जानें क्या है दलबदल विरोधी कानून…? क्या AAP से BJP में पहुंचे राघव चड्ढा बने रहेंगे सांसद?

April 25, 2026 by No Comments

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Raghav Chadha Anti Defection Law: आम आदमी पार्टी छोड़कर राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने पार्टी के 3 राज्यसभा सांसदों के साथ भाजपा का हाथ थाम लिया है और इसी के साथ ही ये चर्चा तेज हो गई है कि क्या राघव अभी भी सांसद बने रहेंगे या फिर फिर से चुनाव कराया जाएगा?

बता दें कि अशोक मित्तल, संदीप पाठक ने राघव के साथ भाजपा ज्वाइन कर ली है लेकिन विक्रम साहनी, हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, नरेंद्र गुप्ता अभी खुलकर सामने नहीं आए हैं लेकिन राघव ने दावा किया है कि ये सांसद भी उनके साथ हैं. अब सवाल है कि क्या ये सभी लोग सांसद बने रहेंगे. तो आइए जानते हैं क्या कहता है दलबदल कानून?

सदस्यता से हो जाता है अयोग्य

संविधान की मानें तो अगर कोई निर्वाचित सांसद अपनी इच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या किसी दूसरी पार्टी को ज्वाइन करता है तो वह सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य हो जाता है. कानून ये भी कहता है कि ‘स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ने’ का अर्थ केवल इस्तीफा देना ही नहीं, बल्कि दूसरी पार्टी जॉइन करना भी इसी श्रेणी में आता है.

ये है शर्त

दल-बदल कानून से बचने के लिए मात्र एक ही उपाय है और वो है मर्जर. इसीलिए राघव चड्ढा ने भाजपा ज्वाइन करते वक्त मर्जर शब्द का इस्तेमाल किया था. दरअसल AAP के दो-तिहाई (2/3) सांसद अगर एक साथ मिलकर भाजपा ज्वाइन करते हैं या फिर अपनी अलग पार्टी बनाकर किसी दूसरी पार्टी में विलय कर लेते हैं तो उनके ऊपर यह कानून लागू नहीं होगा.

अधिकार

बता दें कि इस पूरे मामले में आखिरी फैसले का अधिकार राज्यसभा के सभापति के पास होता है. सभापति के पास यह अधिकार है कि अगर उनको शिकायत मिलती है तो वे सांसद को अयोग्य घोषित कर दें.

क्या फिर से लड़ सकते हैं चुनाव?

अगर सदस्यता जाती है तो वह व्यक्ति उस कार्यकाल के लिए सांसद नहीं रहेगा लेकिन खाली हुई सीट पर होने वाले उपचुनाव में वह दोबारा चुनाव लड़ सकता है, लेकिन तब तक उसे सदन से बाहर होना पड़ेगा.

कानून

राज्यसभा पर एंटी-डिफेक्शन कानून पूरी तरह लागू होता है. यह कानून संविधान की 10वीं अनुसूची में है जो कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के सदस्यों पर समान रूप से कार्य करता है. इस अनुसूची को 52वें संशोधन (1985) द्वारा जोड़ा गया. राज्यसभा के सभापति (उप-राष्ट्रपति) अयोग्यता के मामलों पर फैसला लेते हैं.

अयोग्यता की क्या होती हैं स्थितियां?

अपनी इच्छा से मूल पार्टी की सदस्यता को छोड़ देना

पार्टी के व्हिप के विरुद्ध जाकर सदन में मतदान या वोट ना देना

निर्दलीय सदस्य होने के बाद में किसी पार्टी में शामिल होना

अपवाद

अगर मूल पार्टी के दो-तिहाई सदस्य नई पार्टी में विलय करते हैं, तो उनको अयोग्य नहीं माना जाएगा. राज्यसभा चुनावों में विधायकों पर व्हिप लागू नहीं होता, लेकिन सांसदों पर दलबदल नियम लागू रहता है. शायद इसीलिए राघव चड्ढा ने बड़ी संख्या में सांसदों के साथ मिलकर भाजपा में विलय किया है.

जानें क्या होती है निर्णय की प्रक्रिया?

शिकायत मिलने के बाद सभापति को जांच करने के बाद फैसला लेना होता है, जो अंतिम होता है (हालांकि न्यायिक समीक्षा संभव), 91वें संशोधन (2003) ने विभाजन अपवाद हटा दिया है.

अब राज्यसभा में AAP के कितने सांसद?

बता दें कि आम आदमी पार्टी के कुल 10 सांसद राज्यसभा में थे लेकिन राघव चड्ढा ने संदीप पाठक, अशोक मित्तल, विक्रमजीत सिंह साहनी, हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, राजेंद्र गुप्ता का नाम लेते हुए पार्टी छोड़ने की बात कही है. इस तरह से अब पार्टी में संजय सिंह, संजीव अरोड़ा ही सांसद के तौर पर रह गए हैं तो वहीं बलवीर सिंह सींचेवाल के नाम पर अभी तक संशय बरकरार है.

मालूम हो कि बीते कुछ दिनों से राघव चड्ढा की आम आदमी पार्टी के साथ दूरियां बढ़ती दिखी थीं. इस महीने के शुरू में AAP ने राज्यसभा के डेप्युटी लीडर के पद से राघव को हटाते हुए अशोक मित्तल को नियुक्त किया था लेकिन बड़ी ही अजीब बात है कि राघव के साथ ही अशोक मित्तल ने भी पार्टी को अलविदा कह दिया और भाजपा ज्वाइन कर ली.

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