Ahoi Ashtami-2022: अहोई अष्टमी पर देखें उजमन विधि, 17 अक्टूबर को माताएं संतान प्राप्ति व बच्चों के सुख के लिए रखेंगी निर्जला व्रत, पढ़ें कथा

October 16, 2022 by No Comments

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अहोई अष्टमी विशेष। कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई अष्टमी के नाम से जाना जाता है। इस बार यह व्रत 17 अक्टूबर 2022 को पड़ रहा है। इस दिन माताएं संतान की दीर्घायु के साथ ही संतान प्राप्ति व संतान के सुख के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। दिन भर बिना पानी पिए यह व्रत करने के बाद शाम को तारा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करती हैं।

दीपावली से एक सप्ताह पहले पड़ने वाला यह व्रत दीपावली के आगमन का शुभ संकेत देता है और लोगों को संदेश देता है कि माता लक्ष्मी की पूजा की तैयारी कर लें। मान्यता है कि यह व्रत न केवल बच्चों की दीर्घायु के लिए किया जाता है बल्कि इस व्रत को वे पति-पत्नी भी कर सकते हैं, जिनकी संतान नहीं है। मान्यता है कि इस दिन पति-पत्नी दोनों व्रत रखकर विधि पूर्वक शिव जी की पूजा करें तो उनकी यह इच्छा भी पूरी हो सकती है। इस बार शिव योग व सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है। इस बार का व्रत अति पुण्यदायी बताया जा रहा है।

देखें उजमन विधि
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि जिन माताओं को बेटा हुआ होता है या बेटे की शादी के बाद पहली अहोई अष्टमी पड़ती है, वे अहोई माता का उजमन करती हैं। इसके अंतर्गत एक थाली में सात जगह चार-चार पूड़ियां रखकर, उसके ऊपर हलवा रखना होता है, फिर एक साड़ी-ब्लाउज व रुपए रखकर थाली के चारों तरफ हाथ फेरकर सास के पांव छूकर सारा सामान उनको भेंट कर दें।

पूजन विधि
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि इस दिन शाम के समय दीवार पर आठ कोनों वाली एक पुतली अंकित की जाती है। इसी पुतली के पास ही स्याहू माता (सेई) तथा उनके बच्चों के चित्र बनाए जाते हैं। इसके बाद जहां पूजा कर रहे हैं, उस जगह व जमीन को शुद्ध करने के बाद लोटे में जल भरकर, एक पटरे पर कलश की भांति रखकर अहोई माता की कथी सुननी चाहिए। मान्यता के अनुसार पूजा से पहले एक चांदी की अहोई और चांदी के दो मोती भी बनवाने चाहिए। जिस प्रकार गले में पहनने के हार में पैंडिल लगा होता है, उसी प्रकार चांदी की अहोई लगवाएं और डोरे में चांदी के दाने डलवा लें। फिर अहोई की रोली, चावल, दूध व भात से पूजा करें। जल से भरे कलश पर सतिया बना लें और सात दानें गेहूं के लेकर कथा सुनें। इसके बाद अहोई माला गले में पहन लें तथा जो बायना निकाल कर रखा था उसे सास के पांव छूकर उन्हें दे दें। इसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य दें और फिर भोजन करें।

पढ़ें कथा

DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। किसी भी धार्मिक कार्य को करते वक्त मन को एकाग्र अवश्य रखें। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)