UP Block Transfer Issue: बेसिक स्कूल की महिला टीचर्स के लिए भी नहीं चिंतित योगी सरकार, नदी-नाले और जंगल पार करते हुए शिक्षिकाएं जा रही हैं स्कूल, बाढ़ में डूबी शिक्षिका की कार को ट्रैक्टर से निकलवाया, वीडियो में देखें पूरी हकीकत
वैसे तो योगी सरकार महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करती हुई नजर आती है, लेकिन इसकी जमीनी हकीकत कुछ और ही है। इसका ताजा उदाहरण बेसिक शिक्षा विभाग के स्कूलों में कार्यरत महिला टीचर्स का सामने आया है। शिक्षिकाएं नदी-नाले व जंगल पार करते हुए प्रतिदिन स्कूल पढ़ाने जा रही हैं, लेकिन सरकार को जरा भी होश नहीं कि नियम पूरे कर लेने वाली शिक्षिकाओं को पिछड़े ब्लाकों से वापस अगड़े ब्लाकों में लाया जाए।
बता दें कि ब्लॉक व जनपद के भीतर पिछले करीब 13 सालों से ट्रांसफर न होना बेसिक शिक्षकों के लिए सिर दर्द बन गया है। महीनों से की जा रही इसकी मांग करने के बावजूद योगी सरकार ने न तो अपनी पिछली सरकार में इस सम्बंध में कोई निर्णय लिया था और न अब ले रही है। इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा महिला शिक्षक व दिव्यांग शिक्षक परेशान है।
शिक्षक-शिक्षिकाओं का कहना है कि जिनकी नई तैनीती हुई है, उन्होंने सुविधा वाले स्कूल अर्थात अगड़े ब्लाकों के स्कूल दे दिए गए हैं और जो पुराने शिक्षक हैं, और पांच साल से अधिक समय से पिछड़े ब्लाकों में तैनात हैं, उनके लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। जबकि नियम के मुताबिक नई तैनीती वालों को पहले पिछड़े ब्लाकों में ही नियुक्त करने का नियम है और 5 साल की ड्यूटी पूरी होने के बाद अगड़े ब्लाकों में ट्रांसफर दिया जाना चाहिए, लेकिन न जाने किस नियम के तहत पूरे प्रदेश में ये कार्य किया जा रहा है। फिलहाल कुछ शिक्षिकाओं ने बिजनौर जिले से अपने स्कूल जाने वाले रास्तों के वीडियो व फोटो शेयर किए हैं, जिसमें साफ दिखाई दे रहा है कि वह कितने मुश्किल भरे रास्तों से होकर पिछले पांच सालों से स्कूल जा रही हैं।
जानें क्या है नियम
नियम के मुताबिक जिन शिक्षकों व शिक्षिकाओं ने पिछड़े ब्लॉकों में पांच साल तक नौकरी कर ली है, उनको अगड़े ब्लॉको में लाया जाता है और अगड़े ब्लाकों के शिक्षकों को पिछड़े ब्लाकों में भेजा जाता है, लेकिन ब्लाक व जनपद के भीतर ट्रांसफर की प्रक्रिया न तो योगी से पहले की सरकार ने शुरू की और न ही योगी सरकार द्वारा इस सम्बंध में कोई ठोस निर्णय लिया जा रहा है।
देखें क्या कहा महिला टीचर्स ने
महिला टीचर्स का कहना है कि इस सम्बंध में बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह से लेकर स्कूल शिक्षा महानिदेशक विजय किरन आनन्द तक से मांग की है, लेकिन कोई भी उनकी मांग को नहीं सुन रहा है। अधिकारी कहते हैं कि अगर ड्यूटी नहीं कर पा रही हो तो नौकरी छोड़ दो। शिक्षिकाएं कहती हैं कि इस तरह के जवाब सुनने को मिलते हैं, जबकि हमने तो नियम के आधार पर पिछड़े ब्लाकों में नौकरी कर ली है, तब अधिकारी इस तरह की बातें करते हैं। जो पहले से मलाई खा रहे हैं, वो मौज काट रहे हैं।
शिक्षक नेता भी हमारी आवाज को नहीं उठा रहे हैं। क्योंकि इन सबमें उनका भी नुकसान है। क्योकि शिक्षक नेता सालों से अगड़े ब्लाकों में जमे हुए हैं। बता दें कि शिक्षिकाएं और दिव्यांग शिक्षक अपने ही गृहजनपद में 80 से 150 किलोमीटर की दूरी पर नौकरी करने के लिए स्कूल जा रहे हैं। शिक्षिकाएं बताती हैं कि स्कूल जाने के दौरान कई तो ऐसी जगह पड़ती हैं, जहां कोई साधन नहीं मिलता। हम शिक्षिकाओं ने पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाते हुए पिछड़े ब्लाकों के स्कूलों में जमकर काम किया है लेकिन अब जब पांच साल से अधिक हो गए हैं एक स्कूल में, तो अपने अधिकार की मांग कर रहे हैं।