Vat Savitri Vrat Katha: पति सत्यवान का मृत शरीर छोड़ा वट वृक्ष के नीचे…चल पड़ी यमराज के पीछे; पढ़ें वट सावित्री व्रत की पूरी कथा

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Vat Savitri Vrat Katha: प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को वट सावित्री व्रत की पूजा की जाती है. इस दिन सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष की विधि-विधान से पूजा करती हैं और पति की दीर्घायु की कामना करती हैं. सनातन  धर्म में मान्यता है कि कोई भी पूजा या व्रत बिना कथा के पूरा नहीं होता. इसलिए यहां वट सावित्री व्रत की पूजा की पूरी कथा पढ़ें…

मान्यता है कि बहुत समय पूर्व मद्र देश में अश्वपति नाम का एक परम ज्ञानी राजा राज करता था. वह अत्यंत ही दयालु एवं धार्मिक प्रवृत्ति का था, लेकिन उसके कोई संतान नहीं थी. इसलिए उसने संतान प्राप्ति के लिए ज्योतिषियों की सलाह ली. इसके बाद संतान की मनोकामना को लेकर ज्योतिषयों की सलाह पर बड़ा यज्ञ किया और पत्नी सहित सावित्री देवी का विधि-विधान से पूजन व व्रत किया.

इस पूजा के प्रभाव से उसके यहां एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया. महल खुशियों से भर गया. राजा ने पुत्री का नाम सावित्री रखा. सावित्री बहुत ही सुंदर और गुणवान थी. वह शुक्ल पक्ष की चंद्रमा की तरह बढ़ती हुई युवा हो गई. जब वह विवाह योग्य हुई तो राजा ने खुद ही उसे वर चुनने के लिए कहा. अश्वपति ने अपने मंत्री के साथ उसे अपने पति की चयन करने के लिए भेज दिया.

इसा दौरान महर्षि नारद राजा अश्वपति के यहां आए हुए थे. इसी दौरान सत्यवान नाम के नवयुवक को चुन कर सावित्री भी लौटी. उन्होंने नारद जी को देखा और उनको आदर पूर्वक प्रणाम किया. इसके बाद बताया कि राजा द्युमत्सेन, जिनका राज्य छीन लिया गया है और जो अंधे होकर पत्नी के साथ वनो में भटक रहे हैं, उनके ही इकलौते आज्ञाकारी पुत्र सत्यवान को उन्होंने पति के रूप में चुना है.

इसके बाद तीनों लोकों की जानकारी रखने वाले और भ्रमण करने वाले नारज जी ने सत्यवान व सावित्री के ग्रहों की गणना की तो सावित्री के पिता से कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि सावित्री परिश्रम करने वाली कन्या है और सत्यवान धर्मात्मा व गुणी है. वह सावित्री के लिए हर तरह से योग्य है लेकिन एक भारी दोष यह है कि वह कम आयु और करीब एक वर्ष के बाद ही मर जाएगा.

इसलिए राजा को देवर्षि नारद ने सलाह दी कि वह सावित्री का विवाह किसी और से कर दें. राजा इस तरह की अपशगुन की भविष्यवाणी सुनकर घबरा गए और सावित्री को कोई और वर चुनने के लिए कहा. इस पर सावित्री ने कहा कि कन्या जीवन में जिसे एक बार अपना पति मान लेती हैं. उसी के साथ पूरा जीवन जीती हैं. अब उसने भी सत्यवान को अपना पति मान लिया है. इसलिए किसी और से विवाह वो नहीं करेंगी.

इसके बाद राजा अश्वपति ने सावित्री का विवाह सत्यवान से कर दिया. अब सावित्री अपने सास-ससुर की सेवा करते हुए वन में रहने लगी. तो वहीं नारद जी ने ये पहले ही जान लिया था कि सत्यवान की मृत्यु कब होगी. समय आगे बढ़ता रहा और एक वर्ष बीत गए. नारद जी की कही बात सावित्री को दिन पर दिन चिंतित करती रही. आखिर जब नारद जी के कहे के मुताबिक सत्यवान के जीवन के केवल तीन दिन ही बचे. तभी से सावित्री उपवास करने लगी और नारद जी द्वारा बताई गई तिथि पर पितरों का पूजन किया. रोज की तरह ही उस दिन जब सत्यवान लकड़ियां काटने के लिए जाने लगा तो सास-ससुर से आज्ञा लेकर सावित्री भी उसके साथ वन में चल दी.

जंगल में सत्यवान ने सावित्री को मीठे फल लाकर दिए और खुद एक पेड़ की लकड़ियां काटने के लिए चढ़ गया. जैसे ही सत्यवान पेड़ पर चढ़ा उसके सिर में असहनीय दर्द होने लगा. वह घबरा कर पेड़ के नीचे उतर गया. इस पर सावित्री ने सत्यवान को पास ही स्थित बड़ (बरगद) के पेड़ के नीचे लिटा दिया और उसका सिर अपनी जांघ पर रख लिया. सावित्रा की दिल किसी अनहोनी के डर से तेजी से धड़कने लगा. सावित्री को नारद जी की बात याद आ गई.

