Halshashthi fast-2022: हलषष्ठी व्रत रखकर महिलाओं ने की विधि-विधान से पूजा, पढ़ी कथा, देखें वीडियो, जानें क्या है हल और बलराम के विवाह की कथा, पढ़ें बलराम जी की आरती

August 17, 2022 by No Comments

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संतान की दीर्घायु और स्वास्थ्य के लिए सनातन धर्म को मानने वाली महिलाओं ने बुधवार (17 अगस्त) को विधि-विधान के साथ हलषष्ठी व्रत रखकर पूजा-अर्चना की। बता दें कि प्रतिवर्ष भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को यह व्रत भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई श्री बलरामजी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

बलराम जी

मान्यता है कि इस व्रत के हलधर से जुड़े होने के कारण इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं खेत में उगी कोई भी चीज नहीं खाती हैं। इसी के साथ प्रचलित कथाएं यह भी बताती हैं कि इस दिन जुते-बोए खेत में भी व्रती को पैर नहीं रखना चाहिए। इस व्रत को ललही छठ व हरछठ भी कहते हैं। व्रत रखने वाली महिलाएं इस दिन तालाब में उगी हुई चीजों का सेवन करती हैं। जैसे मखाना, सिंघाड़े का आटा आदि। बलराम जी को बलदाऊ के नाम से भी पुकारा जाता है।

जानें क्या है बलराम जी के हल की कथा

कथा-1
बलराम जी के हल (plow) (जिससे खेत जोता जाता है) के प्रयोग के संबंध में किवदंती के आधार पर दो कथाएं मिलती है। कहते हैं कि एक बार कौरव और बलराम के बीच किसी प्रकार का कोई खेल हुआ। इस खेल में बलरामजी जीत गए थे लेकिन कौरव यह मानने को ही नहीं तैयार थे। ऐसे में क्रोधित होकर बलरामजी ने अपने हल से हस्तिनापुर की संपूर्ण भूमि को खींचकर गंगा में डुबोने की कोशिश करने लगे। इसी बीच आकाशवाणी हुई कि बलराम ही विजेता है। इसके बाद सभी ने मान लिया कि बलराम जी ही विजेता हैं। इससे बाद संतुष्ट होकर बलरामजी ने अपना हल रख दिया। तभी से वे हलधर के रूप में प्रसिद्ध हुए।

कथा-2

एक दूसरी कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी जाम्बवती के पुत्र साम्ब का दिल दुर्योधन और भानुमती की पुत्री लक्ष्मणा पर आ गया था और वे दोनों प्रेम करने लगे थे। दुर्योधन के पुत्र का नाम लक्ष्मण था और पुत्री का नाम लक्ष्मणा था। दुर्योधन अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के पुत्र से नहीं करना चाहता था। इसलिए एक दिन साम्ब ने लक्ष्मणा से गंधर्व विवाह कर लिया और लक्ष्मणा को अपने रथ में बैठाकर द्वारिका ले जाने लगा। जब यह बात कौरवों को पता चली तो कौरव अपनी पूरी सेना लेकर साम्ब से युद्ध करने आ पहुंच गए।

कौरवों ने साम्ब को बंदी बना लिया। जब इसकी जानकारी श्रीकृष्ण और बलराम को हुई तो बलराम हस्तिनापुर पहुंच गए। बलराम ने कौरवों से निवेदनपूर्वक कहा कि साम्ब को मुक्तकर उसे लक्ष्मणा के साथ विदा कर दें, लेकिन कौरवों ने बलराम की बात नहीं मानी। इस पर बलराम क्रोध से भर गए और अपने रौद्र रूप में प्रकट हो गए। वह अपने हल से ही हस्तिनापुर की संपूर्ण धरती को खींचकर गंगा में डुबोने चल पड़े। यह देखकर कौरव डर से कांपने लगे। संपूर्ण हस्तिनापुर में हाहाकार मच गया। सभी ने बलराम से माफी मांगी और तब साम्ब को लक्ष्मणा के साथ विदा कर दिया। बाद में द्वारिका में साम्ब और लक्ष्मणा का वैदिक रीति से विवाह संपन्न हुआ।

जानें बलराम जी के विवाह की कहानी
यह मान्यता है कि भगवान विष्णु ने जब-जब अवतार लिया उनके साथ शेषनाग ने भी अवतार लेकर उनकी सेवा की। इसी कारण बलराम जी को भी शेषनाग का ही अवतार माना जाता है, लेकिन बलराम के विवाह का शेषनाग से क्या सम्बंध है, उसे इस कहानी के जरिए यहां बताया जा रहा है। गर्ग संहिता के अनुसार एक इनकी पत्नी रेवती की एक कहानी मिलती है जिसके अनुसार पूर्व जन्म में रेवती पृथ्वी के राजा मनु की पुत्री थी जिनका नाम था ज्योतिष्मती। एक दिन मनु ने अपनी बेटी से वर के बारे में पूछा कि उसे कैसा वर चाहिये इस पर ज्योतिष्मती बोली जो पूरी पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली हो।

इस पर बेटी मनु की इच्छा इंद्र के सामने प्रकट करते हुए पूछा कि सबसे शक्तिशाली कौन है तो इंद्र का जवाब था कि वायु ही सबसे ताकतवर हो सकते हैं लेकिन वायु ने अपने को कमजोर बताते हुए पर्वत को खुद से बलशाली बताया फिर वे पर्वत के पास पंहुचे तो पर्वत ने पृथ्वी का नाम लिया और धरती से फिर बात शेषनाग तक पंहुची। फिर शेषनाग को पति के रुप में पाने के लिये ज्योतिष्मती ब्रह्मा जी के तप में लीन हो गईं। तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने द्वापर में बलराम से शादी होने का वर दिया। द्वापर में ज्योतिष्मती ने कुश स्थली के राजा (जिनका राज पाताल लोक में चलता था) कुडुम्बी के यहां जन्म लिया।

बेटी के बड़ा होने पर कुडुम्बी ने ब्रह्मा जी से वर के लिये पूछा तो ब्रह्मा जी ने पूर्व जन्म का स्मरण कराया तब बलराम और रेवती का विवाह तय हुआ, लेकिन एक दिक्कत अब भी थी वह यह कि पाताल लोक की होने के कारण रेवती कद-काठी में बहुत लंबी-चौड़ी दिखती थी और पृथ्वी लोक के सामान्य मनुष्यों के सामने तो वह दानव नजर आती थीं, लेकिन हलधर ने अपने हल से रेवती के आकार को सामान्य कर दिया, इसके बाद से उन्होंनें सुख-पूर्वक जीवन व्यतीत किया। कथा के मुताबिक बलराम और रेवती के दो पुत्र हुए जिनके नाम निश्त्थ और उल्मुक थे। एक पुत्री ने भी इनके यहां जन्म लिया जिसका नाम वत्सला रखा गया। माना जाता है कि श्राप के कारण दोनों भाई आपस में लड़कर ही मर गये थे। वत्सला का विवाह दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण के साथ तय हुआ था, लेकिन वत्सला अभिमन्यु से विवाह करना चाहती थी। तब घटोत्कच ने अपनी माया से वत्सला का विवाह अभिमन्यु से करवा दिया था।

बलदाऊ जी की आरती

कृष्ण कन्हैया को दादा भैया,
अति प्रिय जाकी रोहिणी मैया

श्री वसुदेव पिता सौं जीजै……
बलदाऊ

नन्द को प्राण, यशोदा प्यारौ ,
तीन लोक सेवा में न्यारौ

कृष्ण सेवा में तन मन
भीजै …..बलदाऊ

हलधर भैया, कृष्ण कन्हैया,
दुष्टन के तुम नाश करैया

रेवती, वारुनी ब्याह रचीजे ….
बलदाऊ

दाउ दयाल बिरज के राजा,
भंग पिए नित खाए खाजा

नील वस्त्र नित ही
धर लीजे,……बलदाऊ

जो कोई बल की आरती गावे,
निश्चित कृष्ण चरण राज पावे
बुद्धि, भक्ति ‘गिरि’
नित-नित लीजे …..बलदाऊ

DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)