UP MDM: यूपी के तमाम जिलों को मिली मिड डे मील की कन्वर्जन कॉस्ट लेकिन “ऊंट के मुंह में जीरा” के समान, रसोइयों को अभी और करना होगा इंतजार, देखें पूरी जानकारी

September 14, 2022 by No Comments

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लखनऊ (अर्चना शुक्ला)। खबर स्टिंग (khabarsting.com) पर 13 सितम्बर को प्रमुखता से शीर्षक (UP MDM:यूपी के तमाम जिलों में बंदी की कगार पर पहुंची मिड डे मील योजना, अप्रैल से नहीं मिली कन्वर्जन कॉस्ट, ग्राम प्रधानों का नहीं सहयोग, निजी खर्च करने वाले शिक्षकों ने खड़े किए हाथ, मानदेय को तरस रहे रसोइयां, जानें क्या रहा मंत्री जी और अधिकारियों का रवैया) से खबर प्रकाशित की गई थी और मिड डे मील कन्वर्जन कॉस्ट के साथ ही रसोइया मानदेय की समस्या का मामला उठाया गया था। इस पर शासन द्वारा 14 सितम्बर को तमाम जिलों के लिए ग्रांट जारी कर दी गई है, लेकिन कुछ जिलों में वो भी ऊंट के मुंह में जीरे के समान बताई जा रही है।

बता दें कि उत्तर प्रदेश (UP) के तमाम जिले मिड डे मील कन्वर्जन कॉस्ट अप्रैल से न मिलने के कारण तमाम समस्याओं से जूझ रहे थे। तो वहीं रसोइयां भी आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। हालांकि 14 सितम्बर को प्रयागराज, कानपुर, मेरठ, बाराबंकी, बरेली, बनारस, झांसी सहित तमाम जिलों में कन्वर्जन कॉस्ट भेजी गई है।


देखें एक बानगी
अगर बात करें प्रयागराज की तो यहां चूंकि अक्षय पात्र संस्था खाना वितरित करती है तो इस जिले में कोई समस्या नहीं है। यहां केवल दो ब्लाकों में खाना ग्राम प्रधान व शिक्षकों की मदद से पकाया जाता है। इसलिए यहां इन दोनों ब्लाकों के लिए कन्वर्जन कॉस्ट का भुगतान हो गया है। अगर कोई समस्या है तो वो है रसोइया मानदेय का। यहां रसोइया मानदेय के नाम पर इतना पैसा दिया गया है कि केवल अप्रैल का ही मानदेय मिल सकेगा। जबकि बकाया अप्रैल से लेकर सितम्बर तक है। बता दें कि 2000 रुपए प्रतिमाह रसोइयों का मानदेय निर्धारित है।

तो वहीं कानपुर की बात करें तो यहां ऊंट के मुंह में जीरा के समान ग्रांट आई है, जो कि एक महीने के लिए भी पूरा नहीं पड़ेगा। अर्थात अप्रैल से सितम्बर तक में जहां करीब 12 करोड़ चाहिए था, तो ग्रांट केवल 1 करोड़ 44 लाख ही मिली है। इसी तरह रसोइया मानदेय के नाम पर मात्र एक महीने का मानदेय ही मिल सका है। अर्थात मई से लेकर सितम्बर तक के मानदेय के लिए आर्थिक रूप से कमजोर रसोइयों को अभी और इंतजार करना होगा।

अगर बात करें बाराबंकी की तो यहां मिड डे मील कन्वर्जन कॉस्ट को लेकर कोई समस्या नहीं है। तो वहीं मेरठ में रसोइयों का मानदेय इतना मिला है कि जुलाई तक मानदेय दिया जा सकता है, तो वहीं कन्वर्जन कॉस्ट के मामले में भी इस जिले की स्थिति ठीक है। कमोबेस ऐसी ही मिली-जुली स्थिति उन तमाम जिलों में है, जहां अक्षय पात्र खाना वितरित नहीं करता है। बता दें कि मिड डे मील योजना सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद शुरू की गई थी। इस योजना के लिए गेहूं और चावल तो सरकार देती है, लेकिन तेल, मसाले, ईंधन, दूध आदि के लिए अलग से प्रति बच्चे के हिसाब से कन्वर्जन कॉस्ट दी जाती है, जो कि इस साल अप्रैल से नहीं मिल रही थी, इस पर शिक्षक अपने खर्चे व किसी न किसी एनजीओ की मदद से इस योजना को बंद होने से रोके हुए थे, लेकिन कन्वर्जन कॉस्ट सितम्बर तक न मिलने के कारण शिक्षक भी परेशान हो गए थे। फिलहाल अभी भी इनकी समस्या का पूरा समाधान सरकार नहीं कर सकी है।