प्रेमानंद महाराज से इसलिए नहीं मिलता उनका परिवार…बड़े भाई ने किया खुलासा; जानें किसकी सलाह पर बने राधारानी के भक्त-Video
Premananda Maharaj: वृंदावन के जाने-माने संत प्रेमानंद महाराज को आज कौन नहीं जानता? वह युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक को बेहतर जीवन जीने की कला सीखाते रहते हैं और अध्यात्म से जुड़ने की सलाह देते हैं. वह किसी ढोंग या फिर पाखंड या जादू-टोने व टोटके से बचने की सलाह देते हैं और सिर्फ राधा नाम जप का महत्व बताते हैं.
तो वहीं हाल ही में उनके बड़े भाई का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें उनके भाई बता रहे हैं कि घरवाले आखिर प्रेमानन्द महाराज से क्यों नहीं मिलते?
बड़े भाई इसलिए नहीं मिलते अपने छोटे भाई से
प्रेमानंद महाराज के बड़े भाई गणेश दत्त पांडेय का सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें वह बताते हुए दिख रहे हैं कि प्रेमानंद कभी भी परिवार से नहीं मिलते. यहां तक कि परिवार भी उनसे कभी मुलाकात नहीं करता और न ही मै कभी उनसे मिलता हूं और न ही मिलना चाहता हूं क्योंकि वह एक संत हैं और हम गृहस्थ हैं.
वह आगे कहते हैं कि हम दोनों सगे भाई हैं और वह मेरा बहुत ही सम्मान करते हैं. अगर एक दूसरे से मिलेंगे तो वह तुरंत मुझे प्रणाम करेंगे और मैं भी उनको प्रणाम करुंगा क्योंकि वह संत हैं तो वहीं जब वह प्रणाम करेंगे तो हमें दोष लगेगा क्योंकि हम गृहस्थी में हैं. गृहस्थ होकर एक संत को हम अपने पैर क्यों छूने दें? इसका पाप हमें लगेगा. तो वहीं जब उनके साथ के संतों को पता चलेगा कि मैं बड़ा भाई हूं तो वह मेरे सम्मान में हमारे पैर छूने की कोशिश करेंगे. इससे भी मुझे पाप लगेगा. वह कहते हैं कि इतना पुण्य हमने अपने जीवन में नहीं कमाया है. इसलिए हम लोग उनसे कभी नहीं मिलते.
कानपुर के रहने वाले हैं प्रेमानन्द महाराज
बता दें कि संत प्रेमानन्द महाराज बहुत ही निर्मल और सरल स्वभाव के संत हैं. उनके दादा जी भी संन्यासी थे और पिता शंभू पांडे ने भी संन्यास स्वीकार किया था. उनका जन्म कानपुर के सरसौल के अखरी गांव में हुआ था. बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार था. आज भी अखरी गांव में उनको लोग ‘अनिरुद्ध पांडेय’ के नाम से ही जानते हैं. मां रमा देवी दुबे भी बहुत धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं. उनके माता-पिता दोनों ही मिलकर मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों में संत सेवा किया करते थे. फिलहाल अब उनके माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं. माना जाता है कि घर में इसी धार्मिक वातावरण के कारण ही प्रेमानंद महाराज का भी झुकाव बालावस्था से ही अध्यात्म की ओर हो गया था. बहुत ही कम उम्र में उन्होंने पूजा-पाठ शुरू कर दी थी.
पांचवी कक्षा से ही शुरू कर दिया था गीता का पाठ
प्रेमानंद महाराज बचपन में शिव भक्त थे और कहा जाता है कि पांचवी कक्षा में ही भगवद गीता का पाठ करना शुरू कर दिया था. घर के सामने एक मंदिर था,जिसमें वह घंटों पूजा करने में समय लगाते थे.
जानें कैसा है प्रेमानन्द महाराज का कानपुर वाला घर?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रेमानन्द महाराज के अखरी गांव में दो मंजिला घर के बाहर नेम प्लेट पर ‘श्रीगोविंद शरणजी महाराज वृंदावन जन्मस्थली’ लिखा हुआ है. मालूम हो कि आखिरी गांव जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर की दूरी पर है. उन्होंने 40 साल पहले छोड़कर संन्यास ले लिया.
