Pitru Paksha: पितृपक्ष के दौरान…बेलपत्र पर राम लिखकर भगवान शिव को करें अर्पित; पढ़ें गंगा चालीसा
Pitru Paksha: सनातन धर्म का महत्वपूर्ण दिन पितृपक्ष यानी श्राद्ध कर्म जारी हैं. 17 सितम्बर से शुरू हुआ पितृपक्ष 21 सितम्बर को सम्पन्न होगा. यह 15 दिनों की अवधि तक मनाया जाता है और इस दौरान हिंदू समाज अपने मृत पूर्वजों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए तर्पण और पिण्डदान आदि धार्मिक अनुष्ठान करते हैं.
मान्यता है कि इस अवधि में हमारे पूर्वज पृथ्वी लोक पर आते हैं। ऐसे में इस समय विधि-विधान से उनका तर्पण गंगा तट पर करें। गरुड़ पुराण में भगवान नारायण ने जन्म और मृत्यु चक्र के बारे में विस्तार से बताया है। इसके अलावा पितृ ऋण से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति के उपाय भी बताए हैं। मान्यता है कि अगर पितरों प्रसन्न होकर भूलोक से जाते हैं तो वह आपको आशीर्वाद देकर जाते हैं, जिससे आप सदैव सम्पन्न और खुश रहते हैं. इसीलिए पितृपक्ष के दौरान तर्पण और पिण्डदान आवश्यक माना गया है.
पितृ पक्ष के दौरान करें ये सरल उपाय
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि पितृ ऋण से निजात पाने के लिए पितृ पक्ष के दौरान रोजाना स्नान-ध्यान करने के बाद गंगाजल या दुग्ध में काले तिल और बेलपत्र मिलाकर भगवान शिव का अभिषेक करें। मान्यता है कि ऐसा करने से पितृ ऋण दूर होता है।
पितृ पक्ष के दौरान स्नान-ध्यान के बाद बेलपत्र पर राम लिखकर भगवान शिव को अर्पित करें। इस उपाय को करने से कुंडली में व्याप्त अशुभ ग्रहों का प्रभाव खत्म हो जाता है।
आश्विन माह में कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से लेकर अमावस्या तिथि तक प्रतिदिन स्नान-ध्यान के बाद जल में काले तिल और जौ मिलाकर पितरों को अर्घ्य दें। इस उपाय को करने से भी पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है।
पितृ पक्ष के दौरान पितरों का तर्पण एवं पिंडदान किया जाता है। अतः श्राद्ध पक्ष के दौरान घर में बड़े-वृद्ध की सेवा और सम्मान करें। उनका दिल न दुखाएं और न ही मान-सम्मान को ठेस पहुचाएं।
अमावस्या पर देवी गंगा की विधिवत पूजा करें। साथ ही गंगा चालीसा का पाठ और आरती करें। अंत में कुछ दान और दक्षिणा भी पुरोहितों को दें। मान्यता है कि ऐसा करने से पितरों का आशीर्वाद मिलता है.
पितरों को प्रसन्न करने के लिए पितृ पक्ष के दौरान काले तिल का दान कर सकते हैं। आप काले तिल का दान मंदिर में कर सकते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
॥गंगा चालीसा॥
॥ दोहा॥
जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरि गंग।
जय शिव जटा निवासिनी, अनुपम तुंग तरंग॥
॥ चौपाई ॥
जय जय जननी हरण अघ खानी।
आनंद करनि गंग महारानी॥
जय भगीरथी सुरसरि माता।
कलिमल मूल दलनि विख्याता॥
जय जय जहानु सुता अघ हनानी।
भीष्म की माता जगा जननी॥
धवल कमल दल मम तनु साजे।
लखि शत शरद चंद्र छवि लाजे॥
वाहन मकर विमल शुचि सोहै।
अमिय कलश कर लखि मन मोहै॥
जड़ित रत्न कंचन आभूषण।
हिय मणि हर, हरणितम दूषण॥
जग पावनि त्रय ताप नसावनि।
तरल तरंग तंग मन भावनि॥
जो गणपति अति पूज्य प्रधाना।
तिहूं ते प्रथम गंगा स्नाना॥
ब्रह्म कमंडल वासिनी देवी।
श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवि॥
साठि सहस्त्र सागर सुत तारयो।
गंगा सागर तीरथ धरयो॥
अगम तरंग उठ्यो मन भावन।
लखि तीरथ हरिद्वार सुहावन॥
तीरथ राज प्रयाग अक्षैवट।
धरयौ मातु पुनि काशी करवट॥
धनि धनि सुरसरि स्वर्ग की सीढी।
तारणि अमित पितु पद पिढी॥
भागीरथ तप कियो अपारा।
दियो ब्रह्म तव सुरसरि धारा॥
जब जग जननी चल्यो हहराई।
शम्भु जाटा महं रह्यो समाई॥
वर्ष पर्यंत गंग महारानी।
रहीं शम्भू के जटा भुलानी॥
पुनि भागीरथी शंभुहिं ध्यायो।
तब इक बूंद जटा से पायो॥
ताते मातु भइ त्रय धारा।
मृत्यु लोक, नाभ, अरु पातारा॥
गईं पाताल प्रभावति नामा।
मन्दाकिनी गई गगन ललामा॥
मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनि।
कलिमल हरणि अगम जग पावनि॥
धनि मइया तब महिमा भारी।
धर्मं धुरी कलि कलुष कुठारी॥
मातु प्रभवति धनि मंदाकिनी।
धनि सुरसरित सकल भयनासिनी॥
पान करत निर्मल गंगा जल।
पावत मन इच्छित अनंत फल॥
पूर्व जन्म पुण्य जब जागत।
तबहीं ध्यान गंगा महं लागत॥
जई पगु सुरसरी हेतु उठावही।
तई जगि अश्वमेघ फल पावहि॥
महा पतित जिन काहू न तारे।
तिन तारे इक नाम तिहारे॥
शत योजनहू से जो ध्यावहिं।
निशचाई विष्णु लोक पद पावहिं॥
नाम भजत अगणित अघ नाशै।
विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशै॥
जिमी धन मूल धर्मं अरु दाना।
धर्मं मूल गंगाजल पाना॥
तब गुण गुणन करत दुख भाजत।
गृह गृह सम्पति सुमति विराजत॥
गंगाहि नेम सहित नित ध्यावत।
दुर्जनहुँ सज्जन पद पावत॥
बुद्दिहिन विद्या बल पावै।
रोगी रोग मुक्त ह्वै जावै॥
गंगा गंगा जो नर कहहीं।
भूखे नंगे कबहु न रहहि॥
निकसत ही मुख गंगा माई।
श्रवण दाबी यम चलहिं पराई॥
महाँ अधिन अधमन कहँ तारें।
भए नर्क के बंद किवारें॥
जो नर जपै गंग शत नामा।
सकल सिद्धि पूरण ह्वै कामा॥
सब सुख भोग परम पद पावहिं।
आवागमन रहित ह्वै जावहीं॥
धनि मइया सुरसरि सुख दैनी।
धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी॥
कंकरा ग्राम ऋषि दुर्वासा।
सुन्दरदास गंगा कर दासा॥
जो यह पढ़े गंगा चालीसा।
मिली भक्ति अविरल वागीसा॥
॥ दोहा ॥
नित नव सुख सम्पति लहैं। धरें गंगा का ध्यान।
अंत समय सुरपुर बसै। सादर बैठी विमान॥
संवत भुज नभ दिशि । राम जन्म दिन चैत्र।
पूरण चालीसा कियो। हरी भक्तन हित नैत्र॥
DISCLAIMER: यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)
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