Vat Savitri Vrat-2026: वट सावित्री व्रत पूजा का शुभ मुहूर्त…जानें क्या है वट वृक्ष का धार्मिक महत्व
Vat Savitri Vrat 2026: प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु और घर परिवार की सुख-समृद्धि के लिए वट सावित्री व्रत रख कर वट (बरगद) वृक्ष की पूजा करती हैं. मालूम हो कि वट सावित्री व्रत सौभाग्यवती स्त्रियों का प्रमुख पर्व है। इस व्रत को कुवांरी लड़कियां भी सुयोग्य वर की चाहत के लिए कर सकती हैं। इस व्रत को करने का विधान शास्त्रों में त्रयोदशी के लेकर अमावस्या तक है।
आचार्य पंडित रवि शास्त्री बताते हैं कि इस बार 16 मई दिन शनिवार को वट सावित्री व्रत की पूजा की जाएगी. वट वृक्ष की पूजा का शुभ समय सुबह 5 बजकर 30 मिनट से लेकर 8 बजकर 15 मिनट तक है. इसके बाद पूजा का श्रेष्ठ समय सुबह 6 बजे से लेकर 7 बजकर 45 मिनट तक है. तो वहीं वट सावित्री व्रत पूजा का अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 50 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 40 मिनट तक है. राहुकाल सुबह 9 बजे से 10 बजकर 30 मिनट तक है. इस बार इस दिन शनि जयंती का योग पड़ने पर वट सावित्री व्रत की पूजा का महत्व और बढ़ गया है.
बरगद वृक्ष का धार्मिक महत्व
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि सनातनी शास्त्रों में बरगद के पेड़ को न सिर्फ एक पेड़ या वृक्ष बताया गया है बल्कि इसे हिंदू आस्था और परंपरा में एक जीवंत प्रतीक भी माना गया है. इसे अक्षय वटवृक्ष कहा जाता है। शास्त्रों की मानें तो बरगद में त्रिमूर्ति का निवास माना गया है। इसकी जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव का वास माना गया है. तो वहीं इसकी लटकती हुई जटाएं मां सावित्री का स्वरूप मानी जाती हैं. मां सावित्री को तपस्या, त्याग और संतान की कामना की देवी माना गया है.
मान्यता है कि यक्षों के राजा मणिभद्र से ही इस वटवृक्ष की उत्पत्ति हुई थी. तभी से यह दिव्यता का वाहक बन गया। बता दें कि जेठ कृष्ण पक्ष की अमावस्या को हर साल महिलाए वट सावित्री व्रत के दिन इस पेड़ की पूजा कर पति की दीर्घायु और संतान सुख की कामना करती हैं। सुबह से ही महिलाएं निर्जला व्रत रखकर पूजा करती हैं और फिर पूजा का प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है. माना जाता है कि बरगद का पेड़ जिस तरह से विशाल स्वरूप और छांव वाला होता है उसी तरह से पति की उम्र भी विशाल होती है और पति स्वस्थ्य रहते हैं. इस व्रत को सुहागिन महिलाओं के साथ ही अविवाहित कन्याएं सुयोग्य वर के लिए कर सकती हैं.
वट वृक्ष की पूजा विधि
वट सावित्री व्रत के दिन सुहागिन महिलाओं को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करना चाहिए. इसके बाद व्रत का संकल्प लेकर मेहंदी और सिंदूर आदि लगाकर सोलह श्रृंगार करना चाहिए. इसके बाद पूजा सामग्री में रोली, चंदन, अक्षत, फूल, फल, मिठाई, धूप-बत्ती और कच्चा सूत आदि रखकर.
बरगद के पेड़ के नीचे एकत्र होकर व्रत कथा का श्रवण करते हुए. बरगद के वृक्ष को जल चढ़ाएं और रोली-चंदन से तिलक करें। इसके बाद कच्चे सूत को बरगद के तने के चारों ओर 7 या 11 बार लपेटते हुए परिक्रमा की जाती है. पूजा के बाद 7 या 11 सुहागिन स्त्रियों को सुहाग की सामग्री जैसे चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, काजल और वस्त्र आदि दान करने का भी कहीं-कहीं चलन दिखाई देता है. हालांकि लोग अपने परिवार की परम्परा के मुताबिक व्रत-पूजन भी करते हैं.
मान्यता है कि इस दिन दान करने से पति पर कोई संकट नहीं आता और सुहाग के साथ ही सौभाग्य की भी रक्षा होती है। साथ ही त्रिदेव की कृपा हमेशा घर-परिवार और पति पर बनी रहती है. वैवाहिक जीवन में सुख, शांति और प्रेम बना रहता है।
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