केवल कक्षा-8 तक पढ़े हैं प्रेमानन्द महाराज
प्रेमानंद महाराज के बड़े भाई गणेश दत्त पांडेय का सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें वह प्रेमानन्द महाराज के बारे में बताते हुए दिख रहे हैं. वह बताते हें कि प्रेमानंद महाराज की पढ़ाई-लिखाई सिर्फ कक्षा-8 तक ही हुई है. कक्षा-9 में भास्करानंद विद्यालय में प्रवेश लेने के चार महीने में ही उन्होंने स्कूल छोड़ दिया था.
बिना किसी को बताए ही छोड़ दिया था घर
उनके भाई साल 1985 की बात को याद करते हुए बताते हैं कि उस समय वह प्रेमानंद महाराज उर्फ अनिरुद्ध पांडेय 13 साल के थे और तभी उन्होंने शिव मंदिर की प्रतिष्ठा करवाई थी लेकिन एक दिन सुबह 3 बजे बिना किसी को बताए कानपुर का घर छोड़ दिया. किसी से जानकारी मिली कि वह एक शिव मंदिर में वो 14 घंटे तक भूखे-प्यासे बैठे रहे.
भाई आगे बताते हैं कि प्रेमानन्द महाराज ने फिर सैंमसी के शिव मंदिर में चार साल रहकर आराधना की और फिर वापस घर नहीं लौटे. खबर मिली कि वह वहां से वाराणसी चले गए. इस दौरान उन्होंने कठिन तपस्या की और फिर पता चला कि उनकी दोनों किडनी खराब हो गई.
डॉक्टर ने दी वृंदावन जाने की सलाह
भाई ने बताया कि वह जिस अस्पताल में इलाज कराने गए थे वहां के डॉक्टर राधा रानी के उपासक थे और उन्होंने ने ही उनको वृंदावन जाने की सलाह दी और कहा कि राधा रानी की कृपा से सब ठीक हो जाएगा. इसी के बाद प्रेमानंद महाराज वाराणसी छोड़कर वृंदावन आ गए. हालांकि कई बार प्रेमानन्द महाराज ने भी कथावाचन के दौरान जिक्र किया है कि वह पहले वाराणसी में थे और शिव जी के उपासक थे और फिर वृंदावन आ गए और यहीं के होकर रह गए. फिर यहां आने के बाद उन्होंने श्री हित गौरांगी शरण महाराज को अपना गुरु बना लिया. राधा रानी के भक्त बन गए.
गांव में प्रचलित हैं ये किस्से
प्रेमानंद महाराज को लेकर उनके गांव में कई किस्से प्रचलित हैं. गांव के लोग बताते हैं कि अनिरुद्ध पांडेय गांव में अपनी सखा टोली बनाए हुए थे. ये सभी लोग शिव मंदिर के लिए एक चबूतरा बनाना चाहते थे और फिर इसका निर्माण शुरू करवा दिया लेकिन कुछ ही दिनों में लोगों ने उन्हें रोक दिया.
इसकी वजह से ही उनका मन इस कदर टूट गया कि उन्होंने गांव ही छोड़ दिया. फिर घरवालों ने खोजबीन की तो पता चला कि वो सरसौल में नंदेश्वर मंदिर पर ठहरे हुए हैं. इस पर परिवार वाले उनको लेने पहुंचे तो उन्होंने घर लौटने से इंकार कर दिया. कुछ दिनों बाद सरसौल से वाराणसी चले गए और फिर पूरी तरह से घर का त्याग कर संन्यासी बन गए. शुरू में प्रेमानंद महाराज का नाम ‘आरयन ब्रह्मचारी’ रखा गया लेकिन बाद में प्रेमानन्द महाराज उनको कहा जाने लगा.
प्रेमानंद जी महाराज से क्यों नहीं मिलते उनके परिवारजन? बड़े भाई ने बताई दिल को छू जाने वाली वजह, वीडियो हुआ वायरल
संत प्रेमानंद जी महाराज के परिवार को लेकर एक भावुक और बेहद संवेदनशील वीडियो सोशल मीडिया पर #वायरल हो रहा है। वीडियो में महाराज के सगे बड़े भाई ने उस वजह का खुलासा… pic.twitter.com/ETPzB29t1v
— UttarPradesh.ORG News (@WeUttarPradesh) July 31, 2025
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