मात्र चंद दिनों की मेहनत और ढहा दिया BJP का 31 साल पुराना किला…जानें कौंन हैं प्रशांत किशोर; PM मोदी के साथ रहा है गहरा सम्बंध

August 3, 2026 by No Comments

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Prashant Kishor: बिहार के बांकीपुर सीट पर हुए उपचुनाव का रिजल्ट सामने आ चुका है और जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर उर्फ पीके ने जीत हासिल कर ली है. इस तरह से पीके ने मात्र एक महीने की मेहनत में ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के गढ को धराशायी कर दिया है. यहां पर 31 सालों से भाजपा का राज रहा है और 9 चुनाव बीजेपी के पास ही रहे.

नितिन नवीन ने राज्यसभा जाने से पहले ये सीट छोड़ी थी. नितिन नवीन यहां से लगातार पांच बार, यानी 4 बार बांकीपुर और एक बार पटना पश्चिम( बता दें कि पहले बांकीपुर सीट का बड़ा हिस्सा इसी सीट में आता था) से जीत हासिल की थी.

तो वहीं नितिन के पिता नवीन किशोर सिन्हा की बात करें तो वह लगातार चार बार पटना पश्चिम सीट से भाजपा के टिकट पर जीत हासिल करते रहे. इस तरह से 31 साल और 9 चुनाव के बाद भाजपा को यहां से करारी हार का सामना करना पड़ा है. मालूम हो कि 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी (JSP) को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली थी. पहली बार इस पार्टी ने जीत का स्वाद चखा है.

कैसे हुई राजनीति में एंट्री?

बता दें कि सियासी गलियारों में प्रशांत किशोर पांडेय को पीके के नाम से जाना जाता है. उनको राजनीतिक दलों का चाणक्य भी कहा जाता है. दरअसल वह भारत के सबसे लोकप्रिय राजनीतिक सलाहकारों में से एक रहे हैं और उनको पहली बार पहचान 2014 में तब मिली जब पीएम मोदी के लिए सफल चुनावी अभियान चलाया.

जन्म और पढ़ाई

बिहार के सासाराम जिले में स्थित कोनार गांव में प्रशांत किशोर का जन्म 20 मार्च 1977 में हुआ था। उनके पिता श्रीकांत पांडेय एक चिकित्सक थे और उनकी मां सुशीला पांडेय एक गृहिणी थीं. शुरुआती शिक्षा बक्सर में हुई और फिर बाद में हैदराबाद पढ़ने चले गए. उत्तर प्रदेश के लखनऊ विश्वविद्यालय से बैचलर्स इन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (बीबीए) और जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, अमेरिका, हिंदुजा अस्पताल के सहयोग से एएससीआई हैदराबाद से हेल्थकेयर मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री हासिल की. तो वहीं पत्नी जाह्नवी दास असम से ताल्लुक रखती हैं और चिकित्सक हैं.

राजनीति में आने से पहले वह क्या थे?

राजनीति में आने से पहले पीके संयुक्त राष्ट्र द्वारा वित्तपोषित सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में 8 साल तक काम किया. अफ्रीकी देश चाड में वह यूनिसेफ में सामाजिक नीति और योजना के प्रमुख के पद पर तैनात रहे और वहां पर एक संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन के नेतृत्व से भी जुड़े रहे.

पहली मुलाकात में ही प्रभावित हो गए थे पीएम मोदी

पीके ने यूनिसेफ में काम करते हुए 2011 में भारत में आर्थिक समृद्धि और कुपोषण पर एक रिसर्च पेपर तैयार कर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भेजा. कहा जाता है कि इसी रिपोर्ट की वजह से पहली बार गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान पीके की ओर गया था और मोदी ने पीके को मिलने के लिए आमंत्रित किया और पहली मुलाकात ने मोदी प्रशांत किशोर से इतने प्रभावित हुए कि पीएम पद के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत करने से ठीक पहले मोदी ने उन्हें एक राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में अपनी टीम में शामिल कर लिया.

माना जाता है कि यहीं से पीके का राजनीतिक करियर शुरू हुआ जो कि अब बांकीपुर जीत तक पहुंच गया और उसी भाजपा का पुराना किला गिरा दिया जिस पार्टी ने राजनीतिक ब्रेक दिया था. मालूम हो कि 2012 के गुजरात विधानसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के सफल चुनाव अभियान में पीके ने अहम भूमिका निभाई।

मोदी के लिए किया ये काम

प्रशांत किशोर ने 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले सिटिजन्स फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (CAG) नाम की संस्था की सह-स्थापना की. इसके जरिए बीजेपी के लिए चाय पे चर्चा और ‘3डी रैलियों’ जैसे कई नए अभियान की शुरुआत की गई. कहा जाता है कि इन योजनाओं और पीके की रणनीति की वजह से ही इन चुनाव में भाजपा को जीत मिली.

भाजपा से हुए अलग आईपैक की स्थापना की

हालांकि 2014 के बाद भाजपा संगठन से कुछ मतभेदों की वजह से पार्टी से वह अलग हो गए लेकिन इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आईपैक) की स्थापना जब उन्होंने कर ली तो 2015 में उन्होंने बिहार में जदयू, राजद, कांग्रेस आदि दलों के नेतृत्व वाले महागठबंधन को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई. यानी राजनीति से लगातार जुड़े रहे और भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए के खिलाफ अन्य राजनीतिक दलों के साथ रहे. बाद में वह जदयू प्रमुख नीतीश कुमार के बेहद करीबी हो गए.

बने किंगमेकर

तो वहीं वह लगातार राजनीति दलों से जुड़े रहे और फिर बिहार चुनाव के बाद अलग-अलग राज्यों में कांग्रेस, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी), दिल्ली में आम आदमी पार्टी, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ( TMC) और तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कझगम (द्रमुक) आदि कई राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीतियां बनाते रहे और फिर एक किंगमेकर के तौर पर सियासी गलियारे में अपनी पहचान बना ली. उनको राजनीतिक का चाणक्य भी कहा जाता है.

इस तरह आना हुआ सक्रिय राजनीति में

प्रशांत किशोर ने 2018 में औपचारिक रूप से राजनीति में एट्री कर ली. यानी जो पहले पर्दे के पीछे थे वह खुलकर सामने आ गए.16 सितंबर 2018 को नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल-यूनाइटेड (जदयू) में वह शामिल हो गए. उनको तब पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया था लेकिन यह सफर अधिक लंबा नहीं चला क्योंकि 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के मुद्दे पर उनके मदभेद नीतीश कुमार से हो गए. इसके बाद उनको अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर पार्टी से निष्कासित कर दिया गया.

इस तरह लौटना हुआ बिहार

अपनी रणनीति से पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और तमिलनाडु में द्रमुक को 2021 शानदार जीत दिलाई लेकिन 2 मई 2021 को चुनाव रणनीतिकार के काम से हमेशा के लिए उन्होंने संन्यास ले लिया. इसकी वजह तब उन्होंने यह बताई थी कि कोविड-19 महामारी के दौरान इतने संसाधनों और संपर्कों के बावजूद वह जनता की मदद नहीं कर सके. उनकी इस लाचारी ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया. तो वहीं बिहार में सुशासन के खोखले दावे एक बड़ी वजह रही कि उनको अपने राज्य यानी घर बिहार वापस लौटने के लिए प्रेरित किया.

पदयात्रा के बाद खड़ी कर दी अपनी पार्टी

प्रशांत किशोर जब बिहार लौटे तो जनता से सीधे जुड़ने और अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए पदयात्रा निकाली और फिर अपनी पार्टी जन सुराज पार्टी बना डाली. 2025 में बिहार विधानसभा चुनावों में अपने उम्मीदवारों को उतारा लेकिन खुद चुनाव में नहीं उतरे. हालांकि पार्टी को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा. एक भी उम्मीदवार जीत हासिल नहीं कर सका. फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी  और बिहार में ही डटे रहे. साथ ही ये भी संकेत दिया कि अगले चुनाव तक वह पार्टी की नींव मजबूत कर लेंगे और राज्य की जनता के बीच जाते रहेंगे नतीजतन आज बांकीपुर में हुए उपचुनाव में उनको जीत मिल ही गई.

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