Lucknow University: लखनऊ विश्वविद्यालय ने उत्तर प्रदेश महिला एवं बाल विकास विभाग के साथ MoU किया, जानें क्या होगा लाभ
Lucknow University: लखनऊ विश्वविद्यालय ने महिला एवं बाल विकास को सशक्त बनाने की दिशा में सराहनीय कदम उठाते हुए आज उत्तर प्रदेश महिला एवं बाल विकास विभाग के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए है। यह कार्यक्रम न्यायिक प्रशिक्षण एवं शोध संस्थान, गोमती नगर, लखनऊ में आयोजित हुआ।
इस एमओयू के अंतर्गत लखनऊ विश्वविद्यालय के समाज कार्य, समाज शास्त्र, मनोविज्ञान, स्त्री अध्ययन संस्थान और विधि विभाग के छात्र-छात्राएँ चाइल्ड केयर संस्थानों (CCIs) में फील्ड वर्क, इंटर्नशिप, शोध परियोजनाएँ और सोशल इम्पैक्ट ऑडिट करेंगे। तो साथ ही अध्यापक व शोधार्थी मिलकर क्षमता निर्माण, प्रशिक्षण कार्यक्रम, और जागरूकता अभियानों का आयोजन करेंगे, जिनमें विशेष रूप से किशोर न्याय एक्ट, पॉक्सो एक्ट और बाल अधिकारों पर केन्द्रित रहेगा।
इस मौके पर कुलपति लखनऊ विश्वविद्यालय प्रो. मनुका खन्ना एवं सुश्री संदीप कौर, निदेशक महिला एवं बाल विकास ने हस्ताक्षर किए। इसमें न्यायमूर्ति राजन राय, उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ एवं लीना जौहरी, प्रमुख सचिव महिला एवं बाल विकास भी उपस्थित रहे।
इस मौके पर न्यायमूर्ति अरुण भंसाली, मुख्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालय, इलाहाबाद और न्यायमूर्ति अजय भनोट, चेयरमैन किशोर न्याय बोर्ड, ऑनलाइन जुड़े।
जानें क्या है इसका उद्देश्य?
इस समझौते का मुख्य उद्देश्य CCIs में रहने वाले बच्चों को शैक्षिक, सांस्कृतिक, स्वास्थ्य एवं जीवन कौशल विकास के लिए सहयोग प्रदान करना है। इसके अलावा विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को प्रायोगिक शिक्षा, प्रशिक्षण, इंटर्नशिप और शोध अवसर उपलब्ध कराना तथा उनमें जिम्मेदार नागरिक होने का भाव उत्पन्न करना भी है। विभागीय कार्यक्रमों एवं योजनाओं की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए विश्वविद्यालय से शैक्षिक एवं शोध सहयोग प्राप्त करना और बच्चों व छात्रों—दोनों के व्यक्तित्व, नेतृत्व तथा रोजगारपरक कौशल का विकास करना भी इस पहल के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।
विश्वविद्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक, चाइल्ड केयर संस्थानों की ओर से फील्ड एक्सपोज़र और सहयोग उपलब्ध कराया जाएगा, ताकि छात्रों को वास्तविक अनुभव मिल सके और शोध व ऑडिट से निकलने वाली सिफारिशों को अमल में लाया जा सके। इस साझेदारी से न केवल छात्रों की शैक्षणिक गुणवत्ता और सामाजिक समझ बढ़ेगी बल्कि बाल संरक्षण एवं कल्याण की दिशा में संस्थागत पारदर्शिता और जवाबदेही भी मज़बूत होगी।
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