Ahoi Ashtami: अहोई अष्टमी पर माताएं भूलकर भी न डांटे संतान को…जानें कैसे होता है उजमन?-Video
Ahoi Ashtami: कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को अहोई अष्टमी का व्रत किया जाता है। आचार्यों का मानना है कि इस दिन संतान को नहीं डांटना चाहिए, क्योंकि ये व्रत संतानों के लिए ही होता है. इस दिन माताएं अपनी संतान की दीर्घायु के लिए निर्जला व्रत करती हैं और रात में चंद्रमा या तारों को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण करती हैं। यह व्रत अहोई मैय्या को समर्पित होता है। बता दें कि कहीं-कहीं पर तारों तो कहीं पर चंद्रमा को अर्घ्य देने की प्रचलन है.
आचार्य पं. रवि शास्त्री बताते हैं कि शास्त्रों के मुताबिक, इस दिन शिव जी की विधि-विधान से पूजा करने से पुत्र प्राप्ति की इच्छा भी पूरी होगी। माताएं जहां संतानों को प्यार करती हैं तो वहीं उनकी गलती पर उन्हें डांटती भी हैं लेकिन कोशिश करें कि इस दिन अपने बच्चों को न डांटें और न ही भला बुरा कहें।
इस दिन अहोई माता की कथा सुनते वक्त हाथ में कम से कम 7 प्रकार के अनाज जरूर लें। या केवल 7 गेहूं के दाने लेकर भी कथा सुनीं जा सकती है. साथ ही अहोई अष्टमी की पूजा में सभी माताओं को अपने बच्चों को भी साथ में बैठाना चाहिए। अर्घ्य देने के बच्चों का हल्दी से तिलक करके उन्हें प्रसाद जरूर खिलाना चाहिए।
अहोई अष्टमी व्रत का महत्व
रात में चंद्रमा या तारे को अर्घ्य दिया देकर व्रत का पारण करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महिलाएं इस दिन शिव परिवार की पूजा करने के बाद चंद्रमा या तारे को अर्घ्य देती हैं। यह व्रत संतान की सलामती के लिए रखे जाने वाले व्रतों में सबसे प्रमुख है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से आपकी संतान को जीवन में कोई कष्ट नहीं होता है और लंबी आयु की प्राप्ति होती है।
अहोई अष्टमी व्रत की पूजाविधि
मान्यता के मुताबिक, अहोई पूजन के लिए शाम के समय घर की उत्तर दिशा की दीवार पर गेरू या पीली मिट्टी से आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है। उसी के पास स्याहू माता तथा उसके बच्चों की आकृतियां बनाई जाती हैं और विधि पूर्वक स्नान, तिलक आदि के बाद खाने का भोग लगाया जाता है। इस दिन चांदी की अहोई बनवाकर भी पूजन करते हैं। इसी के साथ कुछ जगह चांदी की अहोई में दो मोती डालकर विशेष पूजा करने का भी विधान है।
दीवाली के बाद निकालें अहोई की माला
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि अहोई की माला को निकालकर इसकी पूजा करते गुड़ का भोग लगाकर, जल के छीटें दें और अगले साल उपयोग के लिए सुरक्षित रख लें. दूसरे पुत्र का जन्म होनेन पर इसी माला में चांदी के दो मोती और डलवा लिए जाते हैं. इस तरह से उस स्त्री के जितने भी पुत्र होते हैं और जितने भी पुत्रों का विवाह हुआ होता है उतनी बार दो चांदी के मोती इसमें डालते जाएं लेकिन ध्यान रहे कि माला में स्याहू के चित्र का पैंडिल एक ही रहता है. बता दें कि अहोई अष्टमी का व्रत दिन भर किया जाता है और शाम को चंद्रमा या तारे को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है.
उजमन विधि
अगर किसी स्त्री ने बेटे को जन्म दिया हो या फिर बेटे का विवाह हुआ हो तो उसे अहोई माता का उजमन यानी उद्यापन करना चाहिए. एक थाली में सात जगह चार-चार पूड़ियां रखकर, उनके ऊपर थोड़ा हलवा रख दें. इसी के साथ ही साड़ी-ब्लाउज व रुपए रखकर थाली के चारो तरफ हाथ फेरें और इसके बाद सास के पांव छूकर ये सभी सामान उनको दे दें. अगर सास नहीं है तो जेठानी या फिर जेठानी नहीं है तो रिश्ते में जिसे भी आप खुद से बड़ा मानती हों, उसे भी ये दे सकती हैं.
DISCLAIMER: यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। किसी भी धार्मिक कार्य को करते वक्त मन को एकाग्र अवश्य रखें। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)
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