कहीं पर धर्म का छाता है कहीं मज़हब की चादर है…सियासत में; कवियों ने साधा सिलेंडर और सरकार पर निशाना

March 30, 2026 by No Comments

Share News

Shakuntala Mishra University kavi Sammelan: डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग की ओर से आज “समकालीन समय, समाज और साहित्यः विमर्श, संवेदना, दिव्यांगता पुनर्वास एवं सामाजिक दायित्व” विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन हुआ। साथ ही समापन सत्र में आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में जमकर ठहाके लगे. कवियों ने अपनी रचनाओं से सिलेंडर और सरकार पर जमकर निशाना साधा.

कवि सम्मेलन में जब मंच सजा तो शब्दों की ऐसी रंगीन बौछार हुई कि श्रोता कभी हंसी से लोटपोट हुए तो कभी गहरे भावों में डूब गए। समसामयिक मुद्दों, महंगाई, प्रेम और राजनीति पर कवियों ने अपनी तीखी और चुटीली पंक्तियों से माहौल को जीवंत बनाया।

संचालन कर रहे कवि पंकज प्रसून ने महंगाई पर तंज कसते हुए पेट्रोल और गैस सिलेंडर को ‘खजाना’ बताते हुए ऐसी पंक्तियां सुनाईं कि पंडाल ठहाकों से गूंज उठा। “पेट्रोल पंप पर मेरी टंकी जो फुल हुई, ऐसा लगा कि जख्म पुराना हो सिल गया…” तिजोरी से भी ज़्यादा, अब हिफ़ाज़त इसकी करनी है, सिलेंडर क्या मिला, जैसे कि ख़ज़ाना ही मिल गया… सुनाकर श्रोताओं को ठहाके लगाने के लिए मजबूर कर दिया।

kavi sammelan..

कवि सम्मेलन में उपस्थित श्रोतागण

कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि कालीचरण स्नेही ने विमर्श परक कविताओं का पाठ किया। उन्होंने आ उतरे लै लेखनी, लिखने को जगपीर, बदलेंगे हम एक दिन दुनिया की तस्वीर, तप अनुभव की आंच में, पी जगती का ताप, करत उजागर लेखनी ,सदियों का संताप..सुनाकर खूब तालियां बटोरी.

शिखा श्रीवास्तव ने “न पूछो प्यास मिट्टी की, जो बरसें प्रेम की बूंदें, चटकती भूमि के भीतर मिलन की भोर हो जाए…” सुनाकर श्रोताओं को तालियां बजाने के लिए मजबूर कर दिया.

अभिश्रेष्ठ तिवारी ने “ सब अपने हादसों पे शेर कहना चाहते है, मैं शेर कहता था और हादसा बनाता था…” तो वहीं मानक मुकेश ने व्यंग्य का तड़का लगाते हुए सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियों पर चुटीले अंदाज में कटाक्ष किया। उन्होंने “सुबह को रात, रात को कह साँझ रहे हैं, तलवार हवाओं में लिए भांज रहे हैं, प्रेशर में जिनके रहता है पूरा ही महकमा, वो घर की रसोई में कुकर माँज रहे हैं…” सुनाकर जमकर तालियां बटोरी।

राजनीतिक व्यंग्य की धार लेकर मंच पर आए अशोक झंझटी ने वर्तमान सियासत पर करारा प्रहार किया। “अजब हालात बनते जा रहे हैं अब सियासत में, गधे मिलजुल पंजीरी खा रहे हैं अब सियासत में, कहीं पर धर्म का छाता, कहीं मज़हब की चादर है, यही ओढ़े बिछाये जा रहे हैं अब सियासत में…पंक्तियों से खूब तालियां बटोरी।

ये भी पढ़ें-दिव्यांगजन केवल सहानुभूति के नहीं…शकुंतला मिश्रा विश्वविद्यालय के सम्मेलन में बोले राज्य दिव्यांगजन आयुक्त प्रो. हिमांशु शेखर झा

…और दर्ज किया जाएगा SC/ST में मुकदमा और UGC कमेटी…4 नम्बर हासिल कर डॉक्टर बनने वालों को डॉ. वर्मा की खरी-खरी -Video