Kushotpatni Amavasya: कुशोत्पाटनी अमावस्या 27 अगस्त को, जानें कितने प्रकार की होती है कुशा और कौन सी कुशा का होता है देव और पितृ कार्यों में उपयोग, तर्पण के लिए है ये विशेष दिन
कुशोत्पाटनी अमावस्या विशेष। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अमावस्या को कुशोत्पाटनी अमावस्या (Kushotpatni Amavasya) कहा जाता है। इस बार यह अमावस्या 27 अगस्त को उदयातिथि के साथ पड़ रही है। हालांकि अमावस्या 26 अगस्त को लग जाएगी, लेकिन उदयातिथि न मिलने के कारण इसे 27 अगस्त को मनाया जाएगा। यह दिन सनातन धर्म को मानने वालों के लिए बड़ा ही खास होता है, क्योंकि इस दिन को पितरों के तर्पण के लिए विशेष माना गया है।

आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि वैसे तो प्रत्येक अमावस्या को पितरों का तर्पण करने का विधान शास्त्रों में दिया गया है लेकिन श्राद्धपक्ष के 15 दिन पहले पड़ने वाली भाद्रपद मास की अमावस्या पितरों की पूजन व तर्पण के लिए महत्वपूर्ण मानी गई है। इस दिन भी पितरों का तर्पण व पूजन विधि-विधान से किया जाता है।

कुशा तोड़ने का है विधान
आचार्य बताते हैं कि इस दिन पुरोहित व पुजारी वर्ग साल भर के कर्मकांड के लिए नदी, घाटियों, जंगलों से कुशा नामक घास उखाड़कर घर व मंदिर में लाते हैं। कुशा उखाड़ते वक्त ऊं हुं फट् मंत्र का उच्चारण किया जाता है। शास्त्रों में दस प्रकार की कुश बताया गया है। इसमें जो मिल जाए, उसे ही ग्रहण कर लेना चाहिए। जिस कुश का मूल सुतीक्ष्ण हो, जिसमें सात पत्तियां हों, अग्रभाग कटा न हो तथा हरा हो वह कुश देव व पितृ दोनों के कार्यों में उपयोग की जा सकती है।
कुशा से बनाते हैं पैंती
कुशा नामक घास से पैंती बनाते हैं, जो कि उंगुठी के छल्ले की तरह होती है। इसे पैंती अथवा पवित्री कहते हैं। पूजा-पाठ के दौरान इसे दाहिने हाथ की उंगली में पहनकर पूजा-पाठ की जाती है। पितरों को तर्पण करते वक्त भी इसे उंगली में पहनकर अंजली में जल व काले तिल लेकर तर्पण कार्य किया जाता है।