Sharad Purnima: जानें क्या है शरद पूर्णिमा में खीर खाने का वैज्ञानिक आधार? गाय का दूध और घी ही क्यों? पढ़ें कथा
Sharad Purnima: आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है. इसे रास पूर्णिमा भी कहते हैं. धर्मशास्त्रों के मुताबिक इस दिन कोजागार व्रत रखा जाता है. इस दिन न केवल मंदिरों बल्कि घरों में भी परम्परागत रूप से विधि-विधान से लोग अपने आराध्य देव की पूजा-अर्चना करते हैं और कथा सुनते हैं। मान्यता है कि हिंदू धर्म के इस प्रमुख त्योहार पर व्रत करके कथा सुनने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
कहते हैं कि इस दिन कथा सुनने से पहले हाथ में गेहूं के 13 दाने ले लेने चाहिए। मान्यता है कि इस दिन माताएं अपनी संतान की मंगल कामना के लिए व्रत भी रखती हैं. बता दें कि पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहते हैं। चूंकि पूरे साल भर में केवल इसी दिन चंद्रमा षोडश कलाओं का होता है, इसीलिए धर्मशास्त्रों में इस दिन को कोजागर व्रत के रूप में भी माना गया है। इसी को कौमुदी व्रत भी कहते हैं। इसी दिन से कार्तिक मास व्रत औऱ स्नान नियम की शुरुआत भी हो जाती है।

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जानें खीर का वैज्ञानिक आधार
वैसे तो ये बात सभी जानते हैं कि सनातन धर्म के सभी त्योहार कुछ न कुछ वैज्ञानिक आधार लिए हुए हैं। इसी तरह शरद पूर्णिमा अर्थात रास पूर्णिमा का भी वैज्ञानिक आधार है। मालूम हो कि इस दिन की रात को खुले आसमान के नीचे गाय के दूध से बनी खीर रखने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। अगर धर्म शास्त्रों की मानें तो शरद पूर्णिमा की रात को खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रखने से उसमें अमृत गिरता है, जिसके खाने के बाद हमारा शरीर सर्दी से लड़ने के लिए तैयार हो जाता है।
तो दूसरी ओर इसका वैज्ञानिक आधार बताया गया है कि गाय के दूध में भरपूर मात्रा में लैक्टिक एसिड पाया जाता है, जो कि चांद की तेज रोशनी में दूध में पहले से मौजूद बैक्टिरिया को और अधिक बढ़ाने में सहायक होता है। तो दूसरी ओर खीर में पड़ा चावल सोने पर सुहागा का काम करता है और चावलों में पाए जाने वाला स्टार्च बैक्टिरिया को बढ़ाने में और मदद करता है। कहते हैं अगर खीर चांदी के बर्तन में रखी जाए तो और लाभदायक होती है, क्योंकि चांदी के बर्तन में रोग-प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा होती है। इसलिए हो सके तो खीर को चांदी के बर्तन में रखें। चूंकि इस दिन चांद पृथ्वी के सबसे करीब और सोलह कलाओं में होता है इसलिए इस दिन की खीर हमारे शरीर के लिए अत्यंत लाभदायक होती है।
खीर नहीं होती है बासी
भारतीय ज्योतिष अनुसन्धान संस्थान के निदेशक आचार्य विनोद कुमार मिश्र बताते हैं कि आश्विन मास की पूर्णिमा को ‘शरद पूर्णिमा’ कहा जाता है. इस रात को चन्द्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ पृथ्वी पर शीतलता, पोषक शक्ति एवं शांतिरूपी अमृतवर्षा करता है। विजयादशमी से शरद पूर्णिमा तक चन्द्रमा की चाँदनी में विशेष हितकारी रस, हितकारी किरणें होती हैं। इन दिनों चन्द्रमा की चाँदनी का लाभ उठाना, जिससे वर्षभर आप स्वस्थ और प्रसन्न रहें। अश्विनी कुमार देवताओं के वैद्य हैं। शरीर की जो भी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयी हों, उनको पुष्ट करने के लिए चन्द्रमा की चाँदनी में खीर रखें और भगवान को भोग लगाकर अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करें कि ‘हमारी इन्द्रियों का बल-ओज बढ़ायें ।’ फिर वह खीर खा लें। खीर दूध, चावल, मिश्री, चाँदी, चन्द्रमा की चाँदनी – इन पंचश्वेतों से युक्त होती है, अतः सुबह बासी नहीं मानी जाती।
जानें क्यों बना था रासोत्सव का ये दिन?
