Pitru Paksha: घर में कैसे करें तर्पण… ? इस तरह लें संकल्प
Pitru Paksha: आश्विन मास की प्रतिपदा के साथ ही पितृपक्ष शुरू हो गए हैं. आजकल व्यस्त जीवनचर्या और नौकरी-बिजनेस की आपाधापी में लोग प्रतिदिन नदी किनारे जाकर तर्पण कार्य नहीं कर पाते. ऐसे में घर पर ही तर्पण कर लेते हैं. किसी तरह की कोई गलती न हो और आपके पितर प्रसन्न हों, इस पर सही तरीके से घर पर ही तर्पण कार्य करने की विधि बता रहे हैं पंडित रवि शास्त्री.
वह कहते हैं, प्रातःकाल पूर्व दिशा की और मुँह कर लें और बायें व दाहिने हाथ की अनामिका अंगुली में पवित्री (पैंती) धारण कर लें। यज्ञोपवीत को सव्य कर लें. इसके बाद तीन कुशाओं को बाँधकर ग्रन्थी लगाकर कुशाओं का अग्रभाग पूर्व में रखते हुए दाहिने हाथ में जौ, जल, और अक्षत लेने के बाद संकल्प पढ़ें…

पंडित रवि शास्त्री
“ऊँ विष्णुः विष्णुः विष्णुः। हरि: ॐ तत्सदद्यैतस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पन्न: अमुकशर्मा (वर्मा, गुप्त:) अहं श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त-फलप्राप्त्यर्थं पितृतर्पणं करिष्ये।”
इसके बाद एक तांबे अथवा चांदी के पात्र में सफेद चन्दन, चावल, सुगन्धित पुष्प के साथ ही तुलसीदल भी रख लें. इसके बाद उस पात्र के ऊपर एक हाथ या प्रादेश मात्र लम्बे तीन कुश रखें जिनका अग्रभाग पूर्व दिशा की ओर हो। इसके बाद उस पात्र में तर्पण के लिए जल भर दें. इसके बाद उसमें रखे हुए तीनों कुशों को तुलसी सहित सम्पुटाकार दायें हाथ में लेकर बायें हाथ से ढक लें और निम्नाङि्कत मंत्र पढ़ते हुए देवताओं का आवाहन करें…
ऊँ विश्वेदेवास ऽआगत श्रृणुता म ऽइम हवम्। एदं बर्हिनिषीदत॥ (शु. यजु. 7।34)
विश्वेदेवाः शृणुतेम हवं मे ये ऽअन्तरिक्षे य उप द्यवि ष्ठ।
येऽअग्निजिह्नाऽउत वा यजत्राऽआसद्यास्मिन्वर्हिषि मादयद्ध्वम्॥ (शु. यजु. 33।53)
आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेवा महाबलाः।
ये तर्पणेऽत्रा विहिताः सावधाना भवन्तु ते॥
इस तरह से आवाहन करने के बाद कुश का आसन दें और उन पूर्वाग्र कुशों द्वारा दायें हाथ की समस्त अङ्गुलियों के अग्रभाग यानी देवतीर्थ से ब्रह्मादि देवताओं के लिए पूर्वोक्त पात्र में से एक-एक अञ्जलि चावल मिश्रित जल लेकर दूसरे पात्र में गिराना चाहिए और नीचे दिए रूप से उन-उन देवताओं के नाम मन्त्र पढ़ते जाएं…
देवतर्पण
ऊँ ब्रह्मा तृप्यताम्। ऊँ विष्णुस्तृप्यताम्। ऊँ रुद्रस्तृप्यताम्।
ऊँ प्रजापतिस्तृप्यताम्। ऊँ देवास्तृप्यन्ताम्। ऊँ छन्दांसि तृप्यन्ताम्।
ऊँ वेदास्तृप्यन्ताम्। ऊँ ऋषयस्तृप्यन्ताम्। ऊँ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम्।
ऊँ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम्। ऊँ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम्। ऊँ संवत्सरः सावयवस्तृप्यताम्। ऊँ देव्यस्तृप्यन्ताम्। ऊँ अप्सरसस्तृप्यन्ताम्।
ऊँ देवानुगास्तृप्यन्ताम्। ऊँ नागास्तृप्यन्ताम्। ऊँ सागरास्तृप्यन्ताम्।
ऊँ पर्वतास्तृप्यन्ताम्। ऊँ सरितस्तृप्यन्ताम्। ऊँ मनुष्यास्तृप्यन्ताम्।
ऊँ यक्षास्तृप्यन्ताम्। ऊँ रक्षांसि तृप्यन्ताम्। ऊँ पिशाचास्तृप्यन्ताम्।
ऊँ सुपर्णास्तृप्यन्ताम्। ऊँ भूतानि तृप्यन्ताम्। ऊँ पशवस्तृप्यन्ताम्।
