Annapurna Mata Fast: श्री अन्नपूर्णा देवी व्रत का शुभारम्भ 13 नवम्बर से, जानें व्रत की विशेषता, पढ़ें कथा, देखें पूजन विधि

November 12, 2022 by No Comments

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श्री अन्नपूर्णा देवी व्रत का शुभारम्भ 13 नवम्बर से होने जा रहा है। यह व्रत (अगहन) मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी से 17 दिनों तक किया जाता है। वैसे तो यह व्रत बिना भोजन के 17 अथवा 21 दिन तक किया जाता है, लेकिन अगर क्षमता नहीं है तो एक समय भोजन करके भी व्रत का पालन किया जा सकता है। इस व्रत में सुबह घी का दीपक जला कर माता अन्नपूर्णा की कथा पढ़ें और भोग लगाएं।

अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकर प्राण वल्लभे।
ज्ञान वैराग्य सिध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति।।
माता च पार्वति देवी पिता देवो महेश्वरः।
बान्धवा शिव भक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम्।

पढ़ें व्रत कथा और देखें विधि
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि एक समय की बात है। मान्यता है कि काशी (वाराणसी) निवासी धनंजय की पत्नी का नाम सुलक्षणा था। वह अत्यंत निर्धन थी। यह दुःख उसे हर समय सताता रहता था। एक दिन सुलक्षणा पति से बोली- स्वामी! आप कुछ उद्यम करो तो काम चले। इस प्रकार कब तक काम चलेगा ? सुलक्षण्णा की बात धनंजय के मन में बैठ गई और वह उसी दिन विश्वनाथ शंकर जी को प्रसन्न करने के लिए बैठ गया और कहने लगा- हे देवाधिदेव विश्वेश्वर! मुझे पूजा-पाठ कुछ आता नहीं है, केवल तुम्हारे भरोसे बैठा हूँ। इतनी विनती करके वह दो-तीन दिन भूखा-प्यासा बैठा रहा।

यह देखकर भगवान शंकर ने उसके कान में ‘अन्नपूर्णा ! अन्नपूर्णा!! अन्नपूर्णा!!!’इस प्रकार तीन बार कह दिया। इसके बाद धनंजय सोच में पड़ गया कि यह कौन था और क्या कह गया? इसके बाद मंदिर से आते ब्राह्मणों को देखकर पूछने लगा- पंडितजी ! अन्नपूर्णा कौन है ? ब्राह्मणों ने कहा- तू अन्न छोड़ बैठा है, सो तुझे अन्न की ही बात सूझती है। जा घर जाकर अन्न ग्रहण कर। इस पर धनंजय भाग कर घर पहुंचा और अपनी धर्मपत्नी से सारी बात बता डाली। इस पर वह बोली-नाथ! चिंता मत करो, स्वयं शंकरजी ने यह मंत्र दिया है। वे स्वयं ही खुलासा करेंगे।

आप फिर जाकर उनकी आराधना करो। इस पर पत्नी की बात मानकर धनंजय फिर जैसा का तैसा पूजा में बैठ गया। इस पर रात्रि में शंकर जी ने आज्ञा दी और कहा- तू पूर्व दिशा में चला जा। वह अन्नपूर्णा का नाम जपता जाता और रास्ते में फल खाता, झरनों का पानी पीता जाता है। इस प्रकार कई दिनों तक वह चलता जाता है। एक जगह पर उसे चांदी सी चमकती कोई चीज वन में दिखाई देती है। सुन्दर सरोवर दिखता है और उसके किनारे तमाम अप्सराओं को झुण्ड बनाकर बैठे देखता है। धनंजय देखता है कि अप्सराएं एक कथा कह रही हैं और सब ‘मां अन्नपूर्णा’इस प्रकार बार-बार कह रही थीं।

यह अगहन मास की उजेली रात्रि थी और आज से ही व्रत का आरम्भ था। जिस शब्द की खोज करने वह निकला था, वह उसे वहां सुनने को मिल गया। इस पर धनंजय ने उनके पास जाकर पूछा- हे देवियो ! आप यह क्या करती हो? उन सबने कहा हम सब मां अन्नपूर्णा का व्रत करती हैं। व्रत करने से गई पूजा क्या होता है? यह किसी ने किया भी है? इसे कब किया जाए? कैसा व्रत है ये और कैसी विधि है? मुझसे भी कहो। इस पर अप्सराएं कहने लगीं- इस व्रत को सब कोई कर सकते हैं। इक्कीस दिन तक के लिए 21 गांठ का सूत लेना चाहिए।

