Bhishma Panchak-2022: शुरू हो चुका है भीष्म पंचक व्रत, पढ़ें कथा, जानें इस व्रत से जुड़े 10 महत्वपूर्ण तथ्य, देखें मंत्र
यह व्रत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से शुरू होकर पूर्णिमा को समाप्त होते हैं। इसीलिए इसे भीष्म पंचक व्रत कहते हैं। इस बार ये भीष्म पंचक व्रत 4 नवम्बर से शुरू हो गए हैं, जो कि 8 नवम्बर को समाप्त होंगे। आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि मान्यता है कि जो स्त्रियां पूरे कार्तिक मास किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान नहीं कर पाती हैं, वो पंचक के दौरान स्नान कर पूरे कार्तिक मास की फल प्राप्त कर सकती हैं। कार्तिक स्नान करने वाले स्त्री व पुरुष पांच दिन का निराहार (निर्जला) व्रत रखते हैं। मान्यता है कि यह व्रत पापों के नाश, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति के लिए किया जाता है।
देखें इस व्रत को लेकर क्या बता रहे हैं आचार्य विनोद कुमार मिश्र
कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को यह व्रत ग्रहण करें। पाँच दिनों तक तीनों समय स्नान करके तिल और यव के द्वारा देवता तथा पितरों का तर्पण करे। फिर मौन रहकर भगवान् श्रीहरि का पूजन करे। देवाधिदेव श्रीविष्णु को पंचगव्य और पंचामृत से स्नान करावे और उनके श्री अंगों में चंदन आदि सुंगधित द्रव्यों का आलेपन करके उनके सम्मुख घृतयुक्त गुग्गुल जलावे । इस सम्बंध में जानकारी अग्निपुराण अध्याय–205 में दी गई है।
प्रात:काल और रात्रि के समय भगवान् श्रीविष्णु को दीपदान करे और उत्तम भोज्य-पदार्थ का नैवेद्ध समर्पित करे।व्रती पुरुष ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ इस द्वादशाक्षर मन्त्र का एक सौ आठ बार (108) जप करे। तदनंतर घृतसिक्त तिल और जौ का अंत में ‘स्वाहा’ से संयुक्त ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’– इस द्वादशाक्षर मन्त्र से हवन करे। पहले दिन भगवान् के चरणों का कमल के पुष्पों से, दुसरे दिन घुटनों और ऊराओं का बिल्वपत्रों से, तीसरे दिन नाभिका भृंगराज से, चौथे दिन बाणपुष्प, बिल्बपत्र और जपापुष्पों द्वारा एवं पाँचवे दिन मालती पुष्पों से सर्वांग का पूजन करे। व्रत करने वाले को भूमि पर शयन करना चाहिये।
एकादशी को गोमय, द्वादशी को गोमूत्र, त्रयोदशी को दधि, चतुर्दशी को दुग्ध और अंतिम दिन पंचगव्य आहार करे। पौर्णमासी को ‘नक्तव्रत’ करना चाहिये। इस प्रकार व्रत करने वाला भोग और मोक्ष–दोनों का प्राप्त करता है।
भीष्म पितामह इसी व्रत का अनुष्ठान करके भगवान् श्रीहरि को प्राप्त हुए थे, इसी से यह ‘भीष्मपञ्चक’ के नाम से प्रसिद्ध है।
ब्रह्माजी ने भी इस व्रत का अनुष्ठान करके श्रीहरि का पूजन किया था। इसलिये यह व्रत पाँच उपवास आदि से युक्त हैं।
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘भीष्मपञ्चक-व्रत का कथन’ नामक दो सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ।
इन पांच दिनों में अन्न का त्याग करें। कंदमूल, फल, दूध अथवा हविष्य (विहित सात्विक आहार जो यज्ञ के दिनों में किया जाता है ) ग्रहण करें।

इन दिनों में पंचगव्य (गाय का दूध, दही, घी, गोमूत्र व गोबर-रस का मिश्रण )का सेवन लाभदायी माना गया है। पानी में थोडा-सा गोमूत्र डालकर स्नान करें तो वह रोग-दोषनाशक तथा पापनाशक माना जाता है।
इन पांच दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
इन पांच दिनों भीष्मजी को अर्घ्य-तर्पण करते हुए नीचे दिए गए मंत्र का जाप करें
सत्यव्रताय शुचये गांगेयाय महात्मने।
भीष्मायैतद ददाम्यर्घ्यमाजन्म ब्रह्मचारिणे।।
इसका अर्थ है, ‘आजन्म ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले परम पवित्र, सत्य-व्रतपरायण गंगानंदन महात्मा भीष्म को मैं यह अर्घ्य देता हूँ।’
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