Mangala Gauri:मंगलागौरी की पूजा में न करें ये गलतियां, सावन के प्रत्येक मंगलवार को किए जाने वाले इस कठिन उपवास की समझें पूरी विधि, देखें पूजन सामग्री और जानें कैसे की जाती है पूजा, देखें उद्यापन विधि
सावन का महीना अपने आप में ही बहुत खास है। क्योंकि इसी माह से सनातन धर्म को मानने वालों के बड़े तीज-त्योहार शुरू हो जाते हैं। यह माह व्रत को लेकर भी खास माना गया है। भोले बाबा को यह मास अत्यंत प्रिय है। इसीलिए इस महीने भोले बाबा की अर्धांगनि माता पार्वती, जिनको गौरी जी भी कहा जाता है, का व्रत भी किए जाने की परम्परा है। जहां सावन के सोमवार को भोले बाबा का व्रत किया जाता है तो वहीं मंगलवार को मां गौरी का व्रत, जिसे मंगला गौरी कहते हैं, को करने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। आचार्य सुशीलकृष्ण शास्त्री बताते हैं कि शास्त्रों की मानें तो सावन के सोमवार का व्रत जहां मुख्य रूप से पुरुषों द्वारा किए जाने की मान्यता है, तो वहीं स्त्रियों द्वारा सावन के हर मंगलवार को मंगला गौरी का व्रत करने की परम्परा चली आ रही है।

जानें कैसे करें पूजा
मंगलवार के दिन स्नान करने के बाद लकड़ी के एक पट्टे पर सफेद और लाल रंग का कपड़ा बिछा लें। सफेद कपड़े पर नवग्रहों के नाम की चावल की नौ ढेरियां बना लें। उसी चौकी पर एक तरफ चावल व फूल रखकर गणेश जी की स्थापना करें। चौकी के एक कोने पर गेहूं की एक छोटी सी ढेरी रखकर उस पर जल से भरा कलश रखें, इसमें आम की एक पतली सी शाखा डाल दें। इसके बाद आटे का एक चौमुखा दीपक और सोलह धूपबत्ती जला दें। इसके बाद पूजा का संकल्प करके पहले गणेश जी की पूजा करें। उस पर पंचामृत, जनेऊ, चंदन, रोली, सिंदूर, सुपारी, लौंग, पान, चावल, फूल, बिल्वपत्र, इलायची, फल, मेवा, दक्षिणा और प्रसाद चढ़ाकर आरती उतारें। फिर कलश की पूजा करें।

इसके बाद मिट्टी के सकोरे में आटा रखकर उस पर सुपारी रखें और दक्षिणा को आटे में दबा दें। फिर बिल्वपत्र चढ़ाएं। अब जिस तरह से गणेश जी की पूजा की थी, उसी प्रकार कलश की भी पूजा करें, लेकिन ध्यान रखें कि कलश पर बिल्वपत्र और सिंदूर नहीं चढ़ाना है। इसके बाद कलश की तरह ही नवग्रहों की भी पूजा करें, जिसे चावल की ढेरियों की मदद से बनाया था। इसके बाद षोडश मातृका की बनी हुई सोलह गेहूं की ढेरियों की भी पूजा करें, लेकिन इन पर रोली और जनेऊ न चढ़ाएं। हल्दी, मेहंदी तथा सिंदूर चढ़ा दें। इनकी पूजा भी गणेश जी की पूजा की तरह ही करें। इसके बाद कलावा लेकर पंडित जी को बांध दें और खुद भी कलावा बंधवा लें।
इस तरह करें मंगलागौरी की पूजा
अंत में मंगलागौरी का पूजन करें। मंगला गौरी की पूजा के लिए थाली में चकला रख लें। उसी के ऊपर मंगला गौरी की मिट्टी की प्रतिमा बना लें या मिट्टी की पांच ढेरियां रख कर उनको मंगला गौरी मान लें। आटे की लोई बना कर रख लें। इसके बाद पंचामृत (जल, दूध, दही, चीनी और घी) से स्नान कराएं। फिर वस्त्र व नथ पहनाएं। रोली, चंदन, हल्दी, सिंदूर, मेंहदी, काजल लगाकर श्रंगार करें। इसके बाद 16 प्रकार से फूल, 16 माला, 16 तरह के पत्ते, 16 आटे के लड्डू, 16 फल, 5 तरह के मेवा 16 बार, सात तरह के अनाज 16 बार, 16 जीरा, 16 धनिया, 16 पान, 16 सुपारी, 16 लौंग, 16 इलायची, एक सुहाग की डिब्बी में रोली, मेंहदी, काजल, हिंगुर, सिंदूर, तेल, कंघा, शीशा, 16 चूड़ी, एक रुपया और वेदी दो, उसके ऊपर दक्षिणा के साथ ही चढ़ाकर मंगलागौरी की कथा सुन लें। चौमुख दीपक बनाकर उसमें 16 तार की चार बत्ती बना लें और कपूर की आरती उतारकर परिक्रमा कर लें। इसके बाद 16 लड्डू का बायना अपनी सास को देकर उनके पैर छूकर आशीर्वाद लें। इसके बाद भोजन कर लें। बता दें कि इस व्रत में बिना नमक के एक ही अनाज की रोटी खाने की परम्परा है। इसके दूसरे दिन मंगलागौरी को समीप के कुंए, तालाब अथवा नदी में विसर्जित करने के बाद ही भोजन करें।
इस तरह करें उद्यापन
मंगलागौरी व्रत का उद्यापन सावन के सोलह या बीस मंगलवार करके ही करना चाहिए। उद्यापन के दिन कुछ नहीं खाना चाहिए। इस दिन ब्राह्मण द्वारा हवन कराकर कथा सुनें और ब्राह्मण को भोजन कराकर दक्षिणा दें। इसी के साथ अपनी सास को साड़ी, सुहाग पिटारी और नगद रुपए देकर पैर छूएं और सभी को भोजन कराने के बाद ही खुद भोजन करें।
DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)