Parivartini Ekadashi: जानें परिवर्तिनी एकादशी पर क्यों करनी चाहिए माता लक्ष्मी की पूजा…पढ़ें कथा
Parivartini Ekadashi: भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मा या परिवर्तनी एकादशी कहते हैं. इस एकादशी को वर्तमान एकादशी भी कहते हैं. यह माता लक्ष्मी का परम आह्लादकारी व्रत है. इस दिन आषाढ़ मास से शेष शैय्या पर निद्रामग्न भगवान विष्णु शयन करते हुए करवट बदलते हैं. इस एकादशी को भगवान के वामन अवतार का व्रत एवं पूजन किया जाता है.
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि इस व्रत को करने से सभी प्रकार के अभीष्ट सिद्ध हो जाते हैं. मान्यता है कि इस दिन की गई पूजा व व्रत वाजपेय यज्ञ के समान फल देने वाला होता है और सभी पापों को नष्ट करने वाला होता है. इस दिन माता लक्ष्मी का पूजन करना भी श्रेष्ठ बताया गया है. क्योंकि देवताओं ने अपने राज्य को फिर से प्राप्त करने के लिए महालक्ष्मी का ही पूजन किया था.
इस तरह करे व्रत
इस दिन व्रती को चाहिए कि सुबह स्नान करने के बाद भगवान वामनजी की प्रतिमा स्थापित करें. साथ ही मत्स्य, कूर्म, वाराह आदि नामों का उच्चारण करते हुए गंध, फूल आदि से विधि पूर्वक पूजन करें. इसके बाद दिन पर व्रत (उपवास) रखकर भगवान का मन ही मन जप करें. रात में जागरण करें. फिर दूसरे दिन सुबह स्नान आदि के बाद पूजन करें और फिर ब्राह्मणों को भोजन करा कर दान करें. इसके बाद व्रत का पारण करें.
परिवर्तिनी एकादशी कथा
पौराणिक मान्यता है कि त्रेतायुग में बलि नामक असुर का राज था लेकिन असुर होने के बावजूद वह महादानी और भगवान श्री विष्णु का बहुत परम भक्त था। राजा बलि के महल में जो कोई भी आता था वह उसे खाली हाथ नहीं जाने देता था। एक बार वामन अवतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि की परीक्षा लेने के बारे में विचार किया और उस समय राजा बलि ने तीनों लोकों पर अधिकार कर रखा था। क्योंकि बलि बहुत बड़ा दानी था इसलिए भगवान विष्णु वामन रूप धारण करके उसके पास पहुंचे और उन्होंने बलि से तीन पग भूमि की मांग की। बलि ने वामन स्वरूप भगवान विष्णु की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और उन्हें तीन पग जमीन देने का वचन दिया लेकिन पहले और दूसरे पग में ही भगवान विष्णु ने समस्त लोकों को नाप लिया और जब तीसरे पग के लिये कुछ भी नहीं बचा था तब बलि ने अपना वचन पूरा करने के लिए अपना शीष ही उनके पग के नीचे कर दिया। राजा बलि की वचन प्रतिबद्धता से प्रसन्न होकर भगवान वामन ने उसे पाताल लोक का स्वामी बना दिया लेकिन राजा बलि ने भगवान विष्णु को भी यहां अपने साथ रहने के लिए कहा। इस बात को भगवान विष्णु ने स्वीकार कर लिया था. मान्यता है कि इसी दिन यानी इस एकादशी के दिन ही विष्णु भगवान सोते हुए करवट भी बदलते हैं।
DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)