Sharad Purnima: शरद पूर्णिमा पर किस बर्तन में बनानी चाहिए खीर? प्रसाद खाने से पहले पढ़ें ये मंत्र
Sharad Purnima: आश्विन मास की शुक्ल पक्ष व शरद की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है. इसे कई नामों से बुलाते हैं. यानी इसे रास पूर्णिमा, कोजागर व्रत भी कहा जाता है. सनातन धर्म में शरद् पूर्णिमा का बहुत बड़ा महत्व है. इस पूर्णिमा की रात को खीर बनाकर चांदनी रात में रखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. माना जाता है ऐसा करने से खीर में औषधीय गुण आ जाते हैं जिसे ग्रहण करने पर व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ होता है और हमारे शरीरी को आने वाली ठंड से लड़ने की ताकत मिलती है.
इस खीर को बनाने का अलग है तरीका
आचार्य पीएन पांडेय बताते हैं कि इस दिन जो खीर बनाई जाती है उसका तरीका बाकी दिनों में बनाई जाने वाली खीर से थोड़ा अलग होता है. शरद् पूर्णिमा के दिन खीर बनाने के लिए व्यक्ति को कुछ खास नियमों का पालन करना चाहिए. माना जाता है कि अगर इसकी अनदेखी की तो फिर व्यक्ति को इस व्रत का पूरा लाभ नहीं मिल पाता है. तो आइए जानते हैं इस दिन खीर से जुड़े खास नियमों के बारे में
जानें कैसा होना चाहिए खीर का बर्तन ?
आचार्य बताते हैं कि शरद् पूर्णिमा के दिन खीर किसी चांदी के बर्तन में रखनी चाहिए. यदि चांदी का बर्तन घर में न हो तो खीर के बर्तन में एक चांदी का चम्मच आदि डालकर रख दें. अगर हो सके तो खीर रखने के लिए मिट्टी, कांसा या पीतल के बर्तनों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. खीर को चांदनी रात में रखते समय ध्यान रखें कि खीर रखने के लिए कभी भी स्टील, एल्यूमिनियम, प्लास्टिक, चीनी मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल न करें. माना जाता है कि ऐसा करने पर आपकी सेहत पर गलत प्रभाव पड़ सकता है.
जानें शरद पूर्णिमा पर क्या है खीर बनाने का तरीका?
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इस दिन जो खीर बनती है, वह अन्य दिनों में बनाई जाने वाली खीर से अलग होती है. इस दिन बनाए जाने वाली खीर मात्र एक व्यंजन नहीं होती बल्कि यह एक दिव्य औषधि मानी जाती है. इस खीर को किसी भी दूध से नहीं बल्कि गाय के दूध और गंगाजल से ही बनाना चाहिए. यदि गंगाजल न हो तो शुद्ध जल लें और दोनों बराबर मात्रा में लेकर ही खीर बनाएं. अगर संभव हो सके तो प्रसाद की खीर को चांदी के बर्तन में ही बनाएं और कम से कम तीन घण्टे खीर पर चन्द्रमा की किरणें पड़नी चाहिए।
हिंदू धर्म में चावल को माना गया है देवताओं का भोजन
आचार्य के मुताबिक, हिन्दू धर्म में चावल को हविष्य अन्न यानी देवताओं का भोजन माना गया है. मान्यता है कि महालक्ष्मी को चावल से बने भोग अत्यंत प्रिय हैं और उनको ये भोग लगाने से वह प्रसन्न होती हैं. ऐसे में अगर हो सके तो शरद् पूर्णिमा की खीर को चंद्रमा की ही रोशनी में बनाएं. ध्यान रखें कि इस ऋतु में बनाई खीर में केसर और मेंवों का प्रयोग इस्तेमाल न करें. क्योंकि आयुर्वेद में माना जाता है कि मेवा और केसर गर्म प्रवृत्ति के होने से पित्त बढ़ा सकते हैं. खीर में सिर्फ इलायची का ही प्रयोग करें।
जानें इस दिन क्यों किया जाता है महालक्ष्मी और विष्णु जी का पूजन
मान्यता है कि शरद् पूर्णिमा पर अश्विनी नक्षत्र में चंद्रमा पूर्ण 16 कलाओं से युक्त होता है. यहां सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि चंद्रमा की यह स्थिति साल में सिर्फ एक बार ही बनती है. मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय आश्विन महीने की पूर्णिमा पर मंथन से महालक्ष्मी प्रकट हुई थीं. इसी वजह से इस दिन महालक्ष्मी एवं विष्णु का पूजन करने का विधान शास्त्रों में बताया गया है. ये भी कहा जाता है कि इस दिन रात्रि में महालक्ष्मी रात्रि में विचरण करती हैं और जो जागकर माता रानी का ध्यान और भजन करता है. उनकी कामनाएँ पूरी करती हैं.
करें अश्वनी कुमारों की प्रार्थना, पढ़ें ये मंत्र
मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा के साथ अश्विनी कुमारों को भी खीर का भोग लगाना चाहिए. इससे भी मनोकामना पूर्ण होती है. कहते हैं कि भोग लगाते समय अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारी जो इन्द्रियां शिथिल हो गई हों, उनको पुष्ट करें. खीर का प्रसाद ग्रहण करने से पहले एक माला (108) या कम से कम 21 बार इस मन्त्र का जाप करें-
ओम् नमो नारायणाय
इसी के बाद खीर का प्रसाद ग्रहण करना चाहिए. धर्मशास्त्रों में ऐसा माना गया है कि शरद् पूर्णिमा को रात्रि में बनी खीर को खाने वाले का तेज के साथ ही आयु, बल बढ़ता है और चेहरे पर कान्ति आती है व सेहत अच्छी बनी रहती है.
DISCLAIMER:धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों के आधार पर धार्मिक विवरण दिया गया है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)