स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों में अनिवार्य हुआ “वंदेमातरम…” गाने होंगे राष्ट्रगीत के सभी 6 अंतरे-Video
Vande Mataram: केंद्र सरकार ने देश के राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को लेकर आज नई गाइडलाइन जारी कर दी है. इसी के साथ ही अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और सार्वजनिक आयोजनों में वंदे मातरम् गाना अनिवार्य होगा. नई गाइडलाइन में स्पष्ट किया गया है कि अगर राष्ट्रगीत वंदे मातरम और राष्ट्रगान जन गण मन साथ में गाए या बजाए जाते हैं, तो पहले वंदे मातरम् को ही गाया जाएगा.
तो वहीं नए नियमों के तहत निर्देश दिया गया है कि राष्ट्रगीत के सभी 6 अंतरे गाए जाएंगे. इनकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकंड है. मालूम हो कि अभी तक राष्ट्रगीत के मूल गीत के पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे.
क्या वजह थी केवल दो अंतरे ही गाने की?
दरअसल अभी तक केवल दो अंतरे ही गाए जाते थे, इसके पीछे का कारण एक विवाद था जो कि आजादी से पहले उठा था और फिर इसी वजह से तय किया गया कि इसके 2 अंतरे ही गाए जाएंगे. दरअसल गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने साल 1896 में इसे पहली बार गाया था और तभी इसका विरोध शुरू हो गया था.
दरसल विरोध की वजह वो शब्द थे जिसमें देवी का जिक्र किया गया था. इसको लेकर मुस्लिम नेताओं का कहना था कि इस गीत में देवी का वर्णन है और यह मूर्ति पूजा का अंग है जो कि इस्लाम में नामंजूर है. यही नहीं इस बात का भी तर्क दिया गया कि वंदे मातरम् में देश को देवी दुर्गा के रूप में दिखाया गया है. मतलब देवी दुर्गा यानी रिपुदलवारिणी जिन्हें दुश्मनों का नाश करने वाला माना गया है. जानकारों का कहना है कि मोहम्मद अली जिन्ना भी इस गीत को पसंद किया करते थे.
विरोध बढ़ने पर कांग्रेस ने बनाई थी कमेटी
इस गीत को लेकर मुस्लिमों का विरोध लगातार बढ़ता जा रहा था. इस पर 1937 में कांग्रेस ने एक कमेटी बनाई जिसमें रवींद्रनाथ ठाकुर के साथ ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद और पंडित जवाहरलाल नेहरू शामिल थे. कमेटी का उद्देश्य विवाद को सुलझाना था. तमाम विचार-विमर्श के बाद कमेटी ने कहा था कि इस गीत के शुरुआती दो अंतरे मातृभूमि की प्रशंसा में लिखे गए हैं और इसके बाद के अंतरे हिन्दू देवी-देवताओं पर हैं. इसी के बाद कमेटी ने फैसला किया गया था कि वंदे मातरम् के शुरुआती दो पदों को ही राष्ट्रगीत के रूप में गाया जाएगा.
मुस्लिम लीग को नहीं हुई संतुष्टि
जानकारों का कहना है कि इस गीत के देवी वाले अंश हटाए जाने के बाद भी मुस्लिम लीग के नेताओं को संतुष्टि नहीं मिली और फिर मोहम्मद अली जिन्ना ने 17 मार्च, 1938 को पंडित जवाहरलाल नेहरू से इस गीत को पूरी तरह त्यागने के लिए कहा. महात्मा गांधी से भी मुंबई (तब बंबई) में यही मांग की. हालांकि इस दौरान बहुत विवाद हुआ लेकिन आजादी के बाद 1950 में वंदे मातरम् को देश का राष्ट्रगीत घोषित किया गया. तो वहीं 24 जनवरी 1950 को देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने का वक्तव्य पढ़ा, जिसे स्वीकार कर लिया गया था.
ये पंक्तियां थीं विवाद की वजह
कोटि-कोटि कण्ठ कल-कल निनाद कराले,
कोटि-कोटि भुजैर्धेत खरकरवाले,
के बॉले मां तुमि अबले,
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम्,
रिपुदलवारिणीं मातरम्। वन्दे मातरम्।। 3।।
तुमि विद्या तुमि धर्म, तुमि हृदि तुमि मर्म,
त्वम् हि प्राणाः शरीरे, बाहुते तुमि मां शक्ति,
हृदये तुमि मां भक्ति, तोमारेई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे।
वन्दे मातरम् ।। 4।।
त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदलविहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,
नमामि कमलाम् अमलाम् अतुलाम्,
सुजलां सुफलां मातरम्।
वन्दे मातरम् ।। 5।।
कब लिखा गया था वंदेमातरम?
बता दें साल 1870 में वंदेमातरम लिखा गया था और 1882 में प्रकाशित हुआ था. बंकिम चंद्र चटर्जी ने वंदे मातरम् की रचना की थी. उन्होंने अपने संस्कृतनिष्ठ बांग्ला उपन्यास आनंदमठ में इस गीत के बारे में लिखा है. इस गीत में मातृभूमि और इसकी महानता के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है. शुरु के दौर में इस गीत को बंगाल में आजादी के आंदोलन में खूब गाया जाता था और फिर ये इतना लोकप्रिय हुआ कि धीरे-धीरे यह पूरे हिन्दुस्तान में गाया जाने लगा.
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