Devuthani Ekadashi-2022: देवउठनी एकादशी पर करें ये सरल उपाय, बचे अकाल मृत्यु और एक्सीडेंट से, देखें पूजन विधि, मिलेगा कन्यादान जितना फल, पढ़ें दो कथा

November 3, 2022 by No Comments

Share News

एकादशी विशेष। हिंदू धर्म में हर महीने एकादशी पड़ती हैं, जो कि महत्वपूर्ण होती है, लेकिन कार्तिक मास की एकादशी को सबसे महत्वपूर्ण बताया गया है, क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु संसार की भलाई के लिए इस दिन अपनी चिर निद्रा से जाग्रत होते हैं। इसीलिए इसे देवउठनी, हरिप्रबोधिनी और देवोत्थानी एकादशी कहा गया है। इस बार यह एकादशी 4 नवम्बर को पड़ रही है।

मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी की तिथि को विष्णु भगवान क्षीर सागर में सोने चले जाते हैं और देवउठनी एकादशी पर वह उठते हैं। इसी वजह से हिंदू समाज में आषाढ़ की देवशयनी एकादशी से लेकर देव उठनी एकदशी तक (करीब चार महीने तक) विवाह आदि मांगलिक कार्य नहीं किए जाते और देवउठनी एकादशी के बाद से ये मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं। हालांकि इस बार शुक्र अस्त होने के कारण मांगलिक कार्य 20 नवम्बर से शुरू होंगे।

इस दिन होता है तुलसी जी और शालिग्राम का विवाह
आचार्य विनोद कुमार मिश्र बताते हैं कि इस बार 4 नवम्बर, दिन शुक्रवार को देवउठनी एकादशी है। इस दिन तुलसी जी और शालिग्राम जी का विवाह किया जाता है। सनातन धर्म को मानने वाले लोग माता तुलसी के पौधे का विवाह शालिग्राम जी के साथ धूमधाम से परम्परागत रूप से करते हैं। माता तुलसी जी को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि जिन विवाहित जोड़ों की बेटियां नहीं होती, वो माता तुलसी का विवाह कर कन्यादान का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।

पूजन विधि
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि इस दिन घर की साफ-सफाई करने के बाद स्नान कर आंगन में चौक पूर कर भगवान विष्णु के चरणों को बनाएं या कोई फोटो आदि रख लें। वैसे तो ओखली में गेरू से विष्णु जी का चित्र बनाने की परम्परा है। इसके बाद फल, पकवान, मिठाई, बेर, सिंघाड़ा, ऋतुफल, गन्ना आदि को चरण के पास रख दें और फिर इसे किसी बड़े बर्तन या डलिया आदि से ढक दें और एक दीपक भी जला दें। रात को परिवार के सभी सदस्य भगवान विष्णु के साथ ही सभी देवी-देवताओं का पूजन करें और फिर शंख, घंटा आदि बजाकर कहना कहें- उठो देवा, बैठो देवा, अंगुरिया चटकाओ देवा। इसके बाद कथा सुनें।

करें ये उपाय
आचार्य विनोद कुमार मिश्र बताते हैं कि इस दिन शाम को भगवान विष्णु की कपूर से आरती करें। ऐसा करने से आजीवन अकाल-मृत्यु से रक्षा होती है। इसी के साथ एक्सीडेंट आदि उत्पातों से जीवन की रक्षा होती है।

रात के समय रसोई का कार्य करने के बाद चांदी की कटोरी में लौंग तथा कपूर जला कर पूरे घर में घुमाएं। यह कार्य प्रतिदिन करें तो घर में कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होगी। साथ ही आपके घर में हमेशा समृद्धि बनी रहेगी।

जानें व्रत की विधि
अगर आप चाहते हैं तो इस दिन व्रत भी रख सकते हैं, लेकिन शास्त्रों में हरिप्रबोधिनी एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक व्रत करने का विधान बताया गया है। इसे भीष्म पंचक कहते हैं। देव उठनी एकादशी पर भगवान् नारायण जागते हैं। इसलिए इस दिन नीचे दिए गए मंत्र का उच्चारण करके भगवान् को जगाएं
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज
उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यमन्गलं कुरु

अर्थात ‘हे गोविन्द!उठिए,हे गरुडध्वज! उठिए, हे कमलाकांत!निद्रा का त्याग कर तीनों लोकों का मंगल कीजिये ‘ इस तरह से पांच दिन का व्रत शुरू करें। इस दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए सात्विक भोजन करें। प्याज-लहसून आदि का त्याग करें।

