Punjab: किसान की बेटी सेना में बनी लेफ्टिनेंट…जानें कैसे मिली सफलता?
Punjab: पंजाब के पठानकोट में एक किसान की बेटी पल्लवी ने भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बनकर पूरे घर-परिवार, गांव से लेकर जिले तक का नाम रोशन कर दिया है. इस खबर के सोशल मीडिया पर वायरल होते ही पल्लवी घर पर बधाई देने वालों की लाइन लगी रही. तो दूसरी ओर पल्लवी ने अपनी सफलता का सारा श्रेय परिवार को दिया है.
सीडीएस में हासिल की थी 6वीं रैंक
मालूम हो कि पल्लवी पठानकोट जिले के सीमावर्ती इलाके गुलपुर सिंबली गांव की रहने वाली हैं. लेफ्टिनेंट पल्लवी ने पठानकोट से 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद चंडीगढ़ से ग्रेजुएशन किया है और फिर कंबाइंड डिफेंस सर्विसेज (CDS) की परीक्षा में पूरे देश में छठा स्थान (एआईआर-6) हासिल किया है। 11 महीने की ट्रेनिंग के बाद सात सितंबर को वह पास आउट हुईं।
बेटी को पढ़ाने के लिए करना पड़ा संघर्ष
पल्लवी के पिता रविंद्र सिंह कहते हैं कि मैं एक छोटा किसान हूं. मेरे पास आमदनी बहुत ज्यादा नहीं थी. इसीलिए मुझे अपनी बेटी को पढ़ाने के लिए बहुत अधिक संघर्ष करना पड़ा। वह कहते हैं कि उनका मेरा एकमात्र लक्ष्य अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाना और बड़ा आदमी बनाना था। वह कहते हैं कि “मैंने पंजाबी स्कूल से पढ़ाई की है लेकिन मैं हमेशा से ही अपने बच्चे को अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहता था। उन्होंने बताया कि मेरे दो बच्चे हैं। मेरा बेटा पांच साल से भारतीय नौसेना में काम कर रहा है और अब बेटी पल्लवी भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बन गई है.” उन्होंने ये भी कहा कि मैंने पल्लवी को अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढ़ाया। 12वीं पास करने के बाद वह ग्रेजुएशन के लिए आर्मी एकेडमी चली गई। आज मेरी बेटी लेफ्टिनेंट बनकर मेरे सामने खड़ी है।”
भाई हैं नौ सेना में
पल्लवी के भाई साहिल सिंह भारतीय नौसेना में कार्यरत हैं। वह अपनी बहन की सफलता को लेकर कहते हैं कि “मेरी बहन बचपन से ही मेहनती थी। खेल से लेकर पढ़ाई तक, सभी क्षेत्रों में वह हमेशा आगे रही है। स्कूल में, चाहे वाद-विवाद प्रतियोगिता हो या खेलकूद प्रतियोगिता, उसने हमेशा बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और जीत हासिल की। यही कारण है कि वह आज लेफ्टिनेंट बनकर सबके सामने खड़ी है।”
किसी चीज को पाना चाहते हैं तो वह जरूर मिलती है
पल्लवी का कहना है कि संघर्ष का सफर बहुत अच्छा रहा है। अगर आप किसी चीज को पाने के लिए मेहनत करते हैं, तो वह जरूर मिलती है। इस मुकाम तक पहुंचने में परिवार के लोगों ने उनका भरपूर साथ दिया। पिछड़े गांव से आने के कारण यहां तक पहुंचना संघर्षपूर्ण रहा। यह उपलब्धि पूरे समाज की है।