21 दिन यदि न बनें तो एक दिन उपवास करें, यह भी न बनें तो केवल कथा सुनकर प्रसाद लें। निराहार रहकर कथा कहें, कथा सुनने वाला कोई न मिले तो पीपल के पत्तों को रख सुपारी या घृत कुमारी (गुवारपाठ) वृक्ष को सामने कर दीपक को साक्षी कर सूर्य, गाय, तुलसी या महादेव को बिना कथा सुनाए मुख में दाना न डालें। यदि भूल से कुछ पड़ जाए तो एक दिवस फिर उपवास करें।

व्रत के दिन क्रोध न करें और झूठ न बोलें। धनंजय बोला- इस व्रत के करने से क्या होगा? इस पर अप्सराएं कहने लगीं- इसके करने से लूलों को हाथ मिलता है, अन्धों को नेत्र मिलता है, निर्धन के घर धन मिलता है, बांझी को संतान मिले, मूर्ख को विद्या आती है। अर्थात जो जिस कामना से इस व्रत को करता है, मां उसकी इच्छा पूरी करती है। वह कहने लगा- बहिनों! मेरे भी धन नहीं है, विद्या नहीं है, कुछ भी तो नहीं है, मैं तो दुखिया ब्राह्मण हूँ, मुझे इस व्रत का सूत दोगी? इस पर अप्सराओं ने कहा, हां भाई तेरा कल्याण हो , तुझे देंगी, ले इस व्रत का मंगलसूत ले। धनंजय ने व्रत किया। व्रत पूरा हुआ, तभी सरोवर में से 21 खण्ड की सुवर्ण सीढ़ी हीरा मोती जड़ी हुई प्रकट हुई। इस पर धनंजय जय ‘अन्नपूर्णा’,जय ‘अन्नपूर्णा’ कहता जाता था। इस प्रकार कितनी ही सीढि़यां उतर गया तो क्या देखता है कि करोड़ों सूर्य से प्रकाशमान अन्नपूर्णा का मन्दिर है, उसके सामने सुवर्ण सिंघासन पर माता अन्नपूर्णा विराजमान हैं।

सामने भिक्षा के लिए शंकर भगवान खड़े हैं। देवांगनाएं चंवर डुलाती रही हैं। कितनी ही हथियार बांधे पहरा दे रही हैं। इस पर धनंजय दौड़कर जगदम्बा के चरणों में गिर गया। देवी उसके मन का क्लेश जान गईं। धनंजय कहने लगा- माता! आप तो अन्तर्यामिनी हो। आपको अपनी दशा क्या बताऊँ ? माता बोली – मेरा व्रत किया है, जा संसार तेरा सत्कार करेगा। माता ने धनंजय की जिह्नवा पर बीज मंत्र लिख दिया। अब तो उसके रोम-रोम में विद्या प्रकट हो गई। इतने में क्या देखता है कि वह काशी विश्वनाथ मन्दिर में खड़ा है। मां का वरदान ले धनंजय घर आया। सुलक्षणा से सब बात कही। माता जी की कृपा से उसके घर में सम्पत्ति उमड़ने लगी। छोटा सा घर बहुत बड़ा हो गया। जैसे शहद के छत्ते में मक्खियां जमा होती हैं, उसी प्रकार अनेक सगे सम्बंधी आकर उसकी बड़ाई करने लगे। कहने लगे-इतना धन और इतना बड़ा घर, सुन्दर संतान नहीं तो इस कमाई का कौन भोग करेगा? लोगों ने धनंजय से कहा कि सुलक्षणा से संतान नहीं है, इसलिए तुम दूसरा विवाह करो।

माता अन्नपूर्णा धागा

इच्छा न होते हुए भी धनंजय को दूसरा विवाह करना पड़ा और सती सुलक्षणा को सौत का दुःख उठाना पड़ा। इस प्रकार दिन बीतते गय फिर अगहन मास आया। नये बंधन से बंधे पति से सुलक्षणा ने कहलाया कि हम व्रत के प्रभाव से सुखी हुए हैं। इस कारण यह व्रत छोड़ना नहीं चाहिए। यह माता जी का प्रताप है। जो हम इतने सम्पन्न और सुखी हैं। सुलक्षणा की बात सुनकर धनंजय उसके यहां आया और व्रत में बैठ गया। नयी बहू को इस व्रत की खबर नहीं थी। वह धनंजय के आने की राह देख रही थी। दिन बीतते गये और व्रत पूर्ण होने में तीन दिवस बाकी थे कि नयी बहू को खबर पड़ी, कि धनंजय तो सुलक्षणा के यहां है। इस पर उसके मन में ईर्ष्या की ज्वाला दहकने लगी और वह क्रोधित होकर सुलक्षणा के घर आ पहुँची ओैर उसने वहां भगदड़ मचा दी।

