Makar Sankranti: मकर संक्रांति से जुड़ा है सिख समाज का बड़ा इतिहास, 10 लाख मुगलों को दी थी चंद सिख सैनिकों ने शिकस्त; जानें क्या था बेदावा पत्र?

January 14, 2023 by No Comments

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Makar Sankranti: मकर संक्रांति से सिख समाज का बड़ा इतिहास जुड़ा है, जिसकी वजह से सिख समाज प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति पर गुरुद्वारा श्री मुक्तसर साहिब (Sri Muktsar Sahib), जिसे मुक्तसर (Muktsar) भी बुलाया जाता है, में मत्था टेकने जरूर जाते हैं। यह भारत के पंजाब राज्य के श्री मुक्तसर साहिब ज़िले में स्थित एक नगर और नगरपंचायत है।

यह ज़िले का मुख्यालय भी है। इसे ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। इसी जगह पर श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने मुगलों के विरूद्ध 1704 ई. में आखिरी लड़ाई लडी थी। इस लड़ाई के दौरान गुरू जी के चालीस शिष्य शहीद हो गए थे। गुरू जी के इन चालीस शिष्यों को चालीस मुक्तों के नाम से भी जाना जाता है। इन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम मुक्तसर रखा गया था। इस लेख में देखें क्या है मकर संक्रांति से जुड़ा सिख समाज का बड़ा इतिहास।

कवि जसप्रीत सिंह ने पंजाबी भाषा में लिखा पूरा इतिहास

श्री मुक्तसर साहिब का इतिहास

सोशल मीडिया से उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 1704 में आनंदपुर मुगलों और पहाड़ी प्रमुखों की सहयोगी सेना द्वारा विस्तारित घेराबंदी के अधीन था। प्रावधान पूरी तरह से समाप्त हो रहे थे और खालसा पेड़ों की पत्तियों और छाल पर निर्भर होने की स्थिति में आ रहा थे। इसी समय माझा के जाटों ने घर जाने का मन बना लिया।

गुरु ने उन्हें तब तक जाने नहीं दिया जब तक कि उन्होंने एक अस्वीकरण (बेदावा) पर हस्ताक्षर नहीं किया, कि वे अब श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के सिख नहीं थे। सैकड़ों सिखों में से केवल चालीस ने ही अस्वीकरण पर अपने अंगूठे का निशान लगाया। इसके बाद उन्हें आनंदपुर छोड़ने की अनुमति दी गई। यह श्री आनंदपुर साहिब की घेराबंदी के दौरान था, जो आठ महीने तक चला, जिसके परिणामस्वरूप 10वें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के नेतृत्व में लगभग 10,000 सिख सैनिकों ने पवित्र शहर पर आक्रमण करने वाले दस लाख मुगलों को करारी शिकस्त दी। लगभग तीन समूहों को छोड़कर प्रत्येक पहाड़ी राजा मुगल शाही सेना के साथ लड़ रहे थे।

कौन थीं माई भागो?

बताया जाता है कि आनंदपुर छोड़ कर गये चालीस सिंह अमृतसर जिले के माझा क्षेत्र में रहते थे। उनके एक गांव झबाल में माई भागो नाम की एक बहादुर महिला रहती थी। वह अपने विश्वास और साहस के लिए जानी जाती थी और गुरु की सेवा करने के लिए उनमें बहुत उत्साह था। वह इन चालीस भगोड़ों द्वारा दिखायी गयी बदनामी पर शर्मिन्दा थी।

माई भागो ने उन पर कायरता और विश्वास की कमी का आरोप लगाया। वह माझा पर लगे इस बदनामी के दाग को मिटाने के लिए कृतसंकल्प थी। उन्होंने आस-पास के गाँवों का दौरा किया और महिलाओं को गुरु का खंडन करने वाले परित्यागियों के लिए मेहमाननवाजी नहीं करने का आह्वान किया। उसने सिंहों को उनकी कायरता के लिए लज्जित किया और उनकी निंदा की और अंततः उन्हें भक्ति और बलिदान के मार्ग पर वापस ले आई। उन्होंने सिंहनी का वेश धारण कर उन्हें श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की शरण में लौटने के लिए प्रेरित किया। अपने कायरतापूर्ण कार्य के लिए शर्म महसूस करते हुए,चालीस के चालीस सिंहों ने उनकी अगुवाई का अनुसरण किया और श्री मुक्तसर साहिब की प्रसिद्ध लड़ाई में शामिल हुए, जो फिरोजपुर जिले के खिदराना में मुगल सेना के खिलाफ लड़ी गई थी।

माई भागो ने खाई कसम

सिख समाज द्वारा मान्यता है कि माई भागो ने गुरु जी की ओर से खून से सने युद्ध के मैदान में मौत को सहने की कसम खाई। उन्होने अपने शस्त्रों से इतनी अच्छी लड़ाई लड़ी कि उन्होने कई मुस्लिम सैनिकों को मार डाला। महान महिला जनरल माई भागो के नेतृत्व में “चालीह मुक्ते” ने 10, 000 मजबूत मुगल सेना को इतना नुकसान पहुंचाया था, उनके पास पीछे हटने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। इस लड़ाई को ब्रिटिश वॉर हिस्ट्री वंडर्स के अंदर पाया जा सकता है। यह लड़ाई तब हुई जब चमकौर और सरहिंद की शहादतें हो चुकी थी और गुरू साहिब का पीछा करती मुगल सेना मुक्तसर आ गयी थी, इधर यह चालीस सिंह भी माई भागों के साथ क्षमा मांगने गुरू जी के पास आ रहे थे। पर उससे पहले ही माई भागों व चालीस सिंह की जंग मुगलों से हो गई। लड़ाई के अंत में, जब श्री गुरु गोबिंद सिंह जी जीवित बचे लोगों की तलाश कर रहे थे, तो माई भागो, जो घायल पड़ी थी, ने उनका अभिवादन किया। उन्होनें गुरू जी को बताया कि कैसे चालीस वीरों ने युद्ध के मैदान में लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी। उनके पश्चाताप,आत्म-बलिदान और वीरता की भावना से गुरु साहिब बहुत प्रभावित हुए। श्री मुक्तसर साहिब की लड़ाई के बाद माई भागो जो जख्मी हो गयीं थी वो तन्दरूस्त हुई और गुरु की उपस्थिति में रही।

