाय में अंतिम संस्कार का तरीका बिल्कुल अलग होता है.

जानें पारसी समुदाय में कैसे होता है अंतिम संस्कार?

पारसी समुदाय में अंतिम संस्कार की परंपरा बिल्कुल अलग और अनूठी हैं. इस समुदाय में पार्थिव शरीर को न तो जलाया जाता है और न ही दफनाया जाता है. पारसी समुदाय के लोगों का मानना है कि मृत्यु के बाद शरीर को प्रकृति के पास लौटा देना चाहिए. इसीलिए वे मृतकों को ‘टावर ऑफ साइलेंस’ या ‘दखमा’ नामक एक खास चीज बनाकर उसमें रखते हैं.

जानें क्या होता है दमखा?

दमखा यानी टावर ऑफ साइलेंस एक खुली, गोल संरचना होती है. पारसी समुदाय बताता है कि इसके बीच में एक गड्ढा होता है. इस गड्ढे में पार्थिव शरीर को रखा जाता है और फिर आसपास के पक्षी या कहें गिद्ध इस शव को खाते हैं. इस तरह से पारसी समुदाय अपने मृतक के शरीर को प्रकृति के पास वापस लौटा देता है. पारसी समुदाय का मानना है कि आकाश, पृथ्वी और आग पवित्र हैं, इसलिए मृत शरीर को इनमें से किसी में भी नहीं मिलाया जाना चाहिए. वह अपनी परंपरा को पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद मानते हैं. क्योंकि इसमें किसी तरह के रसायन या प्रदूषण का उपयोग नहीं होता है लेकिन अब पुरानी हो चुकी इस परंपरा को बहुत ही कम लोग आगे बढ़ा रहे हैं. मालूम हो कि पारसी समुदाय में अंतिम संस्कार करने की ये परंपरा करीब 3 हजार साल पुरानी है.

कोविड महामारी के दौरान लगा दी गई थी रोक

हजारों साल पहले पर्शिया (ईरान) से भारत पारसी समुदाय भारत आया था. मालूम हो कि कभी मौजूदा ईरान यानी फारस को आबाद करने वाले इस समुदाय के लोग अब पूरी दुनिया में थोड़े से ही बचे हैं। उनकी आबादी को लेकर 2021 में एक सर्वे हुआ था इसके मुताबिक दुनिया में पारसियों की तादाद 2 लाख से भी कम है। अक्सर दुनिया के तमाम हिस्सों में इस समुदाय को अपने अंतिम संस्कार की अनोखी परंपरा के चलते मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। टावर ऑफ साइलेंस के लिए उचित जगह नहीं मिलने और चील व गिद्ध जैसे पक्षियों की कमी के चलते पिछले कुछ सालों में पारसी लोगों ने अपने अंतिम संस्कार के तरीके में बदलाव शुरू किया है।

तो वहीं रतन टाटा का अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाजों से किए जाने की वजह ये भी सामने आ रही है क्योंकि इससे पहले सितंबर 2022 में टाटा संस के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री का अंतिम संस्कार भी हिंदू रीति रिवाजों से किया गया था। ऐसा इसलिए क्योंकि कोरोना महामारी के समय शवों के अंतिम संस्कार के तरीकों में बदलाव हुए थे। तभी से पारसी समुदाय के अंतिम संस्कार की परंपरा पर रोक लगा दी गई थी.

भारत के आसमान से गायब हो चुका है गिद्ध

पारसी समुदाय के लोग बताते हैं कि उनके काइकोबाद रुस्तमफ्रैम हमेशा यही सोचते आए थे कि जब वह मरेंगे तो पारसी धर्म की परंपरा के अनुसार उनके शव को गिद्ध ग्रहण करेंगे और वे फिर से प्रकृति में मिल जाएंगे लेकिन अब भारत के आसमान सहित तमाम हिस्सों से गिद्ध पक्षी करीब-करीब गायब हो चुका है। पारसियों के लिए अपनी सदियों पुरानी परंपरा को बदलने के लिए इसे भी बड़ी वजह माना जा रहा है. इस तरह से अब कई पारसी परिवार अपने परिजनों को हिंदुओं के श्मशान घाट या विद्युत शवदाह गृह में ले जाने लगे हैं.

9 अक्टूबर की रात हुआ निधन

बता दें कि 7 अक्टूबर को दिग्गज उद्योगपति रतन टाटा अस्पताल में भर्ती हुए थे. तब उन्होंने खुद कहा था कि वह स्वस्थ्य हैं और रूटीन चेकअप के लिए अस्पताल आए हैं लेकिन कल उनकी अचानक हालत बिगड़ गई और मुम्बई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में उनका इलाज जारी रहा लेकिन 9 अक्टूबर की देर रात उनका निधन हो गया. इसके बाद उनका पार्थिव शरीर उनके कोलाबा स्थित घर पर रखा गया था फिर आज सुबह राजकीय सम्मान देने के लिए उनके घर पर पुलिस बैंड पहुंचा था. इसके बाद तिरंगे में लिपटे पार्थिव शरीर को NCPA लॉन में जनता के अंतिम दर्शन के लिए रखा गया है और लोग दर्शन कर रहे हैं.

1971 में रतन टाटा को मिली थी पहली बड़ी जिम्मेदारी

परिवार से जुड़ी कई कंपनियों में काम करने और अनुभव लेने के बाद 1971 में रतन टाटा को समूह की एक फर्म ‘नेशनल रेडियो एंड इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी’ का प्रभारी निदेशक नियुक्त किया गया था. इस तरह से उनको पहली बार 1971 में बड़ी जिम्मेदारी मिली थी. हालांकि रतन टाटा ने 1962 में कॉर्नेल विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क से वास्तुकला में बी.एस. की डिग्री प्राप्त करने के बाद पारिवारिक कंपनी में शामिल हो गए थे. 1991 में रतन टाटा टाटा इंडस्ट्रीज के चेयरमैन बने थे. तब उन्होंने अपने चाचा जेआरडी टाटा से टाटा समूह के चेयरमैन का पदभार संभाला था. जेआरडी टाटा पांच दशक से भी अधिक समय से इस पद पर रहे थे.

100 से अधिक देशों में कारोबार लेकिन हमेशा रहे सादगी से

मालूम हो कि रतन टाटा दो दशक से अधिक समय तक समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी ‘टाटा संस’ के चेयरमैन रहे और इस दौरान समूह ने तेज गति से विस्तार किया और सफलता की नई ऊंचाइयों को छुआ. उनके प्रतिनिधित्व के दौरान वर्ष 2000 में लंदन स्थित टेटली टी को 43.13 करोड़ रुपये अमेरिकी डॉलर में खरीदा, तो वहीं वर्ष 2004 में दक्षिण कोरिया की देवू मोटर्स के ट्रक-निर्माण परिचालन को 10.2 करोड़ अमेरिकी डॉलर में खरीदा, इसी के साथ ही एंग्लो-डच स्टील निर्माता कोरस समूह को 11 अरब अमेरिकी डॉलर में खरीदा और फोर्ड मोटर कंपनी से मशहूर ब्रिटिश कार ब्रांड जगुआर और लैंड रोवर को 2.3 अरब अमेरिकी डॉलर में खरीदा.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रतन टाटा के पास 30 से अधिक कंपनियां थीं जो 6 महाद्वीपों के 100 से अधिक देशों में फैली थीं. इन सबके बावजूद वह हमेशा सादगी भरा ही जीवन जीते रहे. मालूम हो कि रतन एन टाटा के निधन पर महाराष्ट्र, झारखंड सहित देश के कई राज्यों में राजकीय शोक घोषित किया गया है.

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