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि, मान्यता है कि रासोत्सव का यह दिन वास्तव में भगवान श्रीकृष्ण ने जगत की भलाई के लिए निर्धारित किया था। कहा जाता है कि इस रात को चंद्रमा की किरणों से सुधा झरती है। इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा की जाती है। इस दिन सनातन धर्म के लोगों को चाहिए कि सुबह स्नान करके अपने आराध्य देव को सुंदर वस्त्र पहनाकर दीपक जलाकर भोग लगाना चाहिए और रात में गाय के दूध से बनी खीर बनाए। इसमें चीनी और घी अवश्य डालें। इसके बाद पूर्ण चंद्रमा की पूजा करें और भी खुले आकाश के नीचे यानी चंद्रमा की चांदनी के नीचे खीर का बर्तन रख दें। दूसरे दिन इसका सेवन करें और सभी को प्रसाद के रूप में भी वितरित करें।
शरद पूर्णिमा की कथा
एक साहूकार की दो बेटियां थीं और वे दोनों की पूर्णिमा का व्रत रखती थीं. बड़ी बहन पूरा व्रत रखती थी लेकिन छोटी वाली बहन हमेशा अधूरा व्रत करती थी. छोटी बहन को जो भी संतान होती वह जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाती. तो वहीं बड़ी बहन की सभी संताने जीवित रहतीं. इस पर छोटी बहन ने बड़े पंडितों को बुलाकर अपना दुख बताया और इसका कारण पूछा.
इस पर पंडितों ने कहा कि तुम पूर्णिमा का व्रत अधूरा करती हो, इसलिए तुम्हारी संतानों की अकाल मृत्यु हो जाती है. अगर पूर्णिमा का व्रत विधि पूर्वक करोगी तो तुम्हारी संताने भी जीवित रहेंगी. इस पर छोटी बहन ने पूर्णिमा का व्रत पूरा किया और कुछ दिन बाद उसे एक बेटा हुआ लेकिन वह भी जीवित नहीं रहा. इस पर उसने लड़के को पीढ़े (लकड़ी का पटरा जिस पर बैठा जाता है) पर लेटाकर उसके ऊपर कपड़ा ढक दिया.
इसके बाद उसने अपनी बड़ी बहन को बुलाया और उसी पीढ़े पर बैठने के लिए कहा. इस पर जैसे ही बड़ी बहन उस पर बैठने लगी उसके कपड़े के छूते ही बच्चा जीवित होकर रोने लगा. इस पर क्रोधित होकर बड़ी बहन बोली-“तू मुझ पर कलंक लगाना चाहती थी. यदि मैं बैठ जाती तो लड़का मर जाता.”
इस पर छोटी बहन बोली-यह तो पहले से ही मरा हुआ था. तेरे भाग्य से जीवित हो गया है. हम दोनों बहने पूर्णिमा का व्रत करती हैं. तू पूरा व्रत करती है और मैं अधूरा. इसी दोष की वजह से मेरी संतानें जीवित नहीं बचती हैं लेकिन तेरे पुण्य से यह बालक जीवित हो गया है. इसके बाद छोटी बहन ने पूरे नगर में ढिंढोंरा पिटवा कर कहा कि आज से सभी लोग पूर्णिमा का व्रत करें. क्योंकि यह संतान सुख देने वाला है.
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