बेदाना पत्र फाड़ते हुये गुरू गोविन्द सिंह जी और उनकी गोद में लेटे हुये भाई महां सिंह जी

फाड़ दो हमारा बेदावा पत्र

बाकी चालीस सिंहों को श्री गुरु गोबिंद सिंह जी देख रहे थे कि उनमें से कौन जीवत है तो उन्होंने पाया कि उनमें से एक सिक्ख जिनका नाम महां सिंह था , अभी भी जीवित है। गुरु को देखते ही उन्होने उठने का प्रयास किया, गुरु ने तुरंत उन्हे अपने आलिंगन में ले लिया और उनके पास बैठ गये। महां सिंह जी ने आंसू भरे और रोने लगे,कहां पातिशाहि हम तेरी सिक्खी के बिना नहीं रह सकते। पातिशाहि हमारी गलतियां क्षमां कर हमारा बेदावा पत्र फाड़ दे। हमें शहीदी के बाद अपना सिक्ख ही रहने दें। महां सिंह जी की बात सुन गुरू जी के भी आंसू छलक गये। महां सिंह जी ने गुरु से बेदावा पत्र को नष्ट करने का अनुरोध किया, जिसमें उनके गुरु के सिख न होने का दावा किया गया था। महां सिंह जी के प्राण छोड़ने से पहले दयालु गुरु गोविंद सिंह जी ने दस्तावेज़ लिया और उसे फाड़ दिया। अपने अनुयायियों के प्रति असीम दया दिखाते हुए उन्होंने उन 40 सिंहों का नाम लिया, जो अंतिम सांस तक लड़े थे,और अंत में शहीदी पा गये।

जानें क्या है चालीह मुक्ते

जानकारी के मुताबिक बाद में इनका संस्कार इसी स्थान पर किया गया। इन्ही चालीस शहीदों को ही चाली मुक्ते कहा जाता है। चालीस (चालीह -मुक्ते), 40 बहादुर सिखों का एक सैनिक बल था, जिन्होने खिदराना के ढाब या झील के पास लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी, अब इस स्थान पर गुरूद्वारा सुशोभित है , जिसे गुरूद्वारा मुक्तसर साहिब के नाम से जाना जाता है। सिख इतिहास में और दैनिक रूप से सिख अरदास या प्रार्थनात्मक प्रार्थना में व्यक्तिगत रूप से या सभी धार्मिक सेवाओं के अंत में सभाओं में इन चालीह मुक्तों का नाम ले प्रणाम किया जाता है। गुरु गोबिंद सिंह, जिन्होंने पास के एक टीले से लड़ाई देखी थी, ने शहीदों की वीरता की प्रशंसा की और उन्हें चाली मुक्ते, चालीस अमर के रूप में आशीर्वाद दिया। उनके बाद खिदराना श्री मुक्तसर साहिब – मुक्ति का कुंड बन गया।

व्युत्पत्ति के अनुसार, संस्कृत मुक्त से मुक्त का अर्थ है ‘मुक्त, वितरित, मुक्त,’ विशेष रूप से जन्म और मृत्यु के चक्र से। सिख धर्म में मुक्ति मानव अस्तित्व का सर्वोच्च आध्यात्मिक लक्ष्य है, और मुक्ता वह है जिसने इस परम आनंद की स्थिति को प्राप्त किया है। इन्ही चाली मुक्तों की याद में गुरुद्वारा मुक्तसर साहिब में प्रत्येक वर्ष माघ महीने के पहले दिन माघी का मेला (मकर संक्रांति के मौके पर) लगता है, जिसमें सिक्ख संगत कीर्तन व वहां बंट रहे प्रसादि को छक इन चाली मुक्तों को याद करती है।

गुरुद्वारा मुक्तसर साहिब के माघी मेला में बड़ी संख्या में पहुंचते हैं लोग (फोटो-सोशल मीडिया)

देखें चालीस सिंहों के नाम

भाई शमीर सिंह, भाई सरजा सिंह, भाई साधू सिंह, भाई सुहेल सिंह, भाई सुल्तान सिंह, भाई सोभा सिंह, भाई संत सिंह, भाई हरसा सिंह, भाई हरी सिंह, भाई करन सिंह, भाई करम सिंह, भाई काला सिंह, भाई कीरत सिंह, भाई कृपाल सिंह, भाई खुशहाल सिंह, भाई गुलाब सिंह, भाई गंगा सिंह, भाई गंडा सिंह, भाई घरबारा सिंह, भाई चम्मा सिंह, भाई जादो सिंह, भाई जोगा सिंह, भाई जंग सिंह, भाई दयाल सिंह, भाई दरबारा सिंह, भाई दिलबाग सिंह, भाई धर्म सिंह, भाई धन्ना सिंह, भाई निहाल सिंह, भाई निधान सिंह, भाई बूड़ सिंह, भाई भाग सिंह, भाई भोला सिंह, भाई भंगा सिंह, भाई महा सिंह, भाई मज्जा सिंह, भाई मान सिंह, भाई मया सिंह, भाई राय सिंह व भाई लछमन सिंह।

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