भारत उत्थान न्यास की बड़ी पहल…युवाओं के चरित्र निर्माण के लिए शुरू किया पंचकोश अभियान

January 2, 2026 by No Comments

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Kanpur News: हम लगातार देख रहे हैं कि देश के युवा अपनी दिशा से भटक गए हैं. एक जनवरी के ही सेलिब्रेशन में देखा गया कि तमाम युवा नशे की हालत में सड़क पर गिरे पड़े हैं तो वहीं सोशल मीडिया पर आए दिन तमाम ऐसे वीडियो और फोटो भी वायरल होती जिसमें युवा अपने माता-पिता तक पर किसी न किसी तरह से हिंसा करते हुए दिखते हैं. ऐसे में सामाजिक संगठन भारत उत्थान न्यास ने बड़ी पहल करते हुए पंचकोश के जरिए युवाओं को चरित्रवान और देशभक्त बनाने की ठानी है.

भारत उत्थान न्यास के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुजीत कुंतल ने बताया कि कल यानी 3 जनवरी को शाम 7 बजे वर्चुअल राष्ट्रीय संगोष्ठी-व्यक्ति निर्माण में पंचकोश सिद्धांत की भूमिका का आयोजन करने जा रहे हैं. इसी के साथ ही आगे के कार्यक्रमों की भी रूपरेखा बनाई जाएगी. अगर इस संगोष्ठी से कोई जुड़ना चाहे तो हमारे यू-ट्यूब चैनल https://www.youtube.com/@bun2219 से भी जुड़ सकता है.

क्या है पंचकोश?

सुजीत कुंतल ने बताया कि हमारा लक्ष्य राष्ट्र के लिए चरित्रवान और देशभक्त व मजबूत युवाओं का निर्माण करना है. ताकि भावी पीढ़ी मानसिक व शारिरिक दृष्टि से मजबूत बन सके. वर्चुअल संगोष्ठी में प्रमुख वक्ता पंचको के सिद्धांत पर विचार रखेंगे. फरवरी में फलाइन राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम पंचकोश पर आयोजित किया जायेगा.

कार्यक्रम में आमंत्रित अथितिगण डॉ.अनुपम शुक्ल, नैनीताल ने एक लेख के जरिए पंचकोश के बारे में बताया है. वह कहते हैं भारतीय दर्शन मनुष्य को केवल शरीर या बुद्धि तक सीमित नहीं मानता. तैत्तिरीय उपनिषद के अनुसार मनुष्य पाँच आवरणोंपाँच कोशोंसे निर्मित है…

अन्नमय कोश

प्राणमय कोश

मनोमय कोश

विज्ञानमय कोश

आनंदमय कोश

ये कोश मानव व्यक्तित्व के विभिन्न स्तरों का प्रतिनिधित्व करते हैं. इनका संतुलित विकास ही चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व की पूर्णता का आधार बनता है. जब इनमें से किसी एक की उपेक्षा होती है, तो व्यक्ति भीतर से खंडित होने लगता है और यही खंडन आज के युवा में स्पष्ट दिखाई देता है.

अन्नमय कोश- शरीर से चरित्र तक

अन्नमय कोश मानव अस्तित्व का स्थूल आधार है. यह शरीर का वह आयाम है जो अन्न, जल और प्रकृति से पोषित होता है. उपनिषद स्पष्ट संकेत देते हैं कि दुर्बल शरीर में सुदृढ़ चरित्र की कल्पना नहीं की जा सकती. संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या, श्रम और योगये केवल स्वास्थ्य के साधन नहीं, बल्कि आत्म-अनुशासन के उपकरण हैं. संयम, स्वच्छता और कर्तव्यबोध जैसे गुण यहीं से जन्म लेते हैं. आज का युवा जब भोगवादी भोजन, अनियमित जीवन और शारीरिक निष्क्रियता का शिकार होता है, तो उसका प्रभाव केवल शरीर तक सीमित नहीं रहतावह मन और बुद्धि को भी कमजोर करता है.

प्राणमय कोश: जीवन-ऊर्जा का जागरण

प्राणमय कोश जीवन की गति और ऊर्जा का केन्द्र है। यही वह शक्ति है जो व्यक्ति को कर्मशील बनाती है। श्वास-प्रश्वास, प्राणायाम और सक्रिय जीवनशैली इसके पोषण के प्रमुख साधन हैं, जब प्राणमय कोश संतुलित होता है, तब व्यक्ति में उत्साह, साहस और आत्मविश्वास विकसित होता है. आज के युवाओं में दिखाई देने वाली थकान, उदासी और निराशा वास्तव में प्राणशक्ति के क्षीण होने का संकेत है। बाहरी सुविधाओं के बावजूद भीतर का सूखापन इसी असंतुलन का परिणाम है।

मनोमय कोश: भावनाओं का अनुशासन

मनोमय कोश मन, भावनाओं और संस्कारों का क्षेत्र है। प्रेम, करुणा, क्रोध, भय और आशाइन सभी का उद्गम यहीं है। यदि यह कोश असंतुलित हो जाए, तो व्यक्ति हिंसा, अवसाद और नैतिक विचलन की ओर बढ़ सकता है। सकारात्मक चिंतन, ध्यान, सत्संग और मूल्य-आधारित शिक्षा मनोमय कोश को परिष्कृत करती है। आधुनिक मनोविज्ञान जिसे Emotional Intelligence कहता है, उसका मूल बीज पंचकोश दर्शन में पहले से विद्यमान है।

विज्ञानमय कोश: विवेक का प्रकाश

विज्ञानमय कोश बुद्धि और विवेक का स्तर है। यही कोश सही और गलत के बीच भेद करता है। यहीं से नैतिक निर्णय और उत्तरदायित्व की भावना जन्म लेती है। तैत्तिरीय उपनिषद का संदेश—“सत्यं वद, धर्मं चर”—इसी कोश का उद्घोष है। आज सूचना बहुत है, पर विवेक दुर्लभ होता जा रहा है। विज्ञानमय कोश का विकास युवाओं को दिशाहीनता से बचाता है और उन्हें केवल सफल नहीं, बल्कि मूल्यनिष्ठ बनाता है।

आनंदमय कोश: जीवन की पूर्णता

आनंदमय कोश मानव व्यक्तित्व की सर्वोच्च अवस्था है। यह बाहरी उपलब्धियों से परे आंतरिक शांति और संतोष का अनुभव कराता है। इस स्तर पर व्यक्ति स्वार्थ से परमार्थ की ओर बढ़ता है। सेवा, त्याग और करुणा यहाँ से सहज रूप में प्रवाहित होते हैं। जो युवा इस स्तर को स्पर्श करता है, वह न केवल स्वयं संतुलित रहता है, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणास्रोत बन जाता है।

उपसंहार: दिग्भ्रम से दिशा की ओर

तैत्तिरीय उपनिषद का पंचकोश सिद्धान्त केवल आध्यात्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित ढंग से जीने का विज्ञान है। यह सिद्धान्त आज के युवाओं को दिग्भ्रम से निकालकर दिशा प्रदान कर सकता हैऐसी दिशा जो केवल सफलता नहीं, सार्थकता भी दे। यदि हमारी शिक्षा-प्रणाली, पारिवारिक संस्कार और सामाजिक विमर्श में पंचकोश आधारित दृष्टि को स्थान मिले, तो हम ऐसी पीढ़ी का निर्माण कर सकते हैं जो प्रतिस्पर्धा में सक्षम होने के साथ-साथ संवेदनशील, विवेकशील और मानवीय भी हो। यही विकसित भारत की वास्तविक नींव हैऔर यही दिग्भ्रम से दिशा की ओर बढ़ने का पथ।

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