Pitru Paksha: अगर नहीं है श्राद्ध कर्म कराने की क्षमता तो करें ये सरल उपाय, जिस दिन घर में हो श्राद्ध, उस दिन श्रीमद्भागवतगीता का पढ़ें ये अध्याय, करें तुलसीदल का इस्तेमाल, देखें कथा
कनागत स्पेशल। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा के साथ ही रविवार से 15 दिन के लिए पितृपक्ष शुरू हो गए हैं। यह अमावस्या अर्थात 25 सितम्बर तक चलेंगे। सनातन धर्म में ये दिन पितरों अर्थात पूर्वजों की पूजा व भक्ति के लिए शास्त्रों में निर्धारित किए गए हैं। इन 15 दिनों को पितृपक्ष, श्राद्ध पक्ष, महालय और कनागत कहते हैं। इन 15 दिनों तक उन पूर्वजों का श्राद्ध कर्म किया जाता है, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि श्राद्ध का अर्थ होता है सम्मान करना। अर्थात हम इन दिनों में तर्पण आदि कर्म करके अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान का भाव प्रकट करते हैं।
आचार्य विनोद कुमार मिश्र बताते हैं कि आश्विन मास 11 सितम्बर से लग रहा है। इसी दिन से पितृपक्ष श्राद्ध आरम्भ होंगे। हालांकि भाद्रपद की शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि को भी लोग अपने पितरों को जलांजलि देते हैं। आचार्य बताते हैं कि जिस दिन आप के घर में श्राद्ध हो उस दिन गीता का सातवें अध्याय का पाठ करें। पाठ करते समय एक लोटे या कलश में जल भर के रखें। पाठ पूरा हो तो जल सूर्य को अर्घ्य दें और कहें, “हमारे पितृ के लिए हम अर्पण करते हें। जिनका श्राद्ध है ,उनके लिए आज का गीता पाठ अर्पण हैं।”
श्राद्ध कर्म से जुड़ी जानें महत्वपूर्ण जानकारी
अगर श्राद्ध नहीं करा पाते तो सूर्य के सामने दोनों हाथ ऊपर करके बोलें. “हे सूर्य नारायण ! मेरे पिता (नाम), अमुक (नाम) का बेटा, अमुक जाति (नाम), कुल,गोत्र को आप संतुष्ट/सुखी रखें। इस निमित मैं आपको अर्घ्य व भोजन कराता हूँ।” ऐसा करके आप सूर्य को अर्घ्य दें और भोग लगायें।
श्राद्ध पक्ष में एक माला रोज द्वादश मंत्र ” ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ” की करनी चाहिए और उस माला का फल नित्य अपने पितृ को अर्पण करना चाहिए।
श्राद्ध कर्म में करें सफेद फूलों का ही उपयोग करना चाहिए।
श्राद्ध और यज्ञ आदि कार्यों में तुलसी का एक पत्ता भी महान पुण्य देने वाला होता है, इसलिए श्राद्ध के दौरान तुलसी दल का इस्तेमाल करें। इसके बारे में पद्मपुराण में जानकारी दी गई है।
पढ़ें कथा




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