इसी के साथ धनंजय को अपने साथ घर ले गई। नये घर में धनंजय को थोड़ी देर के लिए निद्रा ने आ दबाया। इसी समय नई बहू ने उसका व्रत का सूत तोड़कर आग में फेंक दिया। अब तो माता जी का कोप जाग गया। घर में अकस्मात आग लग गई, सब कुछ जलकर खाक हो गया। सुलक्षणा जान गई और पति को फिर अपने घर ले आई। नई बहू रूठ कर पिता के घर चली गई। तो वहीं पति को परमेश्वर मानने वाली सुलक्षणा ने पति से कहा- नाथ ! घबराना नहीं। माता जी की कृपा अलौकिक है। पुत्र कुपुत्र हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती।

अब आप श्रद्धा और भक्ति से आराधना शुरू करो। माता जरूर हमारा कल्याण करेंगी। धनंजय फिर माता की पूजा करने लगा। फिर वहीं सरोवर सीढ़ी प्रकट हुई, उसमें ‘मां अन्नपूर्णा’ कहकर वह उतर गया। वहां जाकर माता जी के चरणों में रोने लगा। इस पर माता प्रसन्न होकर बोलीं-यह मेरी स्वर्ण की मूर्ति ले, उसकी पूजा करना, तू फिर सुखी हो जायेगा, जा तुझे मेरा आशीर्वाद है। तेरी स्त्री सुलक्षणा ने श्रद्धा से मेरा व्रत किया है, उसे मैंने पुत्र दिया है। धनंजय ने आँखें खोलीं तो खुद को काशी विश्वनाथ के मन्दिर में खड़ा पाया। वहां से फिर उसी प्रकार घर पहुंचा।

इधर सुलक्षणा के दिन चढ़े और महीने पूरे होते ही पुत्र का जन्म हुआ। गांव में आश्चर्य की लहर दौड़ गई। लोग उसे भी मानने लगे। इस प्रकार उसी गांव के निःसंतान सेठ के पुत्र होने पर उसने माता अन्नपूर्णा का मन्दिर बनवा दिया, उसमें माता जी धूमधाम से पधारीं, यज्ञ किया और धनंजय को मन्दिर के आचार्य का पद दे दिया। जीविका के लिए मन्दिर की दक्षिणा और रहने के लिए बड़ा सुन्दर सा भवन माता की कृपा से उसे मिल गया। धनंजय स्त्री-पुत्र सहित वहां रहने लगा। माता जी की चढ़ावे में भरपूर आमदनी होने लगी। उधर नई बहू के पिता के घर डाका पड़ गया और सब कुछ लुट गया। वे लोग भीख मांगकर पेट भरने लगे। सुलक्षणा को जब यह सुनाई दिया तो उसने नई बहू को बुलावा भेज दिया और फिर उसे अलग घर में रख लिया और उनके अन्न-वस्त्र का प्रबंध कर दिया। धनंजय, सुलक्षणा और उसका पुत्र माता जी की कृपा से आनन्द से रहने लगे। माता अन्नपूर्णा ने जैसे धनंजय और सुलक्षणा के घर में भण्डारे भरे वैसे सबके भण्डार भरें। जय माता अन्नपूर्णा।

वाराणसी में है माता अन्नपूर्णा का भव्य मंदिर
बता दें कि वाराणसी में Maa Annapurna भव्य मंदिर है। इस व्रत में 17 अथवा 21 दिन का व्रत रखा जाता है। बताया जाता है कि जितने दिन का व्रत रखा जाता है, उतने ही गांठ वाला धागा भी माता को अर्पित किया जाता है। यह धागा बहुत ही महत्व रखता है। यह व्रत अति कठोर महाव्रत है। इसमें व्रती 17 अथवा 21 दिन तक अन्न का त्याग करते हैं। फलाहार भी एक ही वक्त किया जाता है। यह कठोर व्रत महिला और पुरुष दोनों ही कर सकते हैं। व्रत अनुष्ठान के लिए महिलाएं बाएं और पुरुष दाएं हाथ में 17 गाठों वाला धागा बाधते हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने से कभी कोई कष्ट नही आता। हमेशा खुशाली बनी रहती है।

DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)