ऊँ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम्। ऊँ ओषधयस्तृप्यन्ताम्।ᅠऊँᅠभूतग्रामश्चतु-
र्विधस्तृप्यताम्।
ऋषितर्पण-
निम्नाङि्कत मन्त्र वाक्यों से मरीचि आदि ऋषियों को भी एक-एक अञ्जलि जल दें-
ऊँ मरीचिस्तृप्यताम्। ऊँ अत्रिास्तृप्यताम्। ऊँ अङि्गरास्तृप्यताम्।
ऊँ पुलस्त्यस्तृप्यताम्। ऊँ पुलहस्तृप्यताम्। ऊँ क्रतुस्तृप्यताम्।
ऊँ वसिष्ठस्तृप्यताम्। ऊँ प्रचेतास्तृप्यताम्। ऊँ भृगुस्तृप्यताम्।
ऊँ नारदस्तृप्यताम्॥
दिव्य मनुष्य तर्पण
इस प्रक्रिया के बाद जनेऊ को माला की भांति गले में धारण करें व उत्तराभिमुख होने के बाद नीचे दिए मन्त्र वचनों को दो-दो बार पढ़ते हुे दिव्य मनुष्यों के लिए दो-दो अञ्जलि यवसहित जल प्राजापत्यतीर्थ (कनिष्ठिका के मूल-भाग) से अर्पण करें।
ऊँ सनकस्तृप्यताम्॥2॥ ऊँ सनन्दनस्तृप्यताम्॥2॥
ऊँ सनातनस्तृप्यताम्॥2॥ ऊँ कपिलस्तृप्यताम्॥2॥
ऊँ आसुरिस्तृप्यताम्॥2॥ ऊँ वोढुस्तृप्यताम्॥2॥
ऊँ पञ्चशिखस्तृप्यताम्॥2॥
दिव्य पितृ तर्पण-
इस दौरान (जनेऊ को दायें कंधे पर रख लें) पूर्वोक्त पात्रस्थ जल में काला तिल मिलाकर पितृतीर्थ से (अंगूठा और तर्जनी के मध्य भाग से) दिव्य पितरों के लिए निम्नाङि्कत मन्त्र-वाक्यों को पढ़ते हुए तीन-तीन अञ्जलि जल दें।
ऊँ कव्यवाडनलस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै
स्वधा नमः।3॥ ऊँ सोमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः॥3॥ ऊँ यमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः।3॥ ऊँ अर्यमा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः।3॥ ऊँ अग्निष्वात्ताः पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्यः स्वधा नमः।3॥ ऊँ सोमपाः पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्यः स्वधा नमः।3॥ ऊँ बर्हिषदः पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्यः स्वधा नमः।3॥
यमतर्पण ऐसे करें
इस तरह से निम्नलिखित मन्त्र-वाक्यों को पढ़ते हुए चौदह यमों के लिये भी पितृतीर्थ से ही तीन-तीन अञ्जलि तिल सहित जल दें।
ऊँ यमाय नम :॥3॥ऊँ धर्मराजाय नम :॥3॥ ऊँ मृत्युवे नमः॥3॥ ऊँ अन्तकाय नम :॥3॥ ऊँ वैवस्वताय नम :॥3॥ ऊँ कालाय नमः॥3॥ ऊँ सर्वभूतक्षयाय नम :॥3॥ ऊँ औदुम्बराय नम :॥3॥ ऊँ दध्नाय नमः॥3॥ ऊँ नीलाय नम :॥3॥ ऊँ परमेष्ठिने नम :॥3॥ ऊँ वृकोदराय नम :॥3॥ ऊँ चित्रााय नम :॥3॥ ऊँ चित्रागुप्ताय नम :॥3॥
दक्षिण की ओर बैठकर आचमन कर बायाँ घुटना मोड़ जनेऊ तथा उत्तरीय को दाहिने कंधे पर कर पितृतीर्थ तर्जनी के मूल तथा कुशा के अग्र भाग और मूल से तिल सहित प्रत्येक नाम से दक्षिण में तीन-तीन अंजलि देवें। पवित्री दाहिने तथा तीन को बायें हाथ की अनामिका में धारण करें।
मनुष्य पितृ तर्पण ऐसे करें
इसके ब बाद अपने पितृगणों का नाम-गोत्र आदि उच्चारण करते हुए प्रत्येक के लिए पूर्वोक्त विधि से तीन-तीन अञ्जलि तिलसहित जल दे। यथा-
अमुकगोत्राः अस्मत्पिता (बाप) अमुकशर्मा वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गा जलं वा) तस्मै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्राः अस्मत्पितामहः (दादा) अमुकशर्मा रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्राः अस्मत्प्रपितामहः (परदादा) अमुकशर्मा आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्रा अस्मन्माता अमुकी देवी वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्रा अस्मत्पितामही (दादी) अमुकी देवी रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं तलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्रा अस्मत्प्रपितामही (परदादी) अमुकी देवी आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥
द्वितीय गोत्रतर्पण की विधि
तत्पश्चात द्वितीय गोत्र मातामह आदि का तर्पण कर लीजिए. इस विधि में भी पहले की ही भांति निम्नलिखित वाक्यों को तीन-तीन बार पढ़कर तिलसहित जल की तीन-तीन अञ्जलियाँ पितृतीर्थ से दे।
यथा –
अमुकगोत्राः अस्मन्मातामहः (नाना) अमुकशर्मा वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्राः अस्मत्प्रमातामहः (परनाना) अमुकशर्मा रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्राः अस्मद्वृद्धप्रमातामहः (बूढ़े परनाना) अमुकशर्मा आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्रा अस्मन्मातामही (नानी) अमुकी देवी वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्रा अस्मत्प्रमातामही (परनानी) अमुकी देवी रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ अमुकगोत्रा अस्मद्वृद्धप्रमातामही (बूढ़ी परनानी) अमुकी देवी आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै
स्वधा नमः॥3॥
इसके बाद सव्य होकर पूर्वाभिमुख हो नीचे लिखे श्लोकों को पढ़ते हुए धीरे-धीरे जल गिराना चाहिए…
देवासुरास्तथा यज्ञा नागा गन्धर्वराक्षसाः ।
पिशाचा गुह्मकाः सिद्धाः कूष्माण्डास्तरवः खगाः ॥
जलेचरा भूनिलया वाय्वाधाराश्च जन्तवः ।
प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिलाः ॥
नरकेषु समस्तेषु यातनासु च ये स्थिताः ।
तेषामाप्यायनायैतद् दीयते सलिलं मया ॥
येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः ।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु ये चास्मत्तोयकाङि्क्षणः ॥
ऊँ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः ।
तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः ॥
अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम् ।
आब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम् ॥
येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः ।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्तेन वारिणा
भीष्म तर्पण
तत्पश्चात दक्षिणाभिमुख हो पितृतर्पण के समान ही जनेऊ अपसव्य करके हाथ में कुश धारण किये हुए ही बालब्रह्मचारी भक्तप्रवर भीष्म के लिए पितृतीर्थ से तिलमिश्रित जल के द्वारा तर्पण करें। उनके तर्पण का मन्त्र बोलें जो कि नीचे दिया है…
वैयाघ्रपदगोत्राय साङ्कृतिप्रवराय च।
गङ्गापुत्राय भीष्माय प्रदास्येऽहं तिलोदकम्।
नीचे दिए वाक्य पढ़कर यह तर्पण-कर्म भगवान् को समर्पित करें
अनेन यथाशक्तिकृतेन देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणाखयेन कर्मणा भगवान् मम समस्तपितृस्वरूपी जनार्दनवासुदेवः प्रीयतां न मम।
जो लोग भी घर में ठीक प्रकार से तर्पण नहीं कर पाते है वो चाहे तो ऑनलाइन हम सुबह तर्पण करवाते है तो आप शामिल हो सकते है
DISCLAIMER: यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)
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