Ekadashi Vrat: एकादशी व्रत के दौरान भूल कर भी न करें ये काम, देखें किन-किन बातों का रखना चाहिए ध्यान, जानें इस व्रत के लाभ व महत्व, करें इन पांच फलों का सेवन
एकादशी विशेष। अंग्रेजी के प्रत्येक महीने में दो एकादशियां पड़ती हैं। अमावस्या और पूर्णिमा के दस दिन बात ग्यारहवीं तिथि एकादशी कहलाती है। मान्यता है कि एकादशी का व्रत पुण्य संचय करने में सहायक होता है। आचार्य सुशील कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि प्रत्येक पक्ष की एकादशी का अपना महत्व है। एकादशी व्रत का अर्थ ये भी है कि एक ही दशा में रहते हुए अपने आराध्य का अर्चन-वंदन करने की प्रेरणा देने वाला व्रत ही एकादशी है।
एकादशी व्रत के लाभ
भारतीय ज्योतिष अनुसन्धान संस्थान के निदेशक आचार्य विनोद कुमार मिश्र बताते हैं कि शास्त्रो में दिया गया है कि एकादशी व्रत के पुण्य के समान और कोई पुण्य नहीं है।
जो पुण्य सूर्यग्रहण में दान से होता है, उससे कई गुना अधिक पुण्य एकादशी के व्रत से होता है।
जो पुण्य गौ-दान, सुवर्ण-दान, भूमि दान, अन्नदान, कन्यादान, अश्वमेघ यज्ञ, तीर्थयात्रा से मिलता है, उससे अधिक पुण्य एकादशी के व्रत से मिलता है है।
एकादशी करनेवालों के पितर नीच योनि से मुक्त होते हैं और अपने परिवारवालों पर प्रसन्नता बरसाते हैं। इसलिए यह व्रत करने वालों के घर में सुख-शांति बनी रहती है।
धन-धान्य, पुत्रादि की वृद्धि होती है। कीर्ति बढ़ती है, श्रद्धा-भक्ति बढ़ती है, जिससे जीवन रसमय बनता है।
स्नानादि कर के गीता पाठ करें, श्री विष्णुसहस्रनाम का पाठ करें ।
एकादशी को श्री विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है।
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।
एकादशी के दिन उपरोक्त मंत्र के पाठ से श्री विष्णुसहस्रनाम के जप के समान पुण्य प्राप्त होता है।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ इस द्वादश अक्षर मंत्र अथवा गुरुमंत्र का जप करना चाहिए।
एकादशी की रात में भगवान विष्णु के आगे जागरण करना चाहिए। श्रीहरि के समीप जागरण करते समय रात में दीपक जलाने से पुण्य सौ कल्पों में भी नष्ट नहीं होता है। इस विधि से एकादशी का व्रत करने वाला उत्तम फल को प्राप्त करता है।
ये काम न करें
चोर, पाखण्डी और दुराचारी मनुष्य से बात नहीं करना चाहिए, यथा संभव मौन रहें।
एकादशी के दिन भूल कर भी चावल नहीं खाना चाहिए न ही किसी को खिलाना चाहिए। इस दिन फलाहार अथवा घर में निकाला हुआ फल का रस अथवा दूध या जल पर रहना लाभदायक है।
व्रत के (दशमी, एकादशी और द्वादशी) – इन तीन दिनों में काँसे के बर्तन, प्याज, लहसुन, मसूर, उड़द, चने, कोदो, शाक, शहद, तेल और अधिक जल का सेवन न करें ।
फलाहारी को गोभी, गाजर, शलजम, पालक इत्यादि सेवन नहीं करना चाहिए। आम, अंगूर, केला, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन करना चाहिए।
निद्रा, पान,निन्दा, चुगली, चोरी, हिंसा, क्रोध तथा झूठ, कपटादि अन्य कुकर्मों से नितान्त दूर रहना चाहिए।
भूलवश किसी निन्दक से बात हो जाय तो इस दोष को दूर करने के लिए भगवान सूर्य के दर्शन तथा धूप-दीप से श्रीहरि की पूजा कर क्षमा माँग लेनी चाहिए।
एकादशी के दिन घर में झाडू नहीं लगायें । इससे चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है।
इस दिन बाल नहीं कटायें और हो सके तो इस दिन यथाशक्ति अन्नदान करें किन्तु स्वयं किसी का दिया हुआ अन्न कदापि ग्रहण न करें ।
DISCLAIMER: यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)