Devshayani Ekadashi Katha: “आपके राज्य में एक शूद्र…” देवशयनी एकादशी की कथा पढ़ें यहां

Share News

Devshayani Ekadashi Katha: आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को हरिशयनी एकादशी कहते हैं. इसे देवशयनी और पद्मानाभा एकादशी भी कहा जाता है. इस दिन से श्री विष्णु भगवान चार मास (चौमासा) के लिए क्षीर सागर में शयन के लिए चले जाते हैं। इसीलिए इसे देवशयनी एकादशी कहा जाता है.

प्रचलित कथा के मुताबिक माना जाता है कि एक बार देवर्षि नारद जी ने ब्रह्मा जी से देवशयनी एकादशी (हरिशयनी एकादशी) के माहात्म्य के बारे में पूछा. इसके बाद ब्रह्मा जी ने नारद को बताया कि सतयुग में मान्धाता नाम के एक चक्रवर्ती राजा राज्य करते थे. उनका राज्य ऐसा था जहां उनकी प्रजा सुखी से जीवन जी रही थी और खूब आनन्द राज्य में व्याप्त था.

एक बार राज्य में तीन सालों तक बारिश नहीं हुई, जिससे राज्य में भयानक अकाल पड़ गया और चारो तरफ त्राहि-त्राहि मच गई. इसी के साथ ही राज्य में धार्मिक कार्य भी कम पड़ते चले गए. लोग हवन, यज्ञ, पिण्डदान, कथा, व्रत आदि के कार्य करने बंद करने को मजबूर हो गए.

परेशान प्रजा राजा के दरबार में पहुंची और कष्ट दूर करने की मांग करने लगी. इस पर राजा ने कहा कि वह प्रजा की भलाई करने के लिए पूरी कोशिश करेंगे. राजा प्रजा की दयनीय स्थिति देखकर व्याकुल हो उठे और विचार करने लगे कि आखिर उन्होंने ऐसे कौन से बुरे कर्म किए हैं जो कि इस तरह से उनको दण्ड मिल रहा है?

फिर राजा इस कष्ट से मुक्ति पाने की खोज में राजा सेना को लेकर जंगल की तरफ चल दिए. जंगल में घूमते घूमते राजा ब्रह्मा जी के तेजस्वी पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचे और उनको साष्टांग प्रणाम किया. इस पर मुनि ने राजा को आशीर्वाद दिया और उनसे जंल में विचरने का कारण पूछा. इस पर राजा ने उनके सामने हाथ जोड़कर कहा-मुनि जी! मैंने सभी प्रकार से धर्म का पालन किया लेकिन फिर भी मुझे राज्य में अकाल का कष्ट देखना पड़ रहा है. मेरी प्रजा परेशान है. मैं नहीं जानता कि ऐसा क्यों हो रहा है. कृपया करके आप ही मुझे इस समस्या का समाधान बतायें और मेरा संशय दूर करें.

यह सुनने के बाद अंगिरा ऋषि ने कहा- हे राजन! यह सतयुग है और इसे सभी युगों में श्रेष्ठ और सबसे अधिक उत्तम माना गया है. इसमें छोटे से भी पाप का बड़ा भारी फल मिलता है. इसमें लोग ब्रह्मा की उपासना करते हैं. इसमें धर्म अपने चारों चरणों में व्याप्त रहता है. इसमें ब्राह्मणों के अतिरिक्त अन्य किसी भी जाति को तप करने का अधिकार नहीं है, जबकि आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है. यही कारण है कि आपके राज्य में बारिश नहीं हो रही है.

जब तक उसकी जीवन लीला समाप्त नहीं होगी, तब तक यह समस्या भी खत्म नहीं होगी. उस शूद्र तपस्वी को मारने से ही पाप की शांति होगी.यह सुनकर राजा व्याकुल हो उठा क्योंकि उसका ह्रदय एक निरपराध को मारने के लिए तैयार नहीं था. इसलिए राजा ने ऋषि से दूसरा उपाय पूछा. राजा ने कहा- हे देव! उस निरपराध तपस्वी को मारने के लिए मेरा मन तैयार नहीं हो रहा है. इसलिए इस समस्या का कोई दूसरा समाधान बताएं.

इसके बाद ऋषि ने राजा से कहा कि वह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (पद्मा एकादशी या हरिशयनी, देवशयनी एकादशी) के दिन विधि-विधान से व्रत रखे और विधि से पूजा करे. इस व्रत के प्रभाव के बारिश जरूर होगी. यह उपाय सुनने के बाद राजा वापस अपने राज्य में लौट आए और फिर चारों वर्णों के साथ मिलकर इस एकादशी का विधि पूर्वक व्रत किया जिसके प्रभाव से उनके राज्य में मूसलाधार बारिश हुई और पूरा राज्य धन-धान्य से भर गया.

DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। किसी भी प्रकार की भ्रम की स्थिति में प्रमाणिक ज्योतिषियों से ही परामर्श लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)

ये भी पढ़ें-Devshayani Ekadashi 2025: हरिशयनी एकादशी पर इस तरह करें भगवान विष्णु की पूजा, न खाएं ये सात चीजें; जानें पारण का समय