Pitru Paksha Start: श्राद्ध कर्म के दौरान बरतें ये सात सावधानियां, जानें क्या कहता है विष्णु पुराण, मंत्रों का करें सही उच्चारण, बिल्कुल भी न करें जल्दबाजी, पढ़ें कथा
कनागत स्पेशल। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक पितृपक्ष मनाया जाता है। सनातन धर्म में ये दिन पितरों अर्थात पूर्वजों की पूजा व भक्ति के लिए निर्धारित किए गए हैं। इन 16 दिनों को पितृपक्ष, श्राद्ध पक्ष, महालय और कनागत कहते हैं। इन 16 दिनों तक उन पूर्वजों का श्राद्ध कर्म किया जाता है, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं।
शास्त्रों में बताया गया है कि श्राद्ध का अर्थ होता है सम्मान करना। अर्थात हम इन दिनों में तर्पण आदि कर्म करके अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान का भाव प्रकट करते हैं। आचार्य विनोद कुमार मिश्र बताते हैं कि आश्विन मास 11 सितम्बर से लग रहा है। इसी दिन से पितृपक्ष श्राद्ध आरम्भ होंगे।

हालांकि भाद्रपद की शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि को भी लोग अपने पितरों को जलांजलि देते हैं। आचार्य कहते हैं कि श्रद्धा और मंत्र के मेल से पितरों की तृप्ति के निमित्त जो विधि होती है उसे ‘श्राद्ध’ कहते हैं। हमारे जिन संबंधियों का देहावसान हो गया है, जिनको दूसरा शरीर नहीं मिला है वे पितृलोक में अथवा इधर-उधर विचरण करते हैं, उनके लिए पिण्डदान किया जाता है। बच्चों एवं संन्यासियों के लिए पिण्डदान नहीं किया जाता।
देखें ये सात सावधानियां
श्रद्धायुक्त व्यक्तियों द्वारा नाम और गोत्र का उच्चारण करके दिया हुआ अन्न पितृगण को वे जैसे आहार के योग्य होते हैं वैसा ही होकर मिलता है। (विष्णु पुराणः 3.16,16)
विचारशील पुरुष को चाहिए कि जिस दिन श्राद्ध करना हो उससे एक दिन पूर्व ही संयमी, श्रेष्ठ ब्राह्मणों को निमंत्रण दे दे। परंतु श्राद्ध के दिन कोई अनिमंत्रित तपस्वी ब्राह्मण घर पर पधारें तो उन्हें भी भोजन कराना चाहिए।
भोजन के लिए उपस्थित अन्न अत्यंत मधुर, भोजनकर्ता की इच्छा के अनुसार तथा अच्छी प्रकार सिद्ध किया हुआ होना चाहिए। पात्रों में भोजन रखकर श्राद्धकर्ता को अत्यंत सुंदर एवं मधुर वाणी से कहना चाहिए कि ‘हे महानुभावो ! अब आप लोग अपनी इच्छा के अनुसार भोजन करें।’
श्राद्धकाल में शरीर, द्रव्य, स्त्री, भूमि, मन, मंत्र और ब्राह्मण-ये सात चीजें विशेष रूप से होनी चाहिए शुद्ध।
श्राद्ध में तीन बातों को ध्यान में रखना चाहिएः शुद्धि, अक्रोध और अत्वरा अर्थात (जल्दबाजी नही करना)।
श्राद्ध में मंत्र का बड़ा महत्त्व है। श्राद्ध में आपके द्वारा दी गयी वस्तु कितनी भी मूल्यवान क्यों न हो, लेकिन आपके द्वारा यदि मंत्र का उच्चारण ठीक न हो तो काम अस्त-व्यस्त हो जाता है। मंत्रोच्चारण शुद्ध होना चाहिए और जिसके निमित्त श्राद्ध करते हों उसके नाम का उच्चारण भी शुद्ध करना चाहिए। जिनकी देहावसना-तिथि का पता नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन करना चाहिए।

श्राद्ध कर्म करते समय जो श्राद्ध का भोजन कराया जाता है, उसके लिए मध्यान्ह 11:30 से 01:30 तक के काल को उत्तम काल माना गया है।
पढ़ें कथा




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