Vishwakarma Jayanti: धर्म के सात पुत्र हुए…पढ़ें विश्वकर्मा भगवान की कथा-Video
Vishwakarma Jayanti Katha: विश्वकर्मा जयंती हर साल 17 सितम्बर को मनाई जाती है. माना जाता है कि ब्रह्मांड के पहले शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से बिजनेस में बढ़ोतरी होती है. ये तो सभी जानते हैं कि धर्म सनातन में कोई भी व्रत- पूजा बिना कथा के पूरी नहीं मानी जाती है. इसलिए विश्वकर्मा जयंती पर भी भगवान विश्वकर्मा की कथा जरूर सुनें या पढ़ें.
सूतजी ने कहा, एक बार मुनि विश्वमित्र के बुलाने पर मुनि और संन्यासी लोग एक स्थान पर सभा करने के लिए एकत्र हुए. मुनि विश्वमित्र ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, हे मुनियों आश्रमों में दुष्ट राक्षस यज्ञ करने वाले हमारे मुनियों को खा रहे हैं. यज्ञों को नष्ट कर रहे हैं. जिसके कारण हमारे पूजा-पाठ, ध्यान आदि में परेशानी हो रही है। इसलिए अब हमें तुरंत उनके कुकृत्यों से बचने के लिए कोई उपाय जरूर करना चाहिए.
इस पर वशिष्ठ मुनि बोले एक बार पहले भी ऋषि-मुनियों पर इस तरह का संकट आया था। उस समय हम् सब मिलकर ब्रह्माजी के पास गए थे और उन्होंने उपाय बताया था। इसके बाद सभी ने ब्रह्मदेव की ही शरण में जाने का निर्णय किया और सभी ऋषि-मुनियों ने स्वर्ग को प्रस्थान किया।
मुनियों के इस कष्ट को सुनकर ब्रह्माजी को बड़ा आश्चर्य हुआ और बोले हे मुनियों राक्षसों से तो स्वर्ग में रहने वाले देवता को भी भय लगता रहता है। तो फिर मनुष्य भला क्या है जो बुढ़ापे और मृत्यु के दुखों में ही लिप्त रहता है। उन राक्षसों को नष्ट करने में श्री विश्वकर्मा समर्थ हैं इसलिए आप लोग श्रीविश्वकर्मा के शरण में जाएं।
वह आगे बोले कि इस समय पृथ्वी पर अग्नि देवता के पुत्र मुनि अगिंरा यज्ञों में श्रेष्ठ पुरोहित हैं और वही श्री विश्वकर्मा के भक्त हैं। उनके पास जाओ वही आपके दुखों को दूर कर सकते हैं.
सूतजी बोले, ब्रह्माजी की बात सुनकर मुनि लोग अगिंरा ऋषि के पास गए और अपनी पूरी बात अगिंरा ऋषि को बताई. इस पर उन्होंने कहा कि मुनियों आप लोग क्यों व्यर्थ में इधर-उधर मारे-मारे फिर रहे हैं। दुखों दूर करने में विश्वकर्मा भगवान के अतिरिक्त और कोई भी समर्थ नहीं है।
उन्होंने कहा कि आप अमावस्या के दिन अपने सभी साधारण कर्मों को रोककर भक्ति पूर्वक श्रीविश्वकर्मा कथा सुनें और उनकी उपासना करें। भगवान विश्वकर्मा आपके सारे कष्टों को अवश्य दूर करेंगे।
महर्षि अगिंरा की बात सुनकर सभी ऋषि-मुनि अपने-अपने आश्रमों को चले गए। तत्प्रश्चात् अमावस्या के दिन, मुनियों ने यज्ञ किया और पूरे मन से भगवान विश्ववकर्मा की पूजा की. साथ ही कथा सुनी, जिसका परिणाम यह हुआ कि सभी राक्षस भस्म हो गए और ऋषि-मुनियों का यज्ञ विघ्नों से रहित हो गया और उनके सभी कष्ट दूर हो गए. माना जाता है कि जो मनुष्य पूरे भक्ति-भाव से विश्वकर्मा भगवान की पूजा करता है, वह सुखों को प्राप्त करता है और उसके कार्य बिना किसी रुकावट के संचालित होता रहता है.
ये कथा भी है प्रचलित
एक कथा के अनुसार संसार की रचना के आरंभ में भगवान विष्णु सागर में प्रकट हुए. विष्णु जी के नाभि-कमल से ब्रह्मा जी दृष्टिगोचर हो रहे थे. ब्रह्मा के पुत्र “धर्म” का विवाह “वस्तु” से हुआ। धर्म के सात पुत्र हुए इनके सातवें पुत्र का नाम ‘वास्तु’ रखा गया, जो शिल्पशास्त्र की कला से परिपूर्ण थे. ‘वास्तु’ के विवाह के पश्चात उनका एक पुत्र हुआ जिसका नाम विश्वकर्मा रखा गया, जो वास्तुकला के अद्वितीय गुरु बने। मान्यता है कि विश्वकर्मा पूजा करने वाले व्यक्ति के घर धन-धान्य तथा सुख-समृद्धि की कभी कोई कमी नही रहती है. इस पूजा की महिमा से व्यक्ति के व्यापार में वृद्धि होती है तथा सभी मनोकामना पूरी हो जाती है।
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DISCLAIMER: यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)
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