Dussehra: शत्रुओं पर विजय पाने के लिए दशहरे पर करें शमी वृक्ष का पूजन…पढ़ें ये रोचक कथा

October 11, 2024 by No Comments

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Dussehra: सनातन धर्म में जिस तरह से रक्षाबंधन, दीपावली और होली के त्योहार का महत्व है, ठीक उसी तरह दशहरे (विजयदशमी) का भी महत्व है. मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम ने माता सीता का हरण करने वाले रावध का वध किया था और माता सीता के सम्मान की रक्षा की थी।

यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत को भी दर्शाता है. इसलिए प्रत्येक वर्ष दशहरे (Dussehra ) के दिन रावण के पुतले का दहन किया जाता है औऱ समाज में ये संदेश दिया जाता है कि बुराई कितनी ही ताकतवर क्यों न हो, लेकिन सच्चाई उसे परास्त कर ही देती है.

इस दिन को विजयदशमी भी कहा जाता है, इसलिए इसी दिन विजय दिलाने वाले शमी के पेड़ की पूजा करने का भी विधान शास्त्रों में दिया गया है. इसे क्षत्रियों का बड़ा पर्व माना गया है। इस दिन जहां एक ओर ब्राह्मण सरस्वती जी की पूजा करते हैं तो वहीं इस दिन क्षत्रिय शस्त्र पूजन करते हैं। इस दिन घोड़ों और वाहनों की भी पूजा की जाती है। (Vijay Dashami)

Neelkanth

नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना माना गया है शुभ

इस दिन शाम को नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना शुभ माना गया है। इस पर्व के लिए श्रवण नक्षत्र, प्रदोश व्यापिनी एवं नवमी विद्ध दशमी प्रशस्त होती है। बंगाल में दशहरे वाले दिन काली माता की पूजा की जाती है और मूर्तियों का विसर्जन भी नदियों में किया जाता है।

कथा

एक बार पार्वती जी ने दशहरे के त्योहार के प्रचलन और उसके फल के बारे में भोले बाबा से सवाल किया. इस पर भगवान शंकर ने कहा- “हे देवी! आश्विन शुक्ल दशमी को संध्या बेला में तारा उदय होने के वक्त विजय काल होता है. शत्रु पर अगर विजय पानी है तो राजा को इसी समय युद्ध के लिए प्रस्थान करना चाहिए. भगवान शिव ने कहा कि इस दिन श्रावण नक्षत्र का योग होने पर विशेष शुभ माना गया है. भगवान श्रीराम ने इसी दिन लंका पर चढ़ाई की थी. इसीलिए क्षत्रियों के लिए यह परम्परा बहुत ही विशिष्ट है और महत्वपूर्ण है. शत्रु से युद्ध करने की इच्छा न होने पर भी इसी काल में राजाओं को सीमा का उल्लंघन करना चाहिए. इसी काल में शमी वृक्ष ने अर्जुन का धनुष धारण किया था.

माता पार्वती ने पूछा कि शमी वृक्ष ने अर्जुन का धनुष कब धारण किया था और भगवान रामचंद्रजी ने कब, कैसी प्रिय वाणी कही थी? हे भगवन कृपया समझाइए. इस पर भगवान शिव ने उत्तर देते हुए कहा, “कौरव पक्ष के दुर्योधन ने पांडवों को ध्रूतक्रीड़ा (जुए) में हरा करके 12 साल के वनवास के साथ ही 13वें वर्ष में अज्ञातवास की शर्त रखी थी और ये भी कहा था कि अगर वे अज्ञातवास के दौरान पहचान लिए जाते हैं तो फिर से उनको 12 साल का वनवास भोगना पड़ेगा. इसलिए अज्ञातवास जैसे ही शुरू हुआ अर्जुन ने अपना धनुष शमी के पेड़ पर रख दिया था और खुद बृहन्नला के वेश में राजा विराट के महल में नौकरी करने लगे थे. विराट के बेटे ने जब गौ रक्षा के लिए अर्जुन को अपने साथ में लिया, तब अर्जुन ने शमी के वृक्ष पर से अपने गांडीव (हथियार-धनुष) को उतारकर शत्रु पर विजय हासिल की थी. इसीलिए विजयकाल में शमी की पूजा करने का विधान है.

एक बार पांडव श्रेष्ठ युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया, राजन विजयदशमी के दिन राजा को वस्त्र आभूषणों से स्वयं अलंकृत होकर अपने अनुचरों तथा हाथी-घोड़ों का श्रृंगार करना चाहिए. वाद्ययंत्रों सहित मंगलाचार करना चाहिए. इसी के साथ ही पुरोहित को साथ लेकर पूर्व दिशा में प्रस्थान करके सीमा उल्लंघन करना चाहिए. वहां वास्तु, अष्ट दिग्पाल तथा पार्थ देवता की वैदिक मंत्रों का उच्चारण करके पूजा करनी चाहिए. शत्रु की मूर्ति बनाकर उसके सीने में बाण मारना चाहिए. ब्राह्णणों की पूजा करके हाथी, घोड़े, अस्त्र, शस्त्र आदि का निरीक्षण करना चाहिए. इसके बाद महल में वापस लौटना चाहिए. जो राजा हर साल यह सब क्रिया अर्थात विजया करता है, वह शत्रु पर हमेशा विजय प्राप्त करता है.

DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)

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