Holi: इन ब्राह्मणों ने नहीं खेली फूलों-रंगों से होली…दागी बंदूकें और तोपें; जानें क्यों? Video

March 2, 2026 by No Comments

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Holi: सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें तोपें और बंदूकें गरजती हुई दिखाई दे रही हैं. ऐसा लग रहा है कि मानों कहीं युद्ध हो रहा हो, जिसने भी ये वीडियो देखा वो इसके बारे में जाने बगैर नहीं रह सका. दरअसल मेवाड़ के उमराव मेनारिया ब्राह्मणों ने मुग़लों पर विजय के उपलक्ष्य में होली उत्सव मनाया था और करीब 400 सालों से ये परम्परा राजस्थान में चली आ रही है. ब्राह्मण यहां पर जमराबीज शौर्य पर्व होली के मौके पर मनाते हैं और इस दौरान जमकर हवाई फायरिंग की जाती है और खूब तोपें चलाई जाती हैं.

इस अनूठी होली को देखने के लिए देश-विदेश से लोग भारत के राजस्थान में पहुंचते हैं. कहा जाता है कि यहां पर फूलों या रंग-अबीर से होली नहीं खेली जाती बल्कि बंदूकों और तोपों की होली खेली जाती है. यह अनूठी परम्परा दक्षिणी राजस्थान के मेनार गांव में की है.

सोशल मीडिया पर इतिहासकार चंद्रशेखर शर्मा का एक बयान वायरल हो रहा है जिसमें उन्होंने जानकारी दी है कि उदयपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर मेनार गांव है. यहां पर होली के मौके पर यानी जमराबीच के मौके पर इस गांव में बंदूक और तोप की आवाजें सुनाई देती है. मेनार गांव की ये होली इतिहास की एक बड़ी कहानी से जुड़ी है. दरअसल उमराव मेनारिया ब्राह्मणों ने जब मुगलों को हराया था तब विजयी होली को इसी तरह मनाया था और तभी से ये परम्परा यहां पर चली आ रही है.

होली पर शाम होते ही गांव में तोपों व बंदूकों की होली की तैयारियां शुरू हो जाती हैं और मेनार गांव में मेनारिया समाज के लोग अपने हाथों में गोला-बारूद के साथ होली खेलना शुरू कर देते हैं. इस खास मौके के लिए पूरे गांव को दुल्हन की तरह सजाया जाता है और खूब रंग-बिरंगी लाइट्स लगाई जाती है. सूर्य के ढलने के साथ ही बंदूकें और गोला-बारूद गरजने लगता है जो कि याद दिलाता है कि किस तरह से यहां के रणबांकुरों ने मुगल आक्रांताओं को धूल चटाई थी.

मेनार के पास होती थी मुगलों की एक छावनी

इतिहासकार ने आगे बताया है कि जब महाराणा प्रताप ने मुगलों से संघर्ष के लिए हल्दीघाटी के युद्ध को शुरू किया था तब उन्होंने मेवाड़ के हर व्यक्ति को इससे जुड़ने का आह्वन किया था. इस पर अमर सिंह के नेतृत्व में मुगलों के ठिकानों पर जोरदार हमले किए जा रहे थे. उसी समय मेनार के पास मुगलों की एक छावनी भी होती थी और इस छावनी में रहकर मुगल आस-पास के गांवों में खूब अत्याचार किया करते थे.

फिर मुगलों के अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए ही मेनार के गांववालों ने मुंहतोड़ जवाब देने की योजना बनाई और फिर छावनी पर आक्रमण कर दिया. गांववालों के प्रहार से मुगल सेना हार गई और भाग खड़ी हुई. इसी जीत की याद में ये अनूठी होली हर साल मनाई जाती है. सोशल मीडिया पर वायरल खबरों के मुताबिक, आज के आधुनिक युग में गांव के जो युवा सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, दुबई, लंदन और अमेरिका में जाकर बस गए हैं वो भी इस मौके पर गांव पहुंचते हैं और इस पारम्परिक उत्सव में शामिल होता है. जमराबीज की रात मेनार कस्बा दिपावली की तरह रोशन किया जाता है और फिर यहां शौर्य की गाथा एक अनोखे अंदाज में गाई जाती है.

राजस्थान के इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने भी अपनी पुस्तक ‘द एनालिसिस ऑफ राजस्थान’ में मेनार गांव का जिक्र किया है और पुस्तक में मनिहार नाम के गांव कहकर सम्बोधित किया गया है. इस गांव का संबंध महाराणा प्रताप के पिता उदय सिंह से भी जुड़ा हुआ है. होली के मौके पर गांव के लोग रात में अपनी पारम्परिक वेषभूषा यानी पूर्व रजवाड़े के सैनिकों की पोशाक जैसे धोती कुर्ता, कसुमल पाग से सजे होते हैं और फिर बंदूकों व तोपों से होली उत्सव मनाया जाता है.

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