Pitru Paksha: ब्राह्मणों को दान करने और गायों को खिलाने मात्र से ही उतर जाता है पितरों का ऋण…
Pitru Paksha: पितृपक्ष अश्वनि मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होकर अमावस्या को पूरा होता है। ये 15 दिन पितृपक्ष अर्थात श्राद्धों के दिन या कनागत कहलाते हैं। आचार्य प्रमोद द्विवेदी बताते हैं कि इस दौरान मृतक पूर्वजों का श्राद्ध कर्म किया जाता है। हिंदू धर्म में इस दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। जो कार्य पितरों की तृप्ति के लिए किया जाए, वही श्राद्ध कर्म है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितरों से हमारा आत्मिक सम्बन्ध होता है। इस दौरान पितरों का तर्पण करने से जीवन में आने वाली सारी बाधाएं समाप्त होती हैं। पितृ पक्ष में पितरो के निमित्त नियमित रूप से कुछ न कुछ दान- पुण्य करना चाहिए। पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण का खास महत्व होता है।
इस तरह करें पितरों को प्रसन्न
आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि पितृपक्ष में नियमित रूप से पितरों को जल अर्पित करने का विधान धर्म ग्रंथों में बताया गया है। पितरों को उनकी मृत्यु तिथि पर साल में एक बार जल, तिल, जौ, कुश और फूल आदि से उनका श्राद्ध कर्म सम्पन्न करते हैं। मात्र गौ-ग्रास (गाय को भोजन) निकाल देने और ब्राह्मणों को भोजन करा देने मात्र से भी पितरों का ऋण उतर जाता है।
इस दिशा की ओर मुख करके दें जल
आचार्य प्रमोद द्विवेदी बताते हैं कि कनागत के दौरान हमें नियमित रूप से अपने पितरों को जल अर्पित करना चाहिए। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल देना चाहिए। जल में काला तिल मिला कर, हाथ में कुश रख कर जल अर्पित करें। साथ ही नियमित रूप से गाय, कौआ, कुत्ता के लिए भोजन निकालें। ऐसा करने से पितृदोष की शांति तो होती ही है, पितर प्रसन्न होकर आशीर्वाद भी देते हैं। जिस दिन पितृ तिथि हो, उस दिन ब्राह्मण को अन्न और वस्त्र का दान करना चाहिए। साथ ही अपने घर के वृद्धजनों की सेवा भी करनी चाहिए।
अगर माता- पिता जीवित हैं तो उनका आशीर्वाद जरूर लें। निर्धन को भोजन खिलाएं। पूरे पितृपक्ष में पितरों के लिए दक्षिण दिशा की ओर दीपक अवश्य प्रजवल्लित करके रखें। अपने पुरोहित व पंडित से पूछकर अपने पितरों के लिए जो भी सम्भव हो करें।
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