भगवान शिव का ध्यान कर सावन में कर लें बस इतना काम…हो जाएंगे सारे कष्ट दूर
Shiv Shivashtak Stotra: भोलेनाथ की कृपा पाने के लिए श्रद्धालु उनका जलाभिषेक से लेकर दुग्धाभिषेक और न जाने किन-किन फलों के जूस तक से अभिषेक करते हैं लेकिन भोले बाबा तो इतने भोले हैं कि जलाभिषेक मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं लेकिन श्रद्धालुओं की अपनी भक्ति है जो बाबा को अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्रद्धा अर्पित करते हैं. तो वहीं माना जाता है कि सावन में भोलेनाथ धरती पर विचरण करते हैं, इसलिए इस मास का महत्व अधिक बढ़ जाता है और शिवालयों में भी बड़ी संख्या में भक्त भोले बाबा की पूजा के लिए पहुंचते हैं.

पंडित रवि शास्त्री
तो वहीं पंडित रवि शास्त्री कहते हैं कि अगर सावन में श्रद्धालु भोलेनाथ का परम कल्याणकारी शिवाष्टक स्तोत्र का ही पाठ करे तो भोलेनाथ की कृपा सदा के लिए मिल जाएगी. वह कहते हैं कि यह लयात्मक स्तोत्र बहुत थोड़े समय में कंठस्थ हो जाता है और कुछ न करके यदि साधक भगवान शिव का ध्यान करते हुए केवल इस स्तोत्र का ही श्रद्धापूर्वक पाठ करे, तो वह भोलेनाथ को प्रसन्न कर सकता है.
इससे भगवान शिव जल्द ही प्रसन्न होकर भक्तों के सभी कष्टों को दूर करेंगे, लेकिन इस बात को याद रखें कि शिवाष्टक स्तोत्र को करते वक्त मन-मस्तिष्क को पूरी तरह से एकाग्र रखें. मन में किसी भी तरह का छल-कपट न रखें. चारित्रिक और नियत के साफ होना भी जरूरी है. क्योंकि जब तक आप पूरी तरह से मन से साफ नहीं होंगे तब तक किसी भी तरह का पूजा-पाठ फलित नहीं होगा. यह शिवाष्टक भगवान शिव की आराधना है।
“श्री शिव शिवाष्टक स्त्रोत्र”
जय शिवशंकर, जय गंगाधर, करुणा-कर करतार हरे,
जय कैलाशी, जय अविनाशी, सुखराशि, सुख-सार हरे
जय शशि-शेखर, जय डमरू-धर जय-जय प्रेमागार हरे,
जय त्रिपुरारी, जय मदहारी, अमित अनन्त अपार हरे,
निर्गुण जय जय, सगुण अनामय, निराकार साकार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
जय रामेश्वर, जय नागेश्वर वैद्यनाथ, केदार हरे,
मल्लिकार्जुन, सोमनाथ, जय, महाकाल ओंकार हरे,
त्र्यम्बकेश्वर, जय घुश्मेश्वर भीमेश्वर जगतार हरे,
काशी-पति, श्री विश्वनाथ जय मंगलमय अघहार हरे,
नील-कण्ठ जय, भूतनाथ जय, मृत्युंजय अविकार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
जय महेश जय जय भवेश, जय आदिदेव महादेव विभो,
किस मुख से हे गुरातीत प्रभु! तव अपार गुण वर्णन हो,
जय भवकार, तारक, हारक पातक-दारक शिव शम्भो,
दीन दुःख हर सर्व सुखाकर, प्रेम सुधाधर दया करो,
पार लगा दो भव सागर से, बनकर कर्णाधार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
जय मन भावन, जय अति पावन, शोक नशावन,
विपद विदारन, अधम उबारन, सत्य सनातन शिव शम्भो,
सहज वचन हर जलज नयनवर धवल-वरन-तन शिव शम्भो,
मदन-कदन-कर पाप हरन-हर, चरन-मनन, धन शिव शम्भो,
विवसन, विश्वरूप, प्रलयंकर, जग के मूलाधार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
भोलानाथ कृपालु दयामय, औढरदानी शिव योगी,
सरल हृदय, अतिकरुणा सागर, अकथ-कहानी शिव योगी,
निमिष में देते हैं, नवनिधि मन मानी शिव योगी,
भक्तों पर सर्वस्व लुटाकर, बने मसानी शिव योगी,
स्वयम् अकिंचन,जनमनरंजन पर शिव परम उदार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
आशुतोष! इस मोह-मयी निद्रा से मुझे जगा देना,
विषम-वेदना, से विषयों की मायाधीश छड़ा देना,
रूप सुधा की एक बूँद से जीवन मुक्त बना देना,
दिव्य-ज्ञान- भंडार-युगल-चरणों को लगन लगा देना,
एक बार इस मन मंदिर में कीजे पद-संचार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
दानी हो, दो भिक्षा में अपनी अनपायनि भक्ति प्रभो,
शक्तिमान हो, दो अविचल निष्काम प्रेम की शक्ति प्रभो,
त्यागी हो, दो इस असार-संसार से पूर्ण विरक्ति प्रभो,
परमपिता हो, दो तुम अपने चरणों में अनुरक्ति प्रभो,
स्वामी हो निज सेवक की सुन लेना करुणा पुकार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
तुम बिन ‘बेकल’ हूँ प्राणेश्वर, आ जाओ भगवन्त हरे,
चरण शरण की बाँह गहो, हे उमारमण प्रियकन्त हरे,
विरह व्यथित हूँ दीन दुःखी हूँ दीन दयालु अनन्त हरे,
आओ तुम मेरे हो जाओ, आ जाओ श्रीमंत हरे,
मेरी इस दयनीय दशा पर कुछ तो करो विचार हरे।
पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥
॥ इति श्री शिवाष्टक स्तोत्रं संपूर्णम् ॥
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