Parama Ekadashi: ‘परमा एकादशी’ 27 मई को…पुरुषोत्तम मास में है इसका खास महत्व; भूलकर भी न करें ये काम

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Parama Ekadashi In Purushottam Month: हिंदू यानी सनातन धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में सबसे अधिक शुभ माना जाता है. वैसे तो एक साल में 24 एकादशी आती हैं, लेकिन जब हिंदू पंचांग में ‘अधिकमास’ यानी पुरुषोत्तम मास (मलमास) जुड़ जाता है तो इसकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है और अधिकमास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली इसी विशेष एकादशी को परमा एकादशी कहते हैं.

यह एकादशी का व्रत तीन साल में केवल एक बार ही आता है, क्योंकि अधिकमास भी तीन साल में एक बार ही पड़ता है. यही वजह है कि इस एकादशी का महत्व बढ़ जाता है. आचार्य कमलकांत कुलकर्णी कहते हैं कि इस व्रत को गाय का दूध ग्रहण कर किया जा सकता है.

इस बार यह एकादशी 27 मई दिन बुधवार को पड़ रही है.

ऐसे करें पूजा

सुबह यानी ब्रह्म मुहूर्त में उठें और स्नान करें. साथ ही हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प करें.
मंदिर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर, पूजा की तैयारी करें.
भगवान को पीले फूल के साथ ही ऋतु फल, धूप, दीप और पंचामृत अर्पित करें.
श्रीहरि को पीले रंग की मिठाई का भोग अवश्य लगाएं.
भोग में तुलसी दल अवश्य रखें. माना जाता है कि इसके बिना विष्णु जी भोग स्वीकार नहीं करते हैं. चूंकि इस दिन तुलसी जी को छुआ नहीं जाता है तो एक दिन पहले ही तुलसीदल तोड़कर रख लें.
भगवान के सामने बैठकर परमा एकादशी की विधि-विधान से पूजा कर व्रत कथा पढ़ें या सुनें.
तत्पश्चात विष्णु जी और माता लक्ष्मी की आरती करें.
हो सके तो इस दिन रात में रात जागरण करें यानी सोए नहीं.
मान्यता है कि विष्णु सहस्रनाम का पाठ या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का मानसिक जाप करते हुए रात्रि जागरण करने से सुख-समृद्धि-वैभव मिलता है.
दूसरे दिन वेदपाठी ब्राह्मण को भोजन कराएं व दान-दक्षिणा देने के बाद शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण करें.

ये कार्य न करें

एकादशी के दिन चावल का सेवन करने से बचें.
इस दिन दूसरों की बुराई न करें. साथ ही क्रोध न करें और झूठ न बोलें. मन को पूरी तरह सात्विक रखें.
भोजन भी सात्विक ही करें, हो सके तो इस दिन प्याज और लहसुन का भी त्याग करें.

परमा एकादशी व्रत का महत्व

आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि परमा का अर्थ होता है सर्वश्रेष्ठ. पौराणिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत रखने से मनुष्य को सोने का दान और अश्वमेध यज्ञ के बराबर फल मिलता है. इस व्रत को करने से आर्थिक तंगी व पापों से छुटकारा मिलता है. भगवान कृष्ण ने अर्जुन को इस व्रत की महिमा बताई थी और कहा था कि जो व्यक्ति इस दिन पूरी श्रद्धा से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करता है, उसे मृत्यु के बाद बैकुंठ धाम में स्थान मिलता है लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि व्रत के दौरान पूरी तरह से मन को एकाग्र कर ही पूजा करें.

DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। किसी भी धार्मिक कार्य को करते वक्त मन को एकाग्र अवश्य रखें। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)

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