पहली कथा
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि देवउठनी एकादशी को लेकर एक पौराणिक कथा प्रचलित है। ऐसी मान्यता है कि भगवान नारायण जी (विष्णु जी) से एक दिन लक्ष्मी जी ने कहा कि हे नाथ, आप दिन-रात जागा करते हैं और अगर सो जाते हैं तो लाखों-करोड़ों वर्ष तक के लिए सो जाते हैं। इसी के साथ उस समय सभी चराचर का नाश भी कर डालते हैं। इसलिए आप प्रतिवर्ष नियम से सोया करें। इससे मुझे भी कुछ समय के लिए विश्राम करने का समय मिल जाएगा। यह बात सुनकर नारायण जी मुस्कुराए और बोले कि देवी तुमने ठीक कहा। मेरे जागने से सभी देवों, खासकर तुम्हें भी कष्ट होता है। मेरी सेवा से जरा भी अवकाश तुम्हें नहीं मिलता। इसलिए तुम्हारे कहने पर मैं प्रतिवर्ष चार महीने वर्षा ऋतु के समय शयन करुंगा उस समय तुमको और देवगणों को अवकाश होगा। मेरी यह निद्रा अल्पनिद्रा और प्रलयकालीन महानिद्रा कहलाएगी। भक्तों को मेरी यह निद्रा मंगलकारी होगी। इस दौरान जो भक्त मेरे शयन की भावना कर मेरी सेवा करेंगे मैं उनके घर में निवास करुंगा।

दूसरी कथा
मान्यता है कि पौराणिक काल में जालंधर नाम के राक्षस ने इतना उत्पात मचाया था कि देवताओं और ऋषि-मुनियों का भी जीना मुश्किल हो गया था। उसकी पत्नी वृंदा ही उसकी वीरता की रहस्य थी। वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थी और दिन-रात पूजा में लगी रहती थी। उसकी पूजा से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न थे और हमेशा उसके सुहाग की रक्षा किया करते थे। इसी वजह से जालंधर को कोई हरा नहीं पाता था। जालांधर से परेशान होने के बाद एक दिन देवता व ऋषि-मुनि भगवान विष्णु के पास रक्षा करने की गुहार लगाने पहुंचे। इस पर भगवान विष्णु ने वृंदा का पितव्रता धर्म भंग करने का निश्चय लिया। उन्होंने योगमाया द्वारा एक मृत शरीर वृंदा के आंगन में फिंकवा दिया। माया का पर्दा पड़ा होने के कारण वृंदा को वह शव अपने पति का शव दिखाई दिया। यह देखकर वृंदा रोने लगी। इतने में एक साधू आए और उन्होंने कहा कि वह मृत शरीर में जान डाल देंगे।

इसके बाद साधू ने मृत शरीर में जान डाल दी और वृंदा भाव से भर गईं और मृत शरीर का आलिंगन कर लिया, जिससे उनका पतिव्रता धर्म नष्ट हो गया। बाद में वृंदा को भगवान का यह छल मालूम हो गया। दूसरी ओर वृंदा का पतिव्रता धर्म नष्ट होते ही जालांधर युद्ध में देवताओं द्वारा मार दिया जाता है। इस पर वृंदा ने क्रोधित होकर भगवान विष्णु को श्राप दिया कि जिस तरह तुमने मुझे पतिवियोग दिया है उसी तरह तुम भी अपनी स्त्री के छल पूर्वक हरण होने के बाद स्त्री वियोग सहोगे और मृत्युलोक में जन्म लोगे। यह कहकर वृंदा अपने पति के साथ सती हो गई। इस पर भगवान विष्णु लज्जित हुए और फिर लक्ष्मी जी ने वृंदा की चिता राख में आंवला, तुलसी व मालती के पौधे लगाए।

विष्णु जी ने तुलसी को ही वृंदा का रूप समझा और अपने पत्थर रूप शालिग्राम के साथ पूजे जाने का वरदान दिया। ये तो सभी को मालूम है कि भगवान राम विष्णु जी का ही अवतार हैं और माता सीता के छल से हरण के बाद उनको स्त्री वियोग सहना पड़ा था। कहीं-कहीं यह भी कथा प्रचलित है कि वृंदा ने ही विष्णु जी को पत्थर का हो जाने का श्राप दिया था। एक बार वृंदा से विष्णु जी बोले कि तुम मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय हो गई हो। यह तुम्हारे सतीत्व का ही फल है कि तुम मेरे साथ तुलसी बनकर सदा रहोगी। जो लोग मेरे साथ तुम्हारा विवाह करेंगे, वो मोक्ष को प्राप्त होंगे। तभी से शालिग्राम और तुलसी विवाह की परम्परा चली आ रही है। विष्णु भगवान की किसी भी पूजा में अगर तुलसी दल न हो तो पूजा अधूरी मानी जाती है। तुलसी और विष्णु जी को लेकर अन्य कथाएं भी प्रचलित हैं।

DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। किसी भी धार्मिक कार्य को करते वक्त मन को एकाग्र अवश्य रखें। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)