Kajali Teej 2022: 14 अगस्त को मनाई जाएगी “बड़ी तीज”, जानें दुल्हनें इस दिन कौन सी तीन बातों का करती हैं त्याग, गौ पूजा का भी है विधान, पढ़ें कथा, देखें गीत, वीडियो
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तीज को जिस तरह हरियाली तीज का उत्सव मनाया जाता है, ठीक उसी तरह भादो मास के कष्ण पक्ष की तीज को कजरी तीज का त्योहार मनाया जाता है। इसे बड़ी तीज भी कहते हैं। इस बार कजरी तीज 14 अगस्त दिन रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन महेश्वरी, वैश्य जौ, गेहूं, चने और चावल के सत्तू में घी, मेवा डालकर उससे तरह-तरह के पकवान बनाते हैं और फिर चंद्रोदय के बाद उसी का भोजन करते हैं। इसी कारण इसे सातूड़ी तीज अथवा सतवा तीज भी कहते हैं।

आचार्य विनोद कुमार मिश्र बताते हैं कि भाद्रपद मास के तीसरे दिन अर्थात भाद्रपद कृष्ण तृतीया तिथि विशेष फलदायी होती है, क्योंकि यह तिथि माता पार्वती को समर्पित है। इस दिन भगवान शंकर तथा माता पार्वती के मंदिर में जाकर उन्हें भोग लगाने तथा विधि-विधान पूर्वक पूजा करने से सभी सुखों की प्राप्ति होती है। इस दिन कजरी तीज का उत्सव भी मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को फूल-पत्तों से सजे झूले में झुलाया जाता है। चारों तरफ लोक गीतों की गूंज सुनाई देती है। कई जगह झूले बांधे जाते हैं और मेले लगाए जाते हैं। नवविवाहिताएं जब विवाह के बाद पहली बार पिता के घर आती हैं तो तीन बातों के तजने (त्यागने) का प्रण लेती है- पति से छल कपट, झूठ और दुर्व्यवहार और दूसरे की निंदा।

कजली तीज पर गौ पूजा का भी दिया है विधान
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि कहीं-कहीं पर इस दिन भी हरियाली तीज की तरह ही सिंजारे भेजे जाते हैं और बहुएं सास को चीनी व रुपए का बायना निकालकर देती हैं। आज के दिन विशेष रूप से गायों की पूजा का भी विधान बताया गया है। आटे की सात लोइयां बनाकर उन पर घी, गुड़ रखकर गाय को खिलाने के बाद ही भोजन करना चाहिए।
नावों पर गाया जाता है कजरी तीज गीत
यह त्योहार खासकर मिर्जापुर और बनारस जिले व पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ ही बिहार में कजरी तीज के रूप में मनाया जाता है। इस दिन नावों पर बैठकर कजरी तीज के गीत गाने की भी परम्परा है। ब्रज के मल्हारों की ही तरह मिर्जापुर तथा बनारस का यह प्रमुख वर्षागीत माना जाता है। आज के ही दिन घरों में मिष्ठान और पकवान बनाए जाते हैं और झूले भी डाले जाते हैं। ग्रामीण भाषा में इसे तीजा भी कहते हैं।
कजली तीज कथा

