Pitru Paksha: ध्यान रखें, श्राद्ध भोज कराते समय ब्राह्मणों पर न पड़े इन तीन की नजर, 10 प्वाइंट्स से समझें श्राद्ध में भोजन कराने का विधान, जिनके पास नहीं है श्राद्ध कराने के लिए रुपए, उनके लिए विष्णुपुराण और वराहपुराण में दिए गए हैं सरल उपाय
महालय स्पेशल। पितरों की पूजा के दिन शुरू हो गए हैं। इनका समापन अमावस्या पर 25 सितम्बर को होगा। इसी बीच सनातन धर्म को मानने वाले श्राद्ध कर्म और तर्पण कार्य में भी व्यस्त होकर पूरी तरह से पितरों की पूजा में लगे हुए हैं। ताकि पितर प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दें। पितृपक्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होकर अमावस्या को समाप्त होंगे। इस लेख में हमारे आचार्य विनोद कुमार मिश्र श्राद्ध कर्म करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, इसकी जानकारी दे रहे हैं। हमें श्राद्ध कर्म करते वक्त इन बातों का खास ख्याल रखना चाहिए, तभी श्राद्ध कर्म सफल होते हैं।
इन बातों का रखें खास ख्याल
भोजन के लिए उपस्थित अन्न अत्यंत मधुर, भोजनकरने वाले की इच्छा के अनुसार तथा अच्छी प्रकार सिद्ध किया हुआ होना चाहिए।
पात्रों में भोजन रखकर श्राद्धकर्त्ता को अत्यंत सुंदर एवं मधुरवाणी से कहना चाहिए किः ‘हे महानुभावो ! अब आप लोग अपनी इच्छा के अनुसार भोजन करें।’
भोजन कराते वक्त क्रोध तथा उतावलेपन को छोड़ देना चाहिए। भक्ति पूर्वक भोजन परोसना चाहिए।
ब्राह्मणों को भी दत्तचित्त और मौन होकर प्रसन्न मुख से सुखपूर्वक भोजन कराना चाहिए।
“लहसुन, गाजर, प्याज, करम्भ (दही मिला हुआ आटा या अन्य भोज्य पदार्थ) आदि वस्तुएँ जो रस और गन्ध से युक्त हैं श्राद्धकर्म में निषिद्ध हैं।”
ब्राह्मण को चाहिए कि वह भोजन के समय कदापि आँसू न गिराये, क्रोध न करे, झूठ न बोले, पैर से अन्न को न छुए और उसे परोसते हुए न हिलाये। आँसू गिराने से श्राद्धान्न भूतों को, क्रोध करने से शत्रुओं को, झूठ बोलने से कुत्तों को, पैर छुआने से राक्षसों को और उछालने से पापियों को प्राप्त होता है।
जब तक अन्न गरम रहता है और ब्राह्मण मौन होकर भोजन करते हैं, भोज्य पदार्थों के गुण नहीं बतलाते तब तक पितर भोजन करते हैं। सिर में पगड़ी बाँधकर या दक्षिण की ओर मुँह करके या खड़ाऊँ पहनकर जो भोजन किया जाता है उसे राक्षस खा जाते हैं।
भोजन करते वक्त ब्राह्मणों पर, सुअर, मुर्गा, कुत्ता की नजर नहीं पड़नी चाहिए। होम, दान, ब्राह्मण-भोजन, देवकर्म और पितृकर्म को यदि ये देख लें तो वह कर्म निष्फल हो जाता है।
सुअर के सूँघने से, मुर्गी के पंख की हवा लगने से, कुत्ते के देखने से श्राद्ध अन्न निष्फल हो जाता है।
अगर नहीं है धन तो
विष्णुपुराण अध्यायः14 तथा वराहपुराण अध्याय 13 में लिखा है कि अगर श्राद्धकर्म करने के लिए आपके पास बिल्कुल भी धन नहीं है तो आपको उधार मांगकर धन लेना चाहिए और श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। अगर आपको कोई उधार नहीं दे रहा तो पितरों के उद्देश्य से पृथ्वी पर भक्ति विनम्र भाव से सात आठ तिलों से जलाञ्जलि ही दे दें। अगर यह भी संभव नहीं तो कहीं से चारा लाकर गौ को खिला दें और अगर इतना भी संभव नहीं तो अपने दोनो हाथ ऊपर उठाकर सूर्य तथा दिक्पालों से कहें-
“न मेऽस्ति वित्तं न धनं न चान्यच्छ्राद्धोपयोग्यं स्वपितॄन्नतोऽस्मि।
तृप्यन्तु भत्त्या पितरो मयैतौ कृतौ भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य ।।”
अर्थात (मेरे पास श्राद्धकर्म के योग्य न धन-संपति है और न कोई अन्य सामग्री। अत: मै अपने पितरों को प्रणाम करता हूँ। वे मेरी भक्ति से ही तृप्तिलाभ करें। मैंने अपनी दोनों भुजाएं आकाश में उठा रखी हैं।)