उसी समय से दक्षिण दिशा से यमराज को सावित्री ने आते हुए देखा और फिर कुछ ही पल में यमराज और उनके दूत धर्मराज सत्यवान की आत्मा को लेकर चल दिए. इस पर सावित्री भी पीछे चल पड़ी. यमराज ने देखा तो सावित्री को समझाकर लौटने के लिए कहा. इस पर सावित्री ने कहा कि पत्नी के पत्नीत्व की सार्थकता इसी में है कि वह उसकी छाया के समान अनुसरण करे. पति के पीछे जाना ही पत्नी का धर्म है. सावित्री ने यमराज से कहा कि पतिव्रत के प्रभाव और आपकी कृपा से मेरी गति को कोई भी नहीं रोक सकता. मैं ऐसा ही कर रही हूं और यही मेरी मर्यादा है.

यह देखकर यमराज ने सावित्री से कहा कि पति के प्राणों के अलावा कोई भी तीन वर मांग लो. इस पर सावित्री ने यमराज से सास-सुसर के नेत्रों की कोई ज्योति और दीर्घायु मांग ली. इस पर यमराज ने तुरंत तथास्तु कह दिया और फिर आगे बढ़ चले. तो सावित्री फिर से उनके पीछे चल दी. इस पर यमराज ने वापस जाने के लिए कहा तो सावित्री ने कहा कि उनको अपने पति के पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है. पति के बिना नारी जीवन का कोई अर्थ नहीं है. हम पति-पत्नी भला अलग-अलग मार्गों पर कैसे जा सकते हैं.

इस पर यमराज ने सावित्री से फिर से वर मांगने को कहा तो सावित्री ने ससुर का खोया राज्य और सौ भाइयों की बहन होने का वर मांग लिया. चूंकि यमराज सावित्री से पीछा छुड़ाना चाहते थे इसलिए तुरंत तथास्तु कहकर आगे बढ़ गए लेकिन सावित्री फिर से यमराज के पीछे जाने लगीं. इस पर यमराज ने लौट जाने को कहा तो सावित्री अपने पतिव्रत धर्म को लेकर अटल रहीं. इस पर यमराज ने कहा कि अगर तुम्हारे मन में अभी भी कुछ और कामना है, तो मांग लो.

तुम जो मांगोगी वही मिलेगा.इस पर सावित्री ने तुरंत कहा कि सो पुत्रों की मां होने का वर दीजिए. इस पर यमराज ने तथास्तु कह दिया और आगे बढ़ गए. सावित्री फिर से यमराज के पीछे चल दीं तो यमराज ने अब पीछे आने की वजह पूछी. इस पर सावित्री ने कहा कि आपने सौ पुत्रों की मां होने का तो वर दे दिया है लेकिन क्या मैं पति के बिना संतान को जन्म दे सकूंगी. जब तक मेरे पति मुझे वापस नहीं मिलेंगे तब तक मैं आपका वर पूरा नहीं कर सकूंगी.

इस तरह से सावित्री की धर्मनिष्ठा और पति के प्रति कर्तव्य को देखकर यमराज प्रसन्न हो गए और सत्यवान को जीवित कर दिया. इस पर सावित्री उसी वट वृक्ष के पास पहुंचीं जहां पर सत्यवान का शरीर था. सावित्री ने वट वृक्ष को प्रणाम कर जैसे ही परिक्रमा पूरी की. सत्यवान के मृत शरीर में जीवन का संचार हो उठा.

इस तरह से प्रसन्न होकर सावित्री अपने पति को लेकर सास-ससुर के पास पहुंची. तो वहां देखा कि उनके नेत्रों से दिखाई देने लगा और राजा द्युत्मसेन को फिर से उनका खोया राज्य मिल गया था. उनके मंत्रियों ने उनको ढूंढ लिया था. तो दूसरी ओर सावित्री के पिता अश्वसेन सौ पुत्रों के पिता हुए और सावित्री सौ भाइयों की बहन बन गईं और फिर यमराज के वरदान के प्रभाव से सावित्री सौ पुत्रों की मां बनी.

इस तरह से पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए सावित्री ने पति सत्यवान के साथ चिरकाल तक राज्य सुख भोगा और चारो दिशाओं में सावित्री के पतिव्रत धर्म के पालन की कीर्ति गूंजने लगी जो कि धीरे-धीरे पीढी दर पीढ़ी उनकी कथा के माध्यम से आज भी लोग सावित्री के पतिव्रत धर्म के बारे में जान रहे हैं.

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