Putrada Ekadashi Vrat Katha: पौष पुत्रदा एकादशी पर जरूर पढ़ें ये कथा…देखें पूजा विधि

December 29, 2025 by No Comments

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Putrada Ekadashi Vrat Katha: सनातन धर्म में पौष महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं. इस एकादशी का भी अन्य एकादशियों की तरह की विशेष महत्व शास्त्रों में बताया गया है. यह व्रत विशेषकर संतान सुख, संतान की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है. इसी के साथ ही इस एकादशी को वैकुंठ एकादशी के नाम से भी जाना जाता है.

इस बार पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत मंगलवार यानी 30 दिसंबर को पड़ रहा है. तो वहीं 31 दिसंबर को व्रत का पारण किया जाएगा. दरअसल 30 दिसम्बर को पूरे दिन की एकादशी मिल रही है. इसलिए अधिकांश व्रती इसी दिन व्रत रखेंगी हालांकि कई लोग दशमी के साथ पड़ने वाली एकादशी को नहीं मानते और द्वादशी के साथ पड़ने वाली एकादशी तिथि को महत्व देते है.

फिलहाल इस बार की पौष पुत्रदा एकादशी इसलिए भी खास मानी जा रही है, क्योंकि यह साल 2025 की आखिरी एकादशी भी है. मान्यता है कि इस दिन व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए, अन्यथा एकादशी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता. इसलिए पूजा में पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा जरूर पढ़ें या सुनें.

ऐसे करें पूजा

भगवान विष्णु की मूर्ति को उच्चासन पर रखें और फिर धूप, दीप, फूल, चंदन आदि से पूजन करें तथा आरती उतारकर भोग लगाएं और फिर अपनी इच्छा के अनुसार ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दें. कथा जरूर सुनें.

बता दें कि सनातन धर्म में एकादशियों का विशेष महत्व है. यह पर्व प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है. इस दिन भगवान विष्णु संग मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है. धार्मिक मान्यता है कि एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की पूजा करने से मनवांछित फल मिलता है.

मान्यता है कि पुत्रदा एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा करने से निसंतान दंपतियों को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है और घर परिवार में सुख, समृद्धि एवं शांति आती है। अगर आप पुत्र रत्न सुख पाना चाहते हैं, तो पौष पुत्रदा एकादशी के दिन पूजा के समय संतान गोपाल स्तोत्र का पाठ अवश्य करें। इसी के साथ ही कथा भी पढ़नी चाहिए. वैसे भी सनातन धर्म के किसी भी व्रत में कथा का पढ़ना अनिवार्य माना गया है.

कथा

प्रचलित कथा के मुताबिक मान्यता है कि किसी समय भद्रावती नगरी में सुकेतु नाम का राजा अपनी पत्नी शैव्या के साथ राज करता था. राजा और रानी दानशील और धर्मात्मा थे. सम्पूर्ण सुखों के पूर्ण होने के बावजूद भी राजा-रानी संतानहीनता के कारण अत्यंत दुखी थे. राजा दुखी होकर राज्य भार मंत्रियों के ऊपर छोड़कर वनवासी हो गया और आत्महत्या करने का मन बना लिया.

इसके बाद वह रानी को अकेला छोड़कर चला गया और भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे बैठकर अपने भाग्य को कोसने लगा. इसी दौरान उसको किसी ऋषि के कंठ से उच्चारित वेद मंत्र सुनाई दिए. वह उस ध्वनि की दिशा की ओर बढ़ गया. कुछ देर चलने के बाद ही उसे दिखाई दिया कि एक स्थान पर बहुत से ब्राह्मण कमल के फूलों से भरे तालाब के तट पर वेदों का पाठ कर रहे हैं.

इस पर सुकेतु भी प्रणाम करके वेदपाठ सुनने के लिए बैठ गए. जब वेदपाठ खत्म हो गया तो राजा ने ब्राह्मणों के अपने आने की वजह बताई. इस पर ब्राह्मणों ने राजा की व्यथा सुनी और फिर उनको पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने के लिए कहा. इसके बाद राजा घर लौट आया और फिर अपनी पत्नी के साथ मिलकर पुत्रदा एकादशी का व्रत रखना शुरू कर दिया.

इसके बाद उसके घर में पुत्र का जन्म हुआ जो कि बहुत ही सुंदर और गुणवान था. राजा-रानी ने भगवान विष्णु की पूजा की तो उनके घर में पुत्र का जन्म हुआ. माना जाता है कि तभी से इस व्रत का प्रचलन शुरू हुआ. मान्यता है कि जिनके कोई संतान नहीं होती, अगर वे ये व्रत करते हैं तो उनको संतान की प्राप्ति होती है. ध्यान रखने की बात ये है कि इस व्रत को पूरे मन-श्रद्धा और संयम से किया जाए.

प्रचलित धार्मिक व पौराणिक कथा के मुताबिक, प्राचीन समय में भद्रावती नदी के किनारे राजा संकेतमान राज करता था. राजा के पास अपार धन-संपत्ति थी, लेकिन वह संतान सुख से वंचित था. इस कारण राजा और उसकी पत्नी शैव्या हमेशा दुखी रहा करते थे. राजा को यह भी चिंता सताती थी कि, मृत्यु के बाद राजपाट कौन संभालेगा और पूर्वजों का उद्धार कौन करेगा. संतान न होने से ना ही राज्य को उत्तराधिकारी मिल पाएगा और ना पितरों को मोक्ष.

दुखी मन से राजा संकेतमान सारे राजपाट का त्याग कर वन की ओर चले गए. वन में उनकी मुलाकात कुछ ऋषियों से हई. राजा ने ऋषिमुनियों को अपने दुख का कारण बताया. राजा की बाथ सुनकर ऋषियों ने उन्हें, पौष महीने के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने को कहा. इसके बाद राजा पुन: अपने राज्य लौट आए.

राजा ने ऋषियों के कहेनुसार, पुत्रदा एकादशी का विधि-विधान से व्रत-पूजन किया. व्रत के प्रभाव से रानी गर्भवती हुई और राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. इसके बाद से ही पुत्रदा एकादशी व्रत रखने की शुरुआत मानी जाती है. कहा जाता इस व्रत को करने से संतान संबंधित सभी समस्याएं दूर होती हैं और भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है.

DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)

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