Santan Saptami Katha: रानी ने भूषणा के आठों बेटों को मारना चाहा लेकिन…पढ़ें संतान सप्तमी की कथा-Video

September 17, 2026 by No Comments

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Santan Saptami Katha:  एक बार श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि किसी समय मथुरा में लोमश ऋषि आए हुए थे. मेरे माता-पिता देवकी तथा वासुदेव ने पूरी भक्ति के साथ उनकी सेवा की तो ऋषि ने आदेश दिया- दे देवकी! कंस ने तुम्हारे कई पुत्रों को पैदा होते ही मार कर तुम्हें पुत्र शोक किया है.

इस दुख से मुक्त होने के लिए तुम संतान सप्तमी का व्रत रखो. राजा नहुष की रानी चंद्रमुखी ने भी यह व्रत किया था. तब उसके भी पुत्र नहीं मरे. यह व्रत तुम्हें भी पुत्र शोक से मुक्त करेगा.

यह सुनकर देवकी ने पूछा-ऋषिवर, आप मुझे व्रत का पूरा विधि-विधान बताने की कृपा करें. ताकि मैं यह व्रत विधिपूर्वक कर सकूं. इस पर लोमश ऋषि ने उनको व्रत पूजन की पूरी विधि बताई. साथ ही इस व्रत की कथा भी सुनाई.

लोमश ऋषि बोले- नहुष अयोध्यापुरी का प्रतापी राजा था. उसकी पत्नी का नाम चंद्रमुखी थी. उसी राज्य में विष्णु दत्त नामक एक ब्राह्मण भी रहता था. उसकी पत्नी का नाम रूपवती थी. रानी चंद्रमुखी और रूपवीत के बीच घनिष्ठ मित्रता व प्रेम था.

एक दिन वे दोनों सरयू में स्नान करने गईं. वहां और भी स्त्रियां स्नान कर रही थीं. उन्होंने वहां पर पार्वती सहित शिव की प्रतिमा बना कर विधि पूर्वक पूजन किया. इस पर रानी और रूपवती ने उन स्त्रियों से पूजन का नाम और विधि पूछी.

नारियों ने बताया कि हमने पार्वती सहित शिव जी की पूजा की है. भगवान शिव को डोरा बांधकर हमने संकल्प किया है कि जब तक जीवित रहेंगी, तब तक यह व्रत करती रहेंगी. यह “मुक्ताभरण व्रत” सुख तथा संतान देने वाला है.

इस पर रानी के साथ ही रूपवती ने भी ये व्रत करने का संकल्प किया. व्रत रखकर शिव जी को डोरा बांधकर जीवन भर यह व्रत करने का संकल्प ले लिया लेकिन घर पहुंचते ही दोनों इस व्रत को रखने का संकल्प भूल गईं. इसके परिणाम स्वरूप निधन के बाद रानी को वानरी और ब्राह्मणी को मुर्गी की योनी में जन्म मिला.

कालान्तर में पशु योनी छोड़कर वे फिर से मनुष्य योनी में आई. चंद्रमुखी तो मथुरा के राजा पृथ्वीनाथ की रानी बनी और रूपवती ने फिर से एक ब्राह्मण के घर में जन्म लिया. इस जन्म में रानी का नाम ईश्वरी और ब्राह्मणी का नाम भूषणा था.

भूषणा का विवाह राजपुरोहित अग्न्मुखी के साथ हुआ. इस जन्म में भी ईश्वरी और भूषणा के बीच में बहुत ही प्रेम था. व्रत भूलने की वजह से रानी इस जन्म में संतान सुख से वंचित रही. प्रौढ़ावस्था में जब पहुंची तो एक बहरा तथा गूंगा पुत्र पैदा हुआ लेकिन वह 9 साल का होकर मर गया. भूषणा ने व्रत को याद रखा इसलिए उसके गर्भ से 8 सुंदर और स्वस्थ्य बच्चों का जन्म हुआ.

रानी ईश्वरी के पुत्र शोक की खबर सुनकर एक दिन भूषणा उससे मिलने राजमहल पहुंची. लेकिन रानी ने जैसे ही उसे देखा रानी के मन में जलन की आग दहक उठी. उसने भूषणा को विदा करने के बाद उसके 8 पुत्रों को भोजन पर बुलाया और भोजन में विष मिलाकर खिला दिया लेकिन भूषणा के व्रत के प्रभाव से बच्चों को कुछ नहीं हुआ. इस पर रानी को और क्रोध आ गया.

रानी ने नौकरो को बुलाया और आदेश दिया कि भूषणा के बेटों को पूजा के बहाने यमुना नदी के किनारे ले जाकर गहरे जल में धक्का दे दो. लेकिन इस बार भी भूषणा के बच्चे बच गए. ये माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा का प्रभाव था. इसके बाद रानी ने जल्लादों को बुलाकर उन बच्चों को वध स्थल पर ले जाकर मारने का आदेश दिया लेकिन यहां भी बच्चों को कुछ नहीं हुआ. इस पर रानी को बहुत ही आश्चर्य हुआ. उसने भूषणा को बुलाकर क्षमायाचना की और पूरी बात भी बताई. फिर पूछा कि उसके बच्चों को कुछ हुआ क्यों नहीं. ये किस कारण हुआ.

इस पर भूषणा ने कहा कि क्या आपको पूर्वजन्म की बात याद नहीं है. इस पर रानी ने कहा कि उनको कुछ भी याद नहीं है. इसके बाद भूषणा ने बताया कि वह पूर्वजन्म नें राजा नहुष की रानी थी. इसके बाद पूरी बात याद दिला दी. भूषणा ने कहा कि हम गलती से व्रत करना भूल गए थे. इसलिए अलग-अलग योनियों में जन्म लेने के बाद फिर से मनुष्य जन्म पाया है. मुझे इस व्रत की याद हो आई है. इसलिए मैने ये व्रत किया. उसी व्रत के प्रभाव से मेरे बच्चों को कुछ नहीं हुआ, जबकि आपने कितना मरवाने की कोशिश की.

इसके बाद रानी ईश्वरी ने विधि-विधान से व्रत रखा जिसके प्रभाव से रानी फिर से गर्भवती हुई और एक सुंदर बालक को जन्म दिया. तभी से पुत्र प्राप्ति व संतान रक्षा का ये व्रत प्रचलित हो गया.

DISCLAIMER: यह लेख धार्मिक मान्यताओं व धर्म शास्त्रों पर आधारित है। हम अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते। पाठक धर्म से जुड़े किसी भी कार्य को करने से पहले अपने पुरोहित या आचार्य से अवश्य परामर्श ले लें। KhabarSting इसकी पुष्टि नहीं करता।)

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