Nirjala Ekadashi: इतने घंटे पानी न पीने का है विधान…जानें निर्जला एकादशी के व्रत का विधान; पढ़ें कथा
Nirjala Ekadashi: सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार पूरे साल में 24 एकादशियां होती हैं, लेकिन इन सबमें सबसे ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के दिन पड़ने वाली निर्जला एकादशी को माना गया है. अधिकांश लोग ऐसे हें जो पूरे साल की एकादशी का व्रत नहीं करते हैं लेकिन साल में एक बार निर्जला एकादशी का व्रत जरूर करते हैं.
वेदव्यास के मुताबिक भीम सेन ने ही इसे धारण किया था. मान्यता है कि, केवल इस एकादशी का व्रत रखने से ही वर्ष भर की एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त हो जाता है. इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं.
निर्जला एकादशी का महत्व
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं धर्म शास्त्रों के मुताबिक इस एकादशी के व्रत से दीर्घायु तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है. निर्जला एकादशी में एकादशी के सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्यास्त तक पानी न पीने का विधान शास्त्रों में बताया गया है, इसीलिए इसे निर्जला एकादशी कहा जाता है. इस दिन निर्जला व्रत करते हुए शेषशायी रूप में भगवान विष्णु की आराधनी का विशेष महत्व माना गया है. यह व्रत अत्यंत संयम साध्य वाला है. इस तरह से 6 जून को जो व्रत शुरू होगा उसका पारण 7 जून को किया जाएगा.
इस तरह है व्रत का विधान
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि इस व्रत में जल पीने से मना किया गया है लेकिन फलाहार के बाद दूध पीने का विधान इस व्रत में बताया गया है. इस दिन व्रत करने वाले को चाहिए कि वह जल से कलश को भरे. उस पर सफेद वस्त्र को ढक कर रखें तथा उस पर चीनी तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मणों को दान दें. महिलाएं नथ पहनकर और ओढ़नी ओढ़कर, मेहंदी लगाकर विधि पूर्वक शीलत जल से भरा घड़ा दान कर सास अथवा अपने से बड़ों के चरण स्पर्श करें. इसी के साथ इस एकादशी का व्रत करने के बाद द्वादशी को ब्रह्मबेला में उठकर स्नान कर ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देना चाहिए. अपने समार्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र, छतरी, जूता, फल, जल से भरा कलश, पंखों और दक्षिणा देने का विधान है. इसी के साथ सभी लोगों को मिट्टी का घड़ा अथवा सुराही, पंखों और अनाज का दान करना चाहिए. मान्यता है कि ऐसा करने से पूरे वर्ष भर की एकादशी का फल प्राप्त हो जाता है.
निर्जला एकादशी कथा
धर्म शास्त्रों के मुताबिक, एक दिन वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया. इसी समय युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का वर्णन करने का आग्रह किया. इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान् हैं।
इसके बाद महर्षि व्यास ने पाण्डवों को एकादशी के व्रत का विधान तथा उसका लाभ व फल बताया. वह जब इस दिन भोजन करने के दोषों की चर्चा करने लगे और इस दिन अन्न खाना वर्जित बताया. इस पर भीमसेन ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि “हे पितामह! युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, कुंती और द्रौपदी सभी एकादशी के दिन भोजन नहीं करते हैं और मुझसे भी यही कहा करते हैं कि इस एकादशी के दिन भोजन न किया करो लेकिन मैं बिना खाए रह नहीं पाता. भीमसेन ने इसके आगे ये भी कहा कि मैं विधिपूर्वक दान दे दूंगा और भगवान वासुदेव की पूजा करके उन्हें प्रसन्न कर लूंगा. परन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जाएगी।
भीमसेन की बात सुनकर व्यास जी ने कहा- यदि तुम नरक को दूषित समझते हो और तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और तो दोनों पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन करने से बचो.
इस भीमसेन ने कहा पितामह! मैं आपके सामने सच कहता हूँ। मुझसे एक बार भोजन करके भी व्रत नहीं किया जा सकता, तो फिर उपवास करके मैं कैसे रह सकता हूँ। मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है। इसलिए जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी मेरी भूख शांत होती है। इसलिए महामुनि! मैं पूरे वर्ष भर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ। जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये। मैं उसका यथोचित रूप से पालन करुँगा।
व्यास जी ने आगे कहा कि भीम! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्ल पक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो। केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान् पुरुष मुख में न डालें, अन्यथा व्रत भंग हो जाएगा। एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है।
इसके बाद द्वादशी को प्रभात काल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधि पूर्वक जल और सुवर्ण यानी सोने का दान करे। इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करें। वर्ष भर में जितनी एकादशियां होती हैं, उन सबका फल इस निर्जला एकादशी से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है।”
उन्होंने आगे कहा कि हे कुन्तीनन्दन निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो। उस दिन जल में शयन करने वाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु यानी पानी में खड़ी गाय का दान करना चाहिए. इसी के साथ ही सामान्य गाय या घी से बनी गाय का दान भी कर सकते हैं. इस दिन दक्षिणा और कई तरह की मिठाइयों से ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए। उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं।
उन्होंने निर्जला एकादशी का महत्व बताते हुए आगे कहा कि श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस निर्जला एकादशी का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आने वाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है।
उन्होंने ये भी बताया कि निर्जला एकादशी के दिन वस्त्र, अन्न, जल, गौ, शैय्या, कमण्डलु,सुन्दर आसन तथा छाता दान करना चाहिए। वह ये भी कहते हैं कि जो लोग श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो इस एकादशी की महिमा को भक्ति पूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है। चतुर्दशी युक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इस कथा को सुनने से भी मिलता है।
वह आगे बोले कि भीमसेन! ज्येष्ठ मास में शुक्ल पक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए। उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है। इसके बाद द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे। जो इस प्रकार पूर्ण रूप से पाप नाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है। यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया।
मान्यता है कि इस एकादशी को करने से ही भीम को स्वर्ग की प्राप्ति हुई और पाण्डवों को मोक्ष मिला. यही वजह है कि इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है.
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