Holika Dahan Katha: होलिका दहन की कथा देती है ये संदेश…असुर राजा हिरण्यकश्यप का चूर हुआ घमंड?
Holika Dahan Katha: फाल्गुन मास की पूर्णिमा को हर साल रंगों का त्योहार होली मनाया जाता है. इस दिन बुराई पर अच्छाई की प्रतीक होलिका का दहन किया जाता है और फिर लोग एक-दूसरे को रंग- अबीर लगाकर होली का त्योहार मनाते हैं. मोहल्ले में एक जगह लकड़ियां इकट्ठी की जाती हैं जिसे होलिका कहा जाता है. इसकी पूजा करने के बाद इसे प्रज्ज्वलित किया जाता है.
होलिका दहन को लेकर एक कथा प्रचलित है. पुराणों में हिरण्यकश्यप, उसकी बहन होलिका और भक्त बालक प्रह्लाद की कहानी पुराणों में अंकित है जो कि आज लोगों को बताती है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो और बुराई क्यों न अच्छाई पर भारी पड़े लेकिन अंत में जीत अच्छाई और सत्य की ही होती है.
फाल्गुन पूर्णिमा की रात को होने वाले होलिका दहन सिर्फ आग जलाने की रस्म नहीं, बल्कि हम सबको ये संदेश देती है कि हमें इसी आग में अपने भीतर के नकारात्मक भावों को भी जला देना है और समाज में अच्छाई का प्रचार-प्रसार करना है. माना जाता है कि इस दिन शत्रु भी अपनी शत्रुता भूलकर एक-दूसके को गले लगाते हैं. गांव-शहर में लोग होलिका की पूजा करते वक्त अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करते हैं और नई फसल की बालियां सेंकते हैं. माना जाता है कि ऐसा करने से साल भर घर में कोई नकारात्मक शक्ति नहीं आती और घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है.
पढ़ें प्रचलित कथा
प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक असुर राजा था. उसने कठोर तप किया और फिर ब्रह्मा जी से वरदान मांग लिया कि उसे न तो मनुष्य मार सके, न पशु और न ही उसकी दिन में मौत हो और न ही रात में, न घर के भीतर व मरे और न बाहर. यही नहीं उसने ये भी मांगा कि उसे किसी अस्त्र-शस्त्र से कोई न मार सके. यह वरदान पाकर वह स्वयं को भगवान समझने लगा और देवताओं को ही परेशान करने में जुट गया. जो कोई भी भगवान की पूजा करता उसे मार देता और कहता कि सभी लोग उसे ही भगवान समझें और उसकी ही पूजा करें.
उसने अपने राज्य में आदेश भी दे दिया कि कोई भी विष्णु की पूजा नहीं करेगा. उसकी शक्ति के आगे सभी डरते थे और उसके आदेश के आगे झुक गए लेकिन उसी के घर में यानी उसका ही बालक प्रहलाद ने उसका आदेश नहीं माना और भगवान विष्णु की पूजा करते रहे.
प्रचलित कथा में कहा गया है कि हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था और वह अपने पिता से बिल्कुल भी नहीं डरता था.उसकी भक्ति भगवान विष्णु के लिए इतनी पक्की थी कि हिरण्यकश्यप ने बार-बार उसे डराया लेकिन प्रहलाद बिल्कुल भी महीं डरा. वह हर समय नारायण का स्मरण करता रहता था. पहले तो बेटा होने की वजह से हिरण्यकश्यप ने उसे समझाने की कोशिश की लेकिन जब उसने भगवान विष्णु का नाम लेना नहीं बंद किया तो फिर डराया और फिर सजा दी.
कथाओं में कहा जाता है कि प्रह्लाद को विषैले सर्पों के बीच डालने के साथ ही हाथियों से कुचलवाने की कोशिश भी की गई और पहाड़ से गिराया गया लेकिन प्रहलात को हमेशा भगवान विष्णु ने बचाया और उसे खरोंच तक नहीं आई. समुद्र में भी फेंका गया लेकिन हर बार वह सुरक्षित बच गया. इस बात की चर्चा राज्य में होने लगी और लोग कहने लगे कि भगवान विष्णु उसकी रक्षा कर रहे हैं.
जब हिरण्यकश्यप के सारे प्रयास असफल हो गए और वह बेटे के सामने हारने लगा तब उसने अपनी बहन होलिका को बुलाया. दरअसल होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था और उसके पास एक शीतल पट था जिसे ओढ़ने के बाद अग्नि उसे जला नहीं सकती थी. इसलिए हिरण्यकश्यप ने होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए जिससे प्रहलाद जल कर मर जाए. इस पर फाल्गुन पूर्णिमा की रात चिता सजाई गई और होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई. कथा में कहा जाता है कि प्रह्लाद होलिका की गोद में बैठकर लगातार भगवान विष्णु का नाम जप करता रहा, जिससे होलिका का शीतल पट प्रहलाद के ऊपर उड़ कर आ गया और फिर अग्नि ने होलिका की रक्षा न करके प्रहलाद की रक्षा करनी शुरू कर दी और होलिका जल कर भस्म हो गई लेकिन प्रहलाद को कुछ नहीं हुआ और वह जीवित अग्नि से बाहर निकल आया.
इस तरह से इस घटना को लोगों ने दैवी न्याय के रूप में स्वीकार किया और समझा कि बुराई की हमेशा हार होती है और वरदान या शक्ति का जो दुरुपयोग करते हैं उनका किसी न किसी दिन नाश जरूर होता है. सच्ची आस्था और भक्ति की रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं. यही संदेश देने के लिए हर साल होलिका दहन किया जाता है. ताकि युवा पीढ़ी हमेशा इससे सीख लेती रहे और समाज में अच्छाई का प्रचार-प्रसार करती रहे.
मान्यता है कि उस समय होलिका की अग्नि से बचने के लिए ही लोगों ने खुशी में रंग-गुलाल उड़ाकर उत्सव मनाया था. इसीलिए होली का त्योहार मनाया जाता है. आज भी कई जगह होलिका की राख को शुभ मानकर घर लाते हैं और माथे पर तिलक भी करते हैं और होलिका से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं.
फोटो-सोशल मीडिया
इस तरह हुई हिरण्यकश्यप की मौत
कथा के अनुसार हिरण्यकश्यप का अपराध बढ़ता देख भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लिया जो कि भगवान विष्णु का चौथा अवतार था. इस अवतार को बहुत ही उग्र माना जाता है क्योंकि इस अवतार में भगवान ने आधे मानव शरीर और आधे सिंह के अवतार के रूप में प्रकट हुए थे और फिर हिरण्यकश्यप का इस तरह से वध किया था. भगवान विष्णु ने यह अवतार सतयुग में लिया था.
होली क्यों मनाई जाती है? pic.twitter.com/Ozz0vNelbg
— Bhajan Marg (@RadhaKeliKunj) March 2, 2026
DISCLAIMER: यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)
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