Akshaya Tritiya Katha: गरीब ब्राह्मण का दान या युधिष्ठिर का यज्ञ…कौन बना श्रेष्ठ…? पढ़ें अक्षय तृतीया की कथा-माहात्म्य
Akshaya Tritiya Katha: एक बार महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा- हे भगवन, मुझे अक्षय तृतीया के बारे में जानने की इच्छा हो रही है. इसलिए आप इसके बारे में बताएं. इस पर भगवान ने कहा कि यह परम पुण्यदायी तिथि है. इस दिन दोपहर से पहले स्नान करने के बाद पूजा, जप, तप, होम, पितृ तर्पण और दान आदि करने वाले को महा पुण्य प्राप्त होता है. इसी दिन से सतयुग या धर्मयुग का आरम्भ होता है. इसलिए इसे युगादि तृतीया भी कहते हैं.
भगवान ने आगे कहा कि “हे युधिष्ठिर, प्राचीन काल में महादेव नाम का एक गरीब रहता था जो कि आस्तिक, सदाचारी, गौ, देव-ब्राह्मण पूजक एक वैश्य था. उसका परिवार बहुत बड़ा था, जिसके कारण वह हमेशा व्याकुल रहता था. उसने किसी पंडित से अक्षय तृतीया के बारे में सुना था कि वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन किए हुए दान, जप, हवन आदि से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है.
तब जब कालान्तर में ये पर्व आया तो उसने सुबह ही गंगा स्नान कर पितरों को तर्पण किया और विधिपपूर्वक देवताओं का पूजन करने के बाद उसने गोले के लड्डू, जौ, गैहूं, नमक, जल से भरे घड़े, सत्तू, दही, चावल, गुड़, स्वर्ण, वस्त्र, कलश, पंखा, ईख से बनी चीजों आदि वस्तुओं का दान किया.
अपनी पत्नी के बार-बार मना करने के बाद भी वह अपने कुटुम्बजनों से चिंतित रहने तथा बुढ़ापे के कारण अनेक रोगों से पीड़ित होने पर भी वह अपने धर्म-कर्म और दान-पुण्य से विमुख नहीं हुआ. इसकी वजह से वह आगे चलकर कुशावती नगरी का महाप्रतापी राजा हुआ. वैभव सम्पन्न होने के बाद भी उसकी बुद्धि कभी विचलित नहीं हुई. यह सब अक्षय तृतीया का ही फल था.
इस राजा के कोष में अक्षय सम्पत्ति का निवास था. राजा को अपनी यह अक्षय सम्पत्ति देखकर आश्चर्य हुआ तो उसने पंडितों से पूछा. इस पर पंडितों ने उसे अक्षय तृतीया के माहात्म्य के बारे में बताया. इस पर उसे अपने पूर्व पुण्य की स्मृति हो आई.”
इस दिन मंगल ऋषि का उपाख्यान भी सुनना चाहिए. माना जाता है कि जब महाराजा युधिष्ठिर ने राजसूर्य यज्ञ किया तब यज्ञ की समाप्ति पर एक नेवला उस यज्ञ मंडप में लोटने लगा था. इस पर युधिष्ठिर ने ऋषियों से पूछा, तो उन्होंने कहा कि राजन, आप इस नेवले से ही पूछो. इस पर युधिष्ठिर ने नेवले से पूछा तो नेवला कहने लगा, युधिष्ठिर तेरा यह यज्ञ इस ब्राह्मण के यज्ञ के बराबर भी नहीं है, जिसने तीन मुठ्ठी सत्तू दान कर परम पुरुषार्थमय यज्ञ किया था.
नेवला बोला-प्राचीन समय में खेतों से अन्न कण चुनकर निर्वाह करने वाला मुंगल नाम का एक ब्राह्मण था. एक समय उसके देश में अकाल पड़ा. इस पर भूखे रहकर ब्राह्मण ने दूर-दूर खेतों में जाकर तीन अंजुलि अन्न इकठ्ठा किया और परिवार के साथ भोजन करने बैठा.
तभी धर्म ने ब्राह्मण अतिथि बन गरीब ब्राह्मण की परीक्षा ली और उसके घर के बाहर द्वार पर जाकर अन्न-जल मांगा. इस पर ब्राह्मण ने एक पल की भी देरी किए बिना अपना, पत्नी तथा बहू के भाग का भोजन उस अतिथि को दे दिया और धर्म की रक्षा की. इस अन्न के प्रभाव से निराहार हो ब्राह्मण के पूरे परिवार की मृत्यु हो गई और वे सभी पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्गलोक को गए.
वहां उस ब्राह्मण के अन्न दान के कुछ कण उस पृथ्वी पर गिर गए थे, मैं वहां पहुंचा और उस भूमि को पवित्र मानकर लोटने लगा. उस परम यज्ञ के कणों के कारण मेरा आधा अंग स्वर्णमय हो गया और अब आधा शेष स्वर्णमय शरीर करने के लिए मैं प्रत्येक यज्ञस्थल में जाता हूं और लोटता हूं लेकिन आज तक दूसरा कोई यज्ञ न तो उस ब्राह्मण से यज्ञ के समान हुआ और न मेरा बाकी का शरीर स्वर्णमय बना. आपके यज्ञ में भी मैं इसी इच्छा से लोट लगा रहा हूं. यह सुनकर युधिष्ठिर लज्जित हो गए.
DISCLAIMER:यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)
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