Pitru Paksha: युद्ध में शस्त्र से मारे गए पितरों का श्राद्ध करें चतुर्दशी को, जानें किस पक्ष में श्राद्ध करना माना गया है श्रेष्ठ, देखें श्राद्ध में कौन सी तीन चीजें हैं महत्वपूर्ण, सात प्वाइंट्स

September 15, 2022 by No Comments

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महालय स्पेशल। पितरों की पूजा के दिन शुरू हो गए हैं। इनका समापन अमावस्या पर 25 सितम्बर को होगा। यह आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होते हैं। इन 15 दिनों के दौरान ही लोग अपने पूर्वजों का श्राद्ध कर्म करने के लिए गया, पुष्कर, हरिद्वार व प्रयागराज भी जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितरों के लिए इस दौरान किया गया कोई भी कार्य सीधे पितरों तक ही पहुंचता है। अक्सर लोगों को श्राद्ध कर्म को सही ढंग से करने की जानकारी नहीं होती, इसलिए इस लेख में हमारे आचार्य विनोद कुमार मिश्र श्राद्ध कर्म पर महत्वपूर्ण जानकारियां दे रहे हैं।

देखें श्राद्ध से जुड़ी ये महत्वपूर्ण जानकारियां

श्राद्ध के द्वारा प्रसन्न हुये पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष आदि प्रदान करते हैं , श्राद्ध के योग्य समय हो या न हो, तीर्थ में पहुचते ही मनुष्य को सर्वदा स्नान, तर्पण और श्राद्ध करना चाहिये।

श्राद्ध एकान्त में ,गुप्तरुप से करना चाहिये, पिण्डदान पर दुष्ट मनुष्यों की दृष्टि पड़ने पर वह पितरों को नहीं पहुचँता, दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिये।

जंगल,पर्वत,पुण्यतीर्थ, नदी तट और देवमंदिर ये दूसरे की भूमि में नही आते हैं, इन पर किसी का स्वामित्व नहीं होता। अर्थात इन स्थानों पर श्राद्ध कर्म करना श्रेष्ठ माना गया है।

श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों के द्वारा ही होती है, श्राद्ध के अवसर पर ब्राह्मण को निमन्त्रित करना आवश्यक है, जो बिना ब्राह्मण के श्राद्ध करता है, उसके घर पितर भोजन नहीं करते तथा श्राप देकर लौट जाते हैं, ब्राह्मणहीन श्राद्ध करने से मनुष्य महापापी होता है।

शुक्ल पक्ष की अपेक्षा कृष्ण पक्ष और पूर्वाह्न की अपेक्षा अपराह्ण श्राद्ध के लिये श्रेष्ठ माना जाता है।

सायंकाल में श्राद्ध नहीं करना चाहिये, सायंकाल का समय राक्षसी बेला नाम से प्रसिद्ध है, चतुर्दशी को श्राद्ध करने से कुप्रजा (निन्दित सन्तान) पैदा होती है, परन्तु जिसके पितर युद्ध में शस्त्र से मारे गये हो, वे चतुर्दशी को श्राद्ध करने से प्रसन्न होते हैं, जो चतुर्दशी को श्राद्ध करने वाला स्वयं भी युद्ध का भागी होता है।

रात्रि में श्राद्ध नहीं करना चाहिये, उसे राक्षसी कहा गया है, दोनो संध्याओं में भी श्राद्ध नहीं करना चाहिये, दिन के आठवें भाग (महूर्त) में जब सूर्य का ताप घटने लगता है उस समय का नाम ‘कुतप’ है, उसमें पितरों के लिये दिया हुआ दान अक्षय होता है, कुतप, खड्गपात्र, कम्बल, चाँदी , कुश, तिल, गौ और दौहित्र ये आठो कुतप नाम से प्रसिद्ध है, श्राद्ध में तीन वस्तुएँ अत्यन्त पवित्र हैं, दौहित्र, कुतपकाल, तथा तिल, श्राद्ध में तीन वस्तुएँ अत्यन्त प्रशंसनीय हैं, बाहर और भीतर की शुद्धि, क्रोध न करना तथा जल्दबाजी न करना