हर 8 मिनट में एक युवा कर रहा है आत्महत्या…! जानें भारत में साल भर में कितने लोग कर लेते हैं सुसाइड? विशेषज्ञों ने दी ये सलाह
World Suicide Prevention Day: हर साल 10 सितम्बर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस (World Suicide Prevention Day) मनाया जाता है. इस दिन को मनाने का उद्देश्य आत्महत्या के मामलों को कम करना है और जागरुकता कार्यक्रम चलाकर लोगों को निराशा से मुक्त कराना है ताकि लोगों के मन में खासतौर से युवाओं के मन में किसी भी तरह से आत्महत्या का ख्याल न आ सके.
मालूम हो कि आत्महत्या एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है. इसके कारण हर साल दुनिया भर में 7,00,000 से ज़्यादा मौतें होती हैं। अगर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े देखें तो 2022 में भारत में आत्महत्या से 1.71 लाख लोगों की मौत हो गई। आत्महत्या की दर बढ़कर 12.4 प्रति 1,00,000 हो गई, जो अब तक की सबसे ज्यादा है। आत्महत्या करने वालों में 40 प्रतिशत से अधिक 30 वर्ष से कम आयु के युवा हैं। हर आठ मिनट में एक युवा भारतीय आत्महत्या कर रहा है।
मंगलवार को ‘विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस’ पर ‘द लैंसेट जर्नल’ में प्रकाशित एक नए अध्ययन में एक विशेषज्ञ ने बताया कि आत्महत्या से होने वाली मौतों की सबसे ज्यादा संख्या भारत में है. एक आंकड़े के मुताबिक, भारत में आत्महत्या के कारण हर साल 1,70,000 से अधिक लोग काल के मुंह में समा जाते हैं. तो वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि देश में आत्महत्या के मामलों को रोकने के लिए मानसिक स्वास्थ्य से आगे भी ध्यान देना जरूरी है। इसी के साथ ही विशेषज्ञ ये भी बताते हैं कि “लोगों के आत्महत्या करने के लिए मजबूर होने के कई कारण हैं जैसे, परिवार का तनावपूर्ण माहौल, अस्थिर भावनात्मक स्वास्थ्य, नशीले पदार्थों का सेवन, आपसी संबंधों में असफलता, दोस्तों के बीच खराब संबंध और अकेलापन।”
मानसिक स्वास्थ्य से आगे देना होगा ध्यान
पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया (PHFI) में सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्रोफेसर डॉ. राखी डंडोना का एक बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें उन्होंने कहा है कि सामाजिक कारणों को भी राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीतियों में शामिल किया जाना चाहिए। यह भारत के लिए विशेष रूप से जरूरी है, जिसने 2022 में राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति जारी की। इसमें विशेषज्ञों ने मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ गरीबी, कर्ज, घरेलू हिंसा और सामाजिक अलगाव को भी आत्महत्या के लिए जिम्मेदार माना।
इसी के साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि “दुर्भाग्य से आत्महत्या को अब तक एक अपराध के रूप में कलंकित किया गया है, लेकिन आत्महत्या वास्तव में एक जटिल सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा है। अब तक आत्महत्या की रोकथाम के लिए मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित किया गया है, लेकिन आत्महत्या की रोकथाम के लिए हमें मानसिक स्वास्थ्य से आगे ध्यान देने की जरूरत है।”
वहीं एक अनुमान के मुताबिक भारत में किशोरावस्था (15-19 वर्ष) के बीच आत्महत्या मृत्यु का चौथा बड़ा कारण है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, आत्महत्या के सभी मामलों में से 40 प्रतिशत से अधिक मामले 30 वर्ष से कम आयु के युवाओं में होते हैं।
एम्स के मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर नंद कुमार का एक बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें वह कह रहे हैं कि “भारत में आत्महत्या करने वाले युवाओं की संख्या बहुत अधिक है। भारत में आत्महत्या करने वाले युवाओं की संख्या वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी है। भारत में प्रतिदिन लगभग 160 युवा आत्महत्या करते हैं।”