देव दीपावली पर करें इस शुभ मुहूर्त में पूजा…मां लक्ष्मी की बरसेगी कृपा; जानें क्यों खास है कार्तिक पूर्णिमा? पढ़ें कथा
Kartik Purnima-Dev Diwali 2025: सनातन धर्म में कार्तिक मास का खास महत्व है तो उस पर भी अगर कार्तिक मास की पूर्णिमा हो तो ये दिन और भी खास हो जाता है. इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं. इस दिन को गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है. इसी दिन देव दीवाली भी मनाई जाती है. मंदिरों से लेकर घरों में दीवाली की तरह ही दीए प्रज्ज्वलित किए जाते हैं तो वहीं गंगा घाटों पर भी दीए प्रज्ज्वलित किए जाते हैं.साथ ही दीपदान (गंगा या किसी भी नदी में दीए प्रज्ज्वलित कर प्रवाहित करना) भी किया जाता है. कहते हैं कि खुद नारायण ने भी इस मास को लेकर कहा है कि “माहों में, मैं कार्तिक माह हूँ.”
इस माह की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा को शास्त्रों ने ‘अति पुष्करिणी’कहा गया है तो वहीं स्कन्द पुराण के अनुसार जो प्राणी कार्तिक मास में प्रतिदिन स्नान करता है, वह यदि केवल इन तीन तिथियों में सूर्योदय से पूर्व स्नान करें तो भी इसका पूरा फल मिलता है. माना जाता है कि बारह मासों में कार्तिक मास आध्यात्मिक और शारीरिक ऊर्जा संचय के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
इस बार कार्तिक पूर्णिमा कल यानी 5 नवम्बर को पड़ रही है. हर साल की तरह इस बार भी काशी से लेकर उत्तर प्रदेश के हर गंगा घाट पर देव दिवाली का त्योहार मनाया जाएगा. आचार्य सुशील कुमार शास्त्री कहते हैं कि इस दिन शाम के समय लक्ष्मीनारायण की विधि-विधान से पूजा और आरती की जाती है. इसी के साथ ही घर व मंदिरों के साथ ही गंगा घाटों में दीवाली की तरह ही दीए प्रज्वलित किए जाते हैं.
मान्यता है कि ऐसा करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है. मान्यता है कि हमेशा शुभ मुहूर्त में ही पूजा-पाठ करना चाहिए और दीपक जलाने चाहिए. तो आइए जानते हैं की देव दिवाली के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि और दीपक जलाने का समय क्या रहेगा…
शुभ मुहूर्त
देव दिवाली के दिन प्रदोष काल में दीए प्रज्ज्वलित करना खास माना गया है. इस समय को सबसे उत्तम माना जाता है. 5 नवंबर की शाम को 5 बजकर 30 मिनट से लेकर 7 बजकर 40 मिनट तक का समय पूजा करने के लिए सबसे श्रेष्ठ रहेगा. मान्यता है कि इस दिन घरों में पूजा के बाद 11, 21, 31 दिए जलाने चाहिए.ऐसा करने से माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं.
गंगा स्नान का महत्व
शास्त्रों में कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने का बहुत बड़ा महत्त्व बताया गया है. मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से पूरे वर्ष गंगा स्नान करने का फल प्राप्त होता है. माना जाता है कि इस दिन गंगा सहित पवित्र नदियों एवं तीर्थों में स्नान करने के साथ ही अर्घ्य, तर्पण, जप-तप, पूजन, कीर्तन एवं दान-पुण्य करने से स्वयं भगवान विष्णु प्राणियों को ब्रह्मघात और अन्य पापों से मुक्त करके जीव को शुद्ध कर देते हैं.
सुनें सत्यनारायण भगवान की कथा
माना जाता है कि पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान के बाद श्री सत्यनारायण कथा का श्रवण, गीता पाठ, विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ व ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करने से प्राणी पापमुक्त व कर्जमुक्त होकर विष्णु की कृपा पाता है.
त्रिपुरारी शिव और मत्स्य अवतार की पढ़ें कथा
माना जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही ब्रह्मा जी का ब्रह्म सरोवर पुष्कर में अवतरण हुआ था. यही वजह है कि इस दिन तीर्थयात्री पवित्र पुष्कर सरोवर में स्नान करते हैं. माना जाता है कि ऐसा करने से देवों की कृपा प्राप्त होती है. तो वहीं कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान् शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था. इससे देवगण बहुत प्रसन्न हुए थे और भगवान विष्णु ने शिवजी को ‘त्रिपुरारी’ नाम दिया. यह नाम शिव के अनेक नामों में से एक है.
मान्यता है कि जग के पालनहार भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी को चार मास के लिए योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं और फिर कार्तिक शुक्ल एकादशी को पुनः जागते हैं. इस एकादशी को देवउठनी एकादशी कहते हैं और इसी के बाद पड़ने वाली पूर्णिमा इसीलिए सबसे अधिक खास होती है. भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागरण से प्रसन्न होकर देवताओं ने पूर्णिमा को लक्ष्मी-नारायण की महाआरती करके दीप प्रज्वलित करते हैं. यही वजह है कि इस दिन देवदीवाली मनाई जाती है. तो वहीं पुराणों में लिखा है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने धर्म और वेदों की रक्षा के लिए मत्स्य अवतार धारण किया था. इसी वजह से कार्तिक पूर्णिमा सभी पूर्णिमा में सबसे उत्तम व खास बताई गई है.
DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। किसी भी धार्मिक कार्य को करते वक्त मन को एकाग्र अवश्य